सम्पादकीय

एकजुटता का संदेश

Subhi
22 Nov 2022 8:51 AM IST
एकजुटता का संदेश
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इजिप्ट के शर्म-अल-शेख में संपन्न हुए यूएन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस कॉप 27 ने जलवायु और पर्यावरण की कसौटियों पर पृथ्वी के भविष्य को लेकर आशा जगाई है। जिस शिद्दत से इस सम्मेलन में शामिल देशों के प्रतिनिधियों ने आखिरी पलों तक लगे रहकर लॉस एंड डैमेज फंड बनाने पर सहमति हासिल की, वह कई वजहों से ऐतिहासिक है।

नवभारत टाइम्स: इजिप्ट के शर्म-अल-शेख में संपन्न हुए यूएन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस कॉप 27 ने जलवायु और पर्यावरण की कसौटियों पर पृथ्वी के भविष्य को लेकर आशा जगाई है। जिस शिद्दत से इस सम्मेलन में शामिल देशों के प्रतिनिधियों ने आखिरी पलों तक लगे रहकर लॉस एंड डैमेज फंड बनाने पर सहमति हासिल की, वह कई वजहों से ऐतिहासिक है। और हां, ये आखिरी पल भी सम्मेलन की तय मियाद बीत जाने के बाद 40 घंटे तक जारी रहे, तब जाकर यह सहमति बन सकी। वैसे, भरपाई के लिए कोष बनाने का विचार अपने आप में नया नहीं है।

2015 के बहुचर्चित पेरिस जलवायु समझौते में भी इसका जिक्र है। बावजूद इसके यह सहमति हासिल कर लेना बड़ी बात है क्योंकि एक तो यह कि इसके जरिए दुनिया के तमाम बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों ने यह स्वीकार किया है कि पर्यावरण को निर्णायक तौर पर बिगाड़ने में उनकी भूमिका रही है और दूसरे, यह इक्का-दुक्का राष्ट्रों की बात नहीं है। कॉप 27 में फैसले सर्वसम्मति के आधार पर होते हैं। इसका मतलब यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे नुकसान से निपटने के सामूहिक प्रयासों को लेकर दुनिया भर के निर्णयकर्ताओं में एक आम सहमति बन गई है।

फिर भी यह नहीं मानना चाहिए कि आगे की राह आसान है। कारण एक तो यह है कि इस सहमति को लेकर भी अहम व्यावहारिक पहलुओं पर बातचीत होनी अभी बाकी है। इसके लिए एक ट्रांजिशनल कमिटी बनाई गई है, जो इस सहमति को अमल में लाने के तरीके सुझाएगी। दूसरी बात यह है कि अमीर देश आर्थिक योगदान पर किए जाने वाले बड़े-बड़े वादों को निभाने के मामले में अभी तक खास भरोसेमंद नहीं साबित हुए हैं। बहरहाल, इस सम्मेलन की एक और उपलब्धि रही हर तरह के फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) का उपयोग कम करने और बंद करने पर बनी सहमति। ध्यान रहे, ग्लासगो में पिछले साल हुए सम्मेलन में भी कोयले का इस्तेमाल कम करने पर सभी देश राजी हुए थे, लेकिन तेल और गैस पर तब चुप्पी साधे रखी गई थी।

भारत के सक्रिय हस्तक्षेप की बदौलत इस बार सभी जीवाश्म ईंधनों को प्रतिबद्धता के दायरे में शामिल कर लिया गया। आगे की चुनौतियों का जहां तक सवाल है तो इस एक तथ्य पर नजर डालना भी इसकी जटिलता स्पष्ट कर देता है कि कॉप 27 के ही बयान के मुताबिक लो-कार्बन इकॉनमी में वैश्विक रूपांतरण तभी संभव है, जब इस मद में 4-6 लाख करोड़ डॉलर सालाना निवेश किया जाए। ध्यान रहे पिछले साल जापान का जीडीपी 4.9 लाख करोड़ डॉलर था। जाहिर है, कॉप 27 की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि इसके जरिए हम कितना आगे बढ़े। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि हमने सही दिशा में कदम बढ़ाने का संकल्प ले लिया है और मौजूदा हालात में यह कोई छोटी बात नहीं है, बशर्ते कि हम इस संकल्प से पीछे न हटें।


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