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सम्पादकीय

NASA Mars Mission: डॉ. स्वाति मोहन की काली बिंदी में खो गए आंखों में तैरते अटल इरादे

Gulabi
22 Feb 2021 4:38 PM GMT
NASA Mars Mission: डॉ. स्वाति मोहन की काली बिंदी में खो गए आंखों में तैरते अटल इरादे
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पर्सविेरेंस मंगल की सतह पर सुरक्षित उतर गया है और जीवन के चिह्न ढूंढने के लिए तैयार है।

पर्सविेरेंस मंगल की सतह पर सुरक्षित उतर गया है और जीवन के चिह्न ढूंढने के लिए तैयार है।पिछले हफ्ते शुक्रवार को कैलिफोर्निया के पासाडेना में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के कंट्रोल रूम में गूंजी आत्मविश्वास से भरी यह आवाज अगर डॉ. स्वाति मोहन की नहीं होती तो तय मानिए कि इस खबर को लेकर भारत में इतनी दिलचस्पी पैदा नहीं हुई होती जैसी कि देखी गई। आमतौर पर यही माना जाता है कि इस तरह की खबरों का एक खास वर्ग होता है, लेकिन नासा के इस महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियान का नेतृत्व एक भारतीय के हाथ में होने के कारण आम पाठकों की नजर भी इस पर पड़ी। घर-घर में चर्चा हुई। खासकर इंटरनेट मीडिया पर तो टिप्पणियों की भरमार हो गई। इस मंच पर तो भारतीय मूल की इस अमेरिकी वैज्ञानिक की उपलब्धि से भी ज्यादा जगह उनकी बिंदी ने घेरी।


पर्सविेरेंस के आंख और कान समङो जाने वाले गाइडेंस, नेवीगेशन और कंट्रोल ऑपरेशन की प्रमुख डॉ. स्वाति मोहन के नीले परिधान पर चमकती काली बिंदी ने सबका ध्यान खींचा। ट्विटरजीवियों ने अपने-अपने अंदाज और समझ के अनुसार इसे बयान किया। किसी को नासा में अलग-अलग देशों, रंगों और नस्लों के विज्ञानियों के रूप में बढ़ती विविधता नजर आई और वो जमाना याद आया जब वहां सिर्फ गोरी चमड़ी वाले विज्ञानियों का बोलबाला था। यह बिंदी अमेरिका के उन श्वेत लोगों को करारा जवाब के रूप में भी देखी गई, जो एशियाई, लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी एवं अन्य अश्वेतों को संदेह की नजर से देखते हैं। उन्हें अपने से कमतर समझते हैं। नासा के लिए काम करने की बात तो छोड़िए, कई श्वेत ऐसे भी मिल जाएंगे जो अश्वेतों को जीने के लायक भी नहीं समझते। नस्ली श्रेष्ठता से भरे ये श्वेत दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यह प्रत्यक्ष अनुभव से ही जाना जा सकता है।
कुछ लोगों को इस बिंदी ने बहुत खुशी दी, क्योंकि वे खुद भी इसे पहनती हैं और इस बात की परवाह नहीं करती हैं कि कोई क्या सोचता है। दरअसल, गलत समझ के कारण स्त्री विमर्श की एक धारा यह मानती है कि महिलाओं को पराधीन बनाए रखने के लिए उनकी सुंदरता के प्रतिमान गढ़े गए। उन्हें सोलह श्रृंगार के बंधन में बांधा गया। बिंदी, नथुनी, झुमका, पायल.. ये सब गुलामी की निशानी हैं। जाहिर है अहंकार में मदमस्त श्वेतों की तरह इन विघ्नसंतोषी स्त्रीवादियों को भी डॉ. स्वाति मोहन ने तगड़ा झटका दिया है। द ग्रेट इंडियन बिंदी शीर्षक से एक यूजर ने लिखा कि डॉ. स्वाति मोहन भारत सहित दुनिया के सभी देशों की नई पीढ़ी के विज्ञानियों के लिए प्रेरणास्नोत बनकर उभरी हैं। मंगल पर पर्सविेरेंस के उतरने की घोषणा करते समय उनके माथे की बिंदी ने हम सब के समक्ष एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है।


यूजर की टिप्पणी थी कि बिंदी वाली महिला ने दिखा दिया कि यह कैसे किया जाता है। यहां बिंदी एक ऐसी भारतीय महिला की पहचान के रूप में नजर आ रही है, जिसने विदेश में भी उसे माथे पर सजाए रखा है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि डॉ. स्वाति मोहन की काली बिंदी ने कई बनी-बनाई धारणाओं को ध्वस्त किया है, लेकिन ट्विटरजीवियों को सलाह है कि वे एक बार फिर 19 फरवरी, 2021 को नासा के कंट्रोल रूम में गूंजी उस गíवली आवाज की स्वामिनी डॉ. स्वाति मोहन की तस्वीर को दोबारा देखें। उनकी आंखों में टचडाउन से पहले की उत्सुकता और सफल लैंडिंग के बाद की खुशी के साथ भविष्य की योजनाओं की कल्पना और उन्हें पूरा करने की दृढ़ इच्छाशक्ति नजर आएगी। उनमें संस्कारों की गहराई दिखेगी। उनके उन्नत ललाट पर यहां तक पहुंचने के लिए किए गए उनके व्यापक परिश्रम और माता-पिता के संस्कारों की चमक भी दिखेगी।
काश, इंटरनेट मीडिया पर किसी ने मानव जाति के इतिहास के सबसे कठिन और भविष्योन्मुखी विज्ञान संबंधी परीक्षण में शामिल इस महिला के माता-पिता को भी याद करते हुए उन्हें बधाई दी होती। उन्हें इस लायक बनाने में महती भूमिका निभाने वाले शिक्षकों को याद किया होता। उनकी खुद की मेहनत को सलाम किया होता, जिसकी बदौलत न सिर्फ उन्हें अपने और परिवार के साथ देश का भी सिर ऊंचा किया है।

तमाम तरह के उल्टे-सीधे जतन भी करता है, लेकिन बहुत कम लोगों को यह नसीब हो पाता है। खास बात यह है कि इसका कोई फार्मूला भी नहीं होता है। पढ़े-लिखे और साधनसंपन्न माता-पिता के बच्चे नाकारा हो सकते हैं और फुटपाथ पर पलने वाला अपने सपने पूरा कर सकता है। यही लोग प्रेरणा के स्नोत और संघर्षो के प्रतीक बनते हैं, लेकिन हम उनकी वेशभूषा या अलंकारों की चर्चा नहीं करते हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का बखान करते हैं, ताकि उससे आने वाली पीढ़ियां सीख सकें और उनका अनुसरण कर सकें।


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