सम्पादकीय

मेंटल हेल्थ की चुनौती

Subhi
1 Nov 2021 2:42 AM GMT
मेंटल हेल्थ की चुनौती
x
नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी किए गए साल 2020 के दौरान आत्महत्या और दुर्घटना में हुई मौतों के आंकड़े इस लिहाज से भी अहम हैं

नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ओर से जारी किए गए साल 2020 के दौरान आत्महत्या और दुर्घटना में हुई मौतों के आंकड़े इस लिहाज से भी अहम हैं कि पहली बार इनसे कोरोना के आम लोगों के जीवन और खासकर उनके दिलो-दिमाग पर पड़े असर की पुष्टि होती है। कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने सामान्य जीवन को जिस तरह से तहस-नहस कर दिया था, उसे देखते हुए यह आम धारणा थी कि कमजोर दिल-दिमाग वाले लोगों के लिए इसे सहन करना खासा मुश्किल रहा होगा। एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि आत्महत्या के मामलों में 2019 के मुकाबले इस साल 10 फीसदी इजाफा हुआ है। 2020 में आत्महत्या से कुल 153,053 मौतें हुई हैं, जो 1967 के बाद से सबसे ज्यादा हैं। आत्महत्या करने वाले इन लोगों में सबसे ज्यादा संख्या (24.6 फीसदी) दिहाड़ी पर काम करने वालों की है। लॉकडाउन का सबसे मारक प्रभाव इन्हीं लोगों की आजीविका पर पड़ा था। लेकिन अगर पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी का प्रतिशत देखा जाए तो सबसे ज्यादा प्रभावित तबके के रूप में उभरते हैं स्टूडेंट्स। अमूमन हर साल खुदकुशी करने वालों में स्टूडेंट्स 7-8 फीसदी होते हैं, लेकिन साल 2020 में इनका प्रतिशत 21.2 दर्ज किया गया है।

असल में, लॉकडाउन के कारण जिस तरह से अचानक सारे स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए, उसका बच्चों पर जबर्दस्त असर पड़ा। न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई बल्कि स्कूल-कॉलेज का माहौल छूट गया, दोस्तों से मिलना-जुलना बंद हो गया और उनका पूरा जीवन घर की चारदीवारी तक सिमट कर रह गया। 68 दिन लंबे लॉकडाउन के बाद जीवन के अन्य क्षेत्र धीरे-धीरे खुलना शुरू भी हुए, लेकिन स्कूल कॉलेज बंद ही रहे। इस बीच ऑनलाइन क्लास के जरिए पढ़ाई का सिलसिला शुरू भी हुआ तो उन बच्चों की हताशा और बढ़ गई जिनकी डिजिटल उपकरणों तक पहुंच नहीं थी। और, ऐसे स्टूडेंट्स की संख्या कम नहीं थी। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में 2.9 करोड़ स्टूडेंट्स स्मार्टफोन, कंप्यूटर आदि उपकरणों तक पहुंच न होने के चलते पढ़ाई की व्यवस्था से कट गए थे। वैसे इन सबके बीच ही लॉकडाउन का एक पॉजिटिव पहलू यह रहा कि साल 2020 में सड़क हादसों से होने वाली मौतों का आंकड़ा काफी नीचे आया। इस साल सड़क हादसों में कुल 374,397 मौतें हुईं , जो 2019 के मुकाबले 11.1 फीसदी कम हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो ये आंकड़े एक ऐसी चुनौती से गुजरने के निशान बयां करते हैं जिसका हमें पहले से कोई अंदाजा नहीं था और जिससे हम अभी भी पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाए हैं। बहरहाल, इन आंकड़ों की रोशनी में नीतियों को काट-छांट कर ज्यादा उपयुक्त, ज्यादा सटीक बनाने का काम बेहतर ढंग से हो सकता है।

Next Story