सम्पादकीय

राष्ट्रीय मतदाता दिवस: त्योहार से कम नहीं चुनाव

Rani Sahu
25 Jan 2022 10:22 PM IST
राष्ट्रीय मतदाता दिवस: त्योहार से कम नहीं चुनाव
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त्योहारों के आने से जो उत्साह, जोश व खुशी माहौल में घुल जाती है

त्योहारों के आने से जो उत्साह, जोश व खुशी माहौल में घुल जाती है. उसका रंग देखते ही बनता है. हर वर्ष त्योहार जिंदगी में खुशियां और ताजगी भर जाते हैं, ऐसे ही समय पर होने वाले चुनाव किसी त्योहार से कम नहीं. इनकी भी पूरे जोर-शोर से तैयारी होती है. लोगों का उत्साह देखते ही बनता है. वही जोश और जुनून लोगो में भरा होता है, किन्तु इस त्योहार में कुछ भिन्नता है. इसमें मैं और मेरे का भाव चारों तरफ दिखाई देता है, अहंकार की भावना प्रबल होती है, भले ही उस पर दिखावे का प्रसन्नता मिश्रित लेप लगा हो.

तू कौन है – मैं ही सब कुछ हूं, तू छोटा – मैं महान, तेरे काम घृणित – मैं सर्वश्रेष्ठ, देने वाला मै – विजेता भी मैं. निजता को प्रबल करने वाली बातें, जीत की चाह में गलत को भी सही साबित करना, दल-दल में गिरने और गिराने की कोशिश करना, ये चुनावी त्योहार की कुछ विशेषताएं हैं. चुनावी मौसम प्रतिदिन अपने स्वभाव को बदलता रहता है. चुनावी हवा धीरे-धीरे अपने तीव्रतम प्रवाह को प्रकट करने लगती है. चुनावी आंधी चलती है तो सब कुछ तितर-बितर होने लगता है, कुछ जमे-जमाए मैदान को छोड़कर भागने लगते हैं तो कुछ मैदान में आकर जमने लगते हैं.
चुनावी त्योहारों की विशेषता
कुछ अपनों का साथ छोड़कर गैरों का दामन पकड़ते हैं, तो कहीं गैर अपने लगने लगते हैं. कुछ अपने ही भावों के अनुसार ताल ठोकतेे हैं, तो कुछ व्यर्थ ही अपना समय बर्बाद करते हैं. इस त्योहार की यही विशेषता है, जो इसकी अच्छाइयों को इसकी बुराइयों के साथ दर्शाती है. आगे बढ़ने की होड़ और सत्ता की चाह में सब एक दूसरे को नीचा दिखाने और स्वयं को सच्चा साबित करने में लग जाते हैं. भोली-भली जनता जो सदैव से छली जाती है, हर बार की तरह आज भी छली जाएगी. किस पर विश्वास करें किस पर नहीं, मजबूर जनता बड़ी विवश हो जाती है.
दावों को पूरा करने का आश्वासन देने वाले नेताओं की पूरी जन्मपत्री जनता के हाथों में होती है, फिर भी वो ठगी जाती है. चुनाव में हर व्यक्ति उम्मीदवार के दिल के करीब होता है. गरीब भी बहुत मूल्यवान हो जाता है, उसकी कीमत अचानक ही बढ़ जाती है. हालांकि वास्तविकता यह है कि गरीब गरीब ही रहता है, वो चुनाव के पहले भी गरीब था और बाद में भी. आज भी सड़कों पर गरीब ही रिक्शा चलाता है, ठेली लगाता है, सब्जी बेचता है. चुनाव के बाद भी उसका नसीब नहीं चमकता, उसकी झोपड़ी में उजाला नहीं होता, उसकी रातें सड़को पर, फुटपाथ पर ही गुजर जाती हैं.
नेताओं की भीड़ में गरीब ही होते हैं, चुनावी जीत का दम्भ भरकर जीतने वाले उनसे वादा करके भी उनके लिए कुछ नहीं करते. आज के सुदामा की झोपडी कभी महलों में परिवर्तित नहीं होती, चुनाव के समय सम्पन्न नेता गाड़ी में आकर गरीब के आगे हाथ जोड़ते हैं, किसी वृद्ध के पैर छूतें हैं, बालक को गोद में उठा लेते हैं, दो निवाले भी खा लेते हैं. बाद में, उसी के घर के आगे से गाड़ी लेकर धूल उड़ाते निकल जाते हैं.
अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले अमीरों के आगे गरीब लालच में आकर कमजोर पड़ जाते हैं. पेट की भूख और परिवार के सुख के लिए अयोग्य के हाथों में देश को दे देते हैं. कभी-कभी मादक द्रव्यों के खातिर कुछ व्यक्ति किसी का भी हाथ पकड़ लेते हैं. छोटे-छोटे प्रलोभन गरीब के लिए बहुत मददगार होते हैं, कीमती होते हैं पर वो देश की नीव खोखला कर देते हैं. चुनाव के समय नेताओं का अहंकार, टीका-टिप्पणी, दूसरे पर दोषारोपण, स्वयंप्रभुसत्ता देखते ही बनती है, अपने गुणों का बढ़-चढ़ कर वर्णन करना, सारे नंबर खुद ही बटोर कर ले जाना, दूसरों को निम्न सिद्ध करना ही इस त्योहार की कला है.
गरीब की चैखट पर इज्जत का पर्दा
राजनीति जो कूटनीति का पर्याय है, लालच का चश्मा पहनकर, दूसरों की आंखों में धूल झोंककर ही चलाई जा सकती है. भ्रष्टाचार, दम्भ, लालच, अपनो की ही जेबें भरना, सक्षम व देशभक्तों पर भी लांछन लगाना झूठे व्यक्तियों की कला है. काम करने वाले, गरीबों के सच्चे हितैषी, बहुत ढूंढने पर ही मिलते हैं. देश हित में जी-जान से जुट जाना सबके वश की बात नहीं है, नहीं तो सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश यूं टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरकर ऐसी हालत में ना पहुंच गया होता. यहां आज भी गरीब मां के आंचल से बंधा बच्चा भीख मांगने को लाचार है.
यहां आज भी गरीब की चैखट पर इज्जत बचाने हेतु पर्दा टंगा है, यहां रोटी के दो निवाले के लिए मजदूर पसीना बहाकर भी अपने परिवार का पालन करने में असमर्थ है. चुनावी मौसम यदि इनके लिए त्योहार बनकर आता है तो तिकड़मी शक्ति के आगेे इनका बिक जाना इनकी मजबूरी है, पर जीत जाने वालों को इनकी तकलीफ महसूस करनी चाहिए कि दुबारा ऐसा मौका ही नहीं आए, जो इन्हें बिकना पड़े. चुनावी लालची परिवेश में व्यक्ति अपनो का ही सगा नहीं है देश का क्या होगा. बुद्धिजीवी प्राणियों का आकलन करें कि देश की सुरक्षा किसके हाथों में है, रटे-रटाए जुमलों को प्रस्तुत करने से देश नहीं चलता, देश की समस्याएं कम नहीं होती.
स्थिरता, स्थायित्व, सेवा भाव, परोपकार व कार्य करने की लगन ये व्यक्ति की प्रमुखता होनी चाहिए. कुछ भी निशुल्क ना मिले, बिना करे मिलने से देश पिछड़ जाएगा. मेहनत करने भाव हर देशवासी में होना चाहिए, काम ही आधार हो, योग्यता ही पहचान हो, विकास हो दिखावा नहीं. उन्नति हो कागजी कार्रवाई नहीं, राजनीति की पारदर्शिता हो, सबका विकास हो, देश को आगे ले जाने की चाह हो, स्वयं आगे बढ़ने और दूसरे को गिरानेे के भाव से उपर उठकर देश को आगे ले जाने की बात हो.
नोक-झोंक रूपी मसाले की चाट, रसीले वाक्यों की मिठाई, छींटाकशी की फुलझड़ियां, बदलते मिजाजों के रंग-बिरंगे मुखौटे, अशांति की मशाल, असंतुष्टि की लौ और लालच के दावे चुनावी त्योहार के वे प्रतीक हैं जो इसकी गरिमा को शत-प्रतिशत बढ़ाने में सहायक है. किन्तु, जनता इन मीठे-खट्टे व्यंजनो के स्वाद को भली-भांति पहचानती है. ये चुनावी त्योहार अपनी गरिमा के साथ आते रहें, जनता के मनोभावों को समझकर मनाए जाते रहें, देश की गरिमा व महानता पर कोई आंच ना आए, इसी प्रेरणा के साथ इन चुनावी त्योहारों का स्वागत है.
रेखा गर्ग
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