सम्पादकीय

मणिपुर संकट — हिंसा का दौर फिर लौटा

nidhi
1 Oct 2026 8:53 AM IST
मणिपुर संकट — हिंसा का दौर फिर लौटा
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मणिपुर संकट
मणिपुर में बढ़ती हिंसा उस संवेदनशील इलाके में मौजूद बड़े पैमाने पर जातीय मतभेदों की एक गंभीर याद दिलाती है, जो कभी भी भड़क सकते हैं। अशांत पूर्वोत्तर राज्य के इस संकट को अब सिर्फ़ दो समुदायों—मैतेई और कुकी—के बीच की लड़ाई के तौर पर नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह एक लंबे समय से चल रहा और व्यापक संघर्ष बन गया है। हिंसा के ताज़ा दौर में नागा और कुकी समुदाय भी शामिल हैं और यह उखरुल, कामजोंग, सेनापति और कांगपोकपी तक फैल गया है, जिससे प्रशासन के लिए एक नया और ज़्यादा मुश्किल मोर्चा खुल गया है। मैतेई और कुकी लोगों के भौगोलिक रूप से अलग-अलग इलाकों में रहने के उलट, नागा और कुकी समुदाय पहाड़ियों में एक-दूसरे के साथ मिले-जुले रूप में रहते हैं।
सड़कें और हाईवे इन मिली-जुली बस्तियों से होकर गुज़रते हैं, जिससे आम लोगों की आवाजाही और सुरक्षा का प्रबंधन दोनों ही ज़्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं। इस साल फरवरी में चुनी हुई सरकार की वापसी को लेकर जो उम्मीद जगी थी, वह अब खत्म होती दिख रही है और उसकी जगह फिर से निराशा ने ले ली है। सेनापति और कामजोंग में हालिया हमलों में कई बेगुनाह नागरिकों की जान गई है। मणिपुर में कई अलग-अलग जातीय समूह रहते हैं, जिनमें तीन मुख्य समूह हैं—मैतेई, नागा और कुकी-ज़ो। मई 2023 में राज्य में मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से 260 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इसकी शुरुआत मैतेई समुदाय (जिनमें ज़्यादातर हिंदू हैं) की 'अनुसूचित जनजाति' का दर्जा पाने की मांग और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुकी समुदाय (जिनमें ज़्यादातर ईसाई हैं) के कड़े विरोध से हुई थी। मणिपुर का संकट गहरे और लंबे समय से चले आ रहे जातीय टकराव को दिखाता है, जो अब कई पहलुओं वाले संघर्ष में बदल गया है और जिसमें भारी मानवीय नुकसान हुआ है।
जो संघर्ष मुख्य रूप से मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच गंभीर टकराव के तौर पर शुरू हुआ था, उसमें अब समय-समय पर होने वाली नागा-कुकी दुश्मनी समेत इलाके के दूसरे मुद्दे भी जुड़ गए हैं। तीन साल से ज़्यादा समय से चल रही अशांति के कारण सैकड़ों लोगों की मौत हुई है, हज़ारों लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में रह रहे हैं, और पहाड़ी व घाटी इलाकों के बीच ज़मीन और समाज को लेकर गहरा बंटवारा हो गया है। राज्य अदृश्य सीमाओं और मज़बूत जातीय इलाकों में बुरी तरह बंटा हुआ है, जिससे रोज़मर्रा के जीवन में मेल-मिलाप बहुत मुश्किल हो गया है।
हालांकि सुरक्षा बलों की तैनाती से हिंसा की छिटपुट घटनाओं को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने से लोगों की सामाजिक-राजनीतिक शिकायतों का समाधान नहीं हो सकता। केंद्रीय गृह मंत्रालय को सभी जातीय और राजनीतिक पक्षों को एक व्यवस्थित बातचीत के लिए साथ लाने में सक्रिय भूमिका निभाने की तत्काल आवश्यकता है। आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की स्थितियों, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा में सुधार के लिए भी ठोस प्रयास किए जाने चाहिए ताकि उनके सुरक्षित पुनर्वास का रास्ता साफ हो सके। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भूमि, आदिवासी अधिकारों और प्रतिनिधित्व से जुड़े विवादों को भारत के संवैधानिक दायरे में रहकर ही सुलझाना आवश्यक है। इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यभार संभालने के बाद से नागा-कुकी संघर्षों में 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। राजनीतिक नेताओं को शांति बहाली को केवल एक सुरक्षा अभियान मानने से बचना चाहिए। मणिपुर को हिंसा के प्रबंधन से कहीं अधिक की आवश्यकता है। इसे निरंतर राजनीतिक बातचीत, जवाबदेही, कमजोर समुदायों की सुरक्षा और ऐसी स्थितियों की आवश्यकता है जो विस्थापित लोगों को सुरक्षित रूप से लौटने में सक्षम बनाएं।
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