सम्पादकीय

मनुष्‍यता समूह में ही समृद्ध हो सकती है, संसाधनों पर अकेले कब्‍जा करके नहीं

Gulabi
25 Nov 2021 5:24 PM GMT
मनुष्‍यता समूह में ही समृद्ध हो सकती है, संसाधनों पर अकेले कब्‍जा करके नहीं
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अकसर दुनिया के जाने-माने हेल्‍थ जरनल्‍स में ऐसी स्‍टडी और साइंटिफिक रिसर्च छपती रहती है
मनीषा पांडेय। अकसर दुनिया के जाने-माने हेल्‍थ जरनल्‍स में ऐसी स्‍टडी और साइंटिफिक रिसर्च छपती रहती है, जिसे पढ़कर मन में सवाल उठता है कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हम आगे जा रहे हैं या पीछे. जो बातें आज दुनिया के प्रतिष्ठित हेल्‍थ जरनलों में छप रही हैं, ऑक्‍सफोर्ड और कैंब्रिज जिस पर स्‍टडी कर रहे हैं, वो बातें तो इंसान को इस मशीनी प्रतिद्वंद्विता के युग से पहले भी न सिर्फ पता थीं, बल्कि वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्‍सा थीं.
जैसे कुछ दिन पहले ऑक्‍सफोर्ड की एक स्‍टडी के हवाले से हमने बताया था कि आज मेडिकल स्‍कूल ये स्‍टडी करके हमें बता रहे हैं कि ग्रैंडपैरेंट्स बच्‍चों के समुचित और संतुलित विकास के लिए कितने अहम हैं, लेकिन क्‍या सचमुच ये समझने के लिए हमें ऑक्‍सफोर्ड की स्‍टडी की जरूरत थी. क्‍या हमारे पूर्वज, हमारी दादियां-नानियां इस बात को पहले से नहीं जानती थीं.
उसी तरह की ये एक स्‍टडी है, जो ब्रिटेन के प्रतिष्ठित जरनल "ब्रिटिश जरनल ऑफ मैनेजमेंट" में छपी है. ये स्‍टडी कह रही है कि जब लोग अपने कार्यस्‍थल पर कंपनी के हेल्‍थ प्रोग्राम और वेलफेयर प्रोग्राम में हिस्‍सेदारी करते हैं और जो कंपनियां हर तरह के हेल्‍थ और वेलफेयर प्रोग्राम्‍स को गंभीरता से लेते हुए उसमें इन्‍वेस्‍ट करती हैं तो इसका वर्कप्‍लेस पर बहुत सकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है. कर्मचारियों के आपसी संबंध, सौहार्द्र और विश्‍वास मजबूत होता है, कर्मचारियों के स्‍वास्‍थ्‍य और उनकी कार्यक्षमता में सकारात्‍मक बदलाव होता है और कंपनी के साथ उनका संबंध मजबूत होता है.
कुल मिलाकर यह स्‍टडी कहती है कि किसी भी कंपनी के लिए अपने कर्मचारियों के वेलइीइंग यानि उनके मानसिक और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य प्रोग्राम्‍स में इन्‍वेस्‍ट करना एक जरूरी और सकारात्‍मक कदम है. साथ ही स्‍अडी ये भी कहती है कि इस तरह की साझेदारी से वर्कप्‍लेस बुलिइंग यानि कार्यस्‍थल पर किसी को परेशान करने, प्रताडि़त करने या किसी भी बहाने और तरीके से परेशान करने की घटनाओं में भी कमी आती है. कर्मचारियों का मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य बेहतर होता है, उनके आपसी संबंध मजबूत होते हैं. कर्मचारियों के साथ कंपनी के डेवलपमेंट के लिए भी ये एक बेहतर कदम है.
अब यहां दिक्‍कत उस बात से नहीं है, जो ब्रिटेन के सबसे प्रतिष्ठित जनरल में सर्वे और स्‍टडी के बाद छपी रिपोर्ट कह रही है. सोचने वाली बात ये है कि इस इतने सहज और आसानी से समझ में आने वाली बात लोगों और कंपनियों को बताने के लिए हमें स्‍टडी करने की जरूरत है. क्‍या यह सहज बुद्धि से समझ में आने वाला तर्क नहीं है कि अगर कंपनी अपने कर्मचारियों की परवाह करेगी, उनका ख्‍याल रखेगी, सिर्फ कंपनी के काम के बारे में नहीं, बल्कि कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य से लेकर उनके निजी विकास तक के बारे में सोचेगी तो जाहिर है कंपनी का भी इसमें फायदा ही होगा.
मनुष्‍य आपसी सद्भाव और आपसी सहयोग के महत्‍व को इन अध्‍ययनों और रिसर्चों से पहले भी जानता और मानता रहा है. न्‍यूक्‍लीयर परिवार, एक-दूसरे से कटा हुआ आइसोलेशन में जी रहा समाज इस मशीनी आधुनिक युग की देन है. इंसान कभी एक-दूसरे से कटकर रहने का आदी नहीं रहा. मनुष्‍यता का विकास हमेशा समूह में, एक-दूसरे के साथ, एक-दूसरे के सम्मिलित विकास पर ही निर्भर रहा है. दूसरे को गिराकर अकेले ऊपर उठ जाने, अकेले पा लेने का आइडिया प्रतियोगिता के इस युग की देन है. इंसानी समाज हमेशा से ऐसे नहीं थे. वो हमेशा समूह में रहते और समूह में काम करते आए हैं.
एक अमेरिकी जर्नलिस्‍ट का अफ्रीका के एक आदिवासी समुदाय के बीच किया गया ये प्रयोग अकसर समाज विज्ञान के अध्‍ययनों में दोहराया जाता रहा है. एक बार एक अमेरिकी जर्नलिस्‍ट युगांडा के आदिवासी समूह में गया और उसने वहां बच्‍चों के बीच एक रेस करवाई. एक टोकरी में बहुत सारे फल थे. उसने बच्‍चों से कहा कि दौड़ में जो फर्स्‍ट आएगा, उसे फलों की ये टोकरी मिलेगी.
बच्‍चे जोर लगाकर दौड़े और जो बच्‍चा सबसे आगे रहा, जर्नलिस्‍ट ने उसे फलों की वो टोकरी दे दी. लेकिन ये देखकर उसे आश्‍चर्य हुआ कि वो सारे फल जीतने वाले बच्‍चे ने अकेले नहीं खाए. सारे बच्‍चे उस टोकरी के गिर्द घेरा बनाकर बैठ गए और सब के सब उन फलों को मिल-बांटकर खाने लगे.
जो सबसे काबिल है, उसे सबसे ज्‍यादा मिलेगा और उसके अकेले को ही मिलेगा और उसके हासिल में बाकियों का कोई हिस्‍सा नहीं होगा, ये दर्शन पूंजीवाद की देन है. इतिहास की नहीं. समूहों में रहने वाले समाज अपने संसाधनों को आपस में मिल-बांटकर ही खाते रहे हैं. ये आधुनिक शहरों में होता है कि किसी घर में पकवान बना हो और उसके बगल के घर में खाने को भी न हो और किसी को पता भी न चले. ऐसे गांवों में, आदिवासी इलाकों में नहीं होता कि किसी एक घर में चूल्‍हा न जले और बाकी घरों को इसकी भनक भी न लगे.
ब्रिटेन के जनरल में छपी रिपोर्ट अच्‍छी है. उसका सार और संदेश अच्‍छा है. उसका मकसद जरूरी है और उसका अर्थ गहरा. दो साल पहले ब्रिटेन ने अपने देश में लोनलीनेस मिनिस्‍टर की नियुक्ति की थी क्‍योंकि लोगों में बढते अवसाद, अकेलेपन और डिप्रेशन के आंकड़े चौंकाने वाले थे. डिप्रेशन, अकेलापन बढ़ ही इसलिए रहा है कि लोगों का आपस में जो कनेक्‍ट होना चाहिए, वो नहीं है. सरकार और समाज अपने नागरिकों को वो सुरक्षा देने में नाकाम हुई हैं, जो एक स्‍वस्‍थ जीवन की बुनियाद है.
आखिर ये सर्वे भी तो यही कह रहा है कि कंपनी और कर्मचारी दोनों तब उन्‍नति करते हैं, जब दोनों एक-दूसरे के हितों के प्रति जुड़ाव महसूस करें, एक-दूसरे का ख्‍याल करें, एक दूसरे के स्‍वास्‍थ्‍य और मन की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हों.
इस स्‍टडी के गहरे निहितार्थ यहीं हैं कि मनुष्‍यता समूह में ही समृद्ध हो सकती है, अकेले, सबसे कटकर, सारे स्रोतों और संसाधनों पर अकेले कब्‍जा करके और अकेले उसको भोगकर नहीं. भले एक ही रोटी हो, बांटकर खाएं तो देह में ज्‍यादा लगती है.
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