सम्पादकीय

रिफॉर्म पर सही हैं मोदी

Subhi
22 Jun 2022 3:40 AM GMT
रिफॉर्म पर सही हैं मोदी
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सेना की अग्निपथ योजना को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे विरोध के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को याद दिलाया कि कई बड़े महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सुधार भी शुरू में अनुचित लगते हैं

नवभारत टाइम्स; सेना की अग्निपथ योजना को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे विरोध के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को याद दिलाया कि कई बड़े महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सुधार भी शुरू में अनुचित लगते हैं, लेकिन समय के साथ वे न केवल सबके लिए लाभदायक साबित होते हैं बल्कि कई बार पूरे समाज को नए दौर में भी ले जाते हैं। हालिया अतीत पर एक सरसरी नजर डालने से भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं। अस्सी के दशक के मध्य में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देश को 21वीं सदी में ले जाने का नारा दिया और कंप्यूटराइजेशन की नीति पर जोर दिया। उस समय न केवल उनके इस नारे का मजाक बनाया गया बल्कि कंप्यूटरीकरण की नीति का भी यह कहकर तीव्र विरोध किया गया कि इससे देश में बेरोजगारी बढ़ेगी और यह कि ऐसी नीति विदेशों के लिए भले ठीक हो, भारत जैसे देश के लिए हानिकारक है। आज देखें तो कंप्यूटरीकरण के फायदे किसी को समझाने की जरूरत नहीं है। यह भी साफ है कि देश में कंप्यूटरीकरण की नीति लाने में जितनी देर की जाती हमें आगे चलकर उतना ही नुकसान होता।

ऐसे ही नब्बे के दशक के आरंभ में जब आर्थिक सुधार और उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई तो न केवल राजनीति की अलग-अलग धाराओं ने बल्कि बुद्धिजीवी तबके ने भी उसका घोर विरोध किया था। हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह पूरा विरोध निराधार था। खासकर शुरुआती दौर में लोगों को कई तरह की कठिनाइयों से गुजरना पड़ा, लेकिन आर्थिक सुधारों की वह प्रक्रिया जारी रखने का ही नतीजा था कि जल्दी ही भारत की गिनती दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होने लगी। आर्थिक सुधार और उदारीकरण की नीति के फायदों ने पूरे समाज के हर हिस्से को इस तरह से प्रभावित किया है कि आज राजनीति और चिंतन की कोई भी धारा आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाती। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे ज्वलंत उदाहरण मौजूद होने के बावजूद राजनीति तात्कालिकता के दबाव से मुक्त नहीं हो पाती। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उनके कार्यकाल में भी भूमि अधिग्रहण कानून जैसी महत्वपूर्ण पहल को कांग्रेस के विरोध के दबाव में वापस ले लिया गया। ऐसे ही कृषि सुधार से जुड़े तीन महत्वपूर्ण कृषि कानूनों पर किसानों का इतना लंबा आंदोलन चला कि आखिरकार सरकार को वे तीनों कानून वापस लेने पड़े। अब अग्निपथ योजना का भी भारी विरोध हो रहा है। इस विरोध की वजह से सरकार को इसे आकर्षक बनाने के लिए कुछ और रियायतों का एलान करना पड़ा। यह सही है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनमत का सम्मान करना होता है। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि तात्कालिक कठिनाइयों के प्रभाव में दूरगामी सुधारों को टालना सबके लिए नुकसानदेह होता है।


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