सम्पादकीय

वृद्धों के लिए महामारी स्वरूप है अकेलापन, बुजुर्गो के हितों के अनुरूप बने नीति

Triveni
8 Jun 2021 4:51 AM GMT
वृद्धों के लिए महामारी स्वरूप है अकेलापन, बुजुर्गो के हितों के अनुरूप बने नीति
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कोविड महामारी ने मानव अस्तित्व के सभी क्षेत्रों पर व्यावहारिक रूप से अपनी छाप छोड़ी है।

संजय पोखरियाल| कोविड महामारी ने मानव अस्तित्व के सभी क्षेत्रों पर व्यावहारिक रूप से अपनी छाप छोड़ी है। इस संकट ने खासकर हमारे बुजुर्गो के सामने प्रतिदिन आने वाली समस्याओं का समाधान निकालने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला है। यह भी स्पष्ट हो रहा है कि हमारे अधिकांश बुजुर्ग आíथक रूप से लाचार होते जाएंगे। दरअसल मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली वृद्धावस्था को एक 'रोगी' के रूप में देखती है। यह रोग-केंद्गित दृष्टिकोण उनके मनोबल को नुकसान पहुंचाता है और स्वास्थ्य को खराब करता है। एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, नौकरी से संबंधित प्रवासन, सामाजिक मानदंडों में बदलाव और बड़ों के बीच स्वतंत्र रहने की बढ़ती प्राथमिकता उन्हें और भी कमजोर बनाती है। वैसे हम अपनी सेवानिवृत्ति के बाद स्वस्थ, आरामदायक और खुशहाल जीवन का सपना देखते हैं। दुर्भाग्य से अधिकांश लोग आर्थिक कारणों से इस सपने को पूरा नहीं कर पाते हैं।

अभी तक के लक्षणों से पता चलता है कि कोविड महामारी की गंभीरता और परिणाम काफी हद तक उम्र पर निर्भर है। 65 वर्ष से अधिक उम्र के अधिकांश बुजुर्गो को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है और 65 वर्ष से कम उम्र के लोगों की तुलना में उनका जीवन 20 गुना अधिक खतरे में होता है। हालांकि संक्रमण के संभावित जोखिम में होना ही हमारे बुजुर्गो को बेचैन नहीं रखता है। कई बार वे एकांत, विवशता और आर्थिक तंगी का भी सामना करते हैं।
अलगाव और अनिश्चितता का सामना करने के साथ ही 'कोरोना लाकडाउन और कफ्यरू' ने उनके डर को और बढ़ा दिया है। यह शारीरिक से अधिक मनोवैज्ञानिक है। अकेलापन और कहीं आने-जाने की पाबंदी ने बुजुर्गो की गतिविधियों जैसे पार्क में नियमित रूप से टहलने और बातचीत करने, परिचितों के साथ बैठकें करने, स्वैच्छिक सेवा और सामाजिक देखरेख, सामुदायिक सभाओं आदि में भाग लेने को सीमित कर दिया है।
नवाचार और समावेश : युवावस्था में अकेलापन, नीरसता और थकान को रोकने के लिए इंटरनेट मीडिया पर निर्भरता एक उपकरण के रूप में कार्य कर सकती है, लेकिन वृद्धावस्था में सामाजिक सहयोग, जीवनयापन और दैनिक कामकाज की आवश्यकता पहले जैसी बनी हुई है। समाज को इस दिशा में कदम बढ़ाने और योगदान देने की जरूरत है।
कई पड़ोसियों और निवासी कल्याण संघों ने पिछले दिनों यह दिखाया है कि ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यमों से जुड़े वृद्धजन आखिरकार अकेलापन रूपी 'महामारी' से निपटने के लिए तत्पर दिख रहे हैं। डिजिटल सामाजिक सहायता नेटवर्क तथा अपनेपन की कथित भावना प्रदान करने के लिए अब ऑनलाइन तकनीकों और डिजिटल स्रोतों का उपयोग किया जाता है। यदि तकनीक और बुजुर्गो की जरूरतों के बारे में अधिक समझ से तालमेल हो जाए, तो वे कहीं अधिक स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
जनसांख्यिकीय वास्तविकता : भारत जनसांख्यिकी परिवर्तन के चरण में है। हमारी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक जीवन प्रत्याशा में नाटकीय वृद्धि है। हममें से अधिकांश अपने माता-पिता की तुलना में अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं। यह स्वास्थ्य प्रवृत्ति के संदर्भ में एक अच्छी खबर है। हमारी जनसांख्यिकी वर्ष 2040 में चरम पर पहुंच जाएगी। इस लिहाज से अगले दो दशक परिवर्तनकारी हैं। भारत उस जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग कर रहा है जिसने एक बढ़ते कार्यबल, उच्च अवशिष्ट आय, स्थायी निवेश और तेजी से विकास का एक अनुकूल चक्र शुरू कर दिया है। हमारे बड़े और संपन्न उच्च मध्यम वर्ग उपभोग में बढ़ोतरी का नेतृत्व कर रहे हैं। इस दशक में हर साल कामकाजी आबादी लगभग एक करोड़ बढ़ेगी। कई अन्य संकेत भी हैं। इसे आंकड़ों से समझते हैं। भारत की आधी आबादी 30 साल से कम उम्र की है। प्रजनन दर में गिरावट आई है। वर्ष 2050 तक भारत की आबादी 30 प्रतिशत तक बढ़ेगी, लेकिन इस दौरान हमारी 'वृद्ध' आबादी करीब 250 प्रतिशत बढ़ जाएगी। बुजुर्ग नागरिक जनसंख्या का दसवां हिस्सा हैं, जो 25 साल बाद पांचवें स्थान पर होंगे। चिंता की बात यह कि विकासशील देश अपने नागरिकों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करा सकता है।
पेंशन और कल्याण में निवेश, अन्य उत्पादक निवेश की कीमत पर होता है। निवेश करने की दिशा में यह एक बड़ी बाधा है। बुजुर्गो का उपभोग पैटर्न विकास केंद्गित नहीं है। कुल मिलाकर यह खपत के पांचवें हिस्से तक गिर सकता है। इससे हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर बुजुर्गो का भार बढ़ेगा और कई अन्य वास्तविक आíथक चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, प्रतिकूल जनसांख्यिकी में कहीं बड़ी आíथक अनिवार्यताएं भी हैं। इससे अधिक गंभीर नकारात्मक पहलू यह है कि राजकोषीय संतुलन बिगड़ रहा है और प्रतिस्पर्धा कम हो रही है। यह बिगड़ती व्यापक आíथक स्थिति, जीवन स्तर को कम करने और जीवन की गुणवत्ता को कम करने के रूप में सामने आता है।
बढ़ता सामाजिक दुष्प्रभाव : देश के 15 राज्यों में करीब 45 हजार बुजुर्गो के बीच किए गए एक हालिया अध्ययन ने इसे आंकड़ों के तौर पर और स्पष्ट किया है। हमारे देश में बुजुर्गो का केवल एक चौथाई हिस्सा आíथक रूप से स्वतंत्र है। अधिकांश बुजुर्ग आíथक सुरक्षा के लिए पूरी तरह से बच्चों और समाज पर निर्भर हैं। 75 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग अपने बेटों के साथ रहते हैं, जबकि करीब 10 प्रतिशत अपनी बेटियों के साथ रह रहे हैं। अधिकांश बुजुर्गो ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें सम्मान की कमी, उपेक्षा और यहां तक कि मौखिक र्दुव्‍यवहार का सामना भी करना पड़ता है। इस अध्ययन में कहा गया है कि सरकार की उदासीनता ने हमारे बुजुर्गो को निराश कर दिया है। समाज की उदासीनता ने उन्हें चिड़चिड़ा बना दिया है। 95 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग राज्य से मुफ्त चिकित्सा उपचार पाने की उम्मीद करते हैं। हालांकि अभी तक उन्हें इस तरह की कोई सुविधा नहीं मिली है। यह अवश्य है कि अनेक राज्य सरकारों द्वारा जरूरतमंदों को पेंशन दिया जाता है। वैसे पेंशन की रकम कितनी है, यह एक अलग मसला है।
ग्रामीण भारत की स्थिति और भी खराब है, जहां करीब 70 प्रतिशत बुजुर्ग रहते हैं। बुजुर्ग महिलाओं पर पड़ने वाला प्रभाव अधिक परेशान करता है, क्योंकि पुरुषों की तुलना में जीवित रहने की दर महिलाओं में अधिक है। महिलाएं अपने पूरे जीवन में आíथक रूप से कमजोर स्थिति में होती हैं, जो उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है।
हमारे नीति निर्माताओं ने जनसांख्यिकीय 'लाभांश' से संबंधित तमाम नासमझी को आधार बनाते हुए लोगों को गुमराह किया है। सरकार ने कई ऐसे प्रविधान किए हैं, ताकि बुजुर्गो के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने और उनके कल्याण के लिए भोजन, आश्रय, कपड़े और चिकित्सा देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जा सकें। इस योजना का विस्तार किया गया है और इसके लिए अनेक बुजुर्ग देखभाल केंद्रों की शुरुआत भी की गई है। इसके लिए एक अधिनियम भी बनाया गया है, जो बच्चों और रिश्तेदारों के लिए माता-पिता का जीवन भर ध्यान रखने को अनिवार्य बनाकर बुजुर्गो की भलाई सुनिश्चित करने की पहल करता है। हालांकि इस अधिनियम का प्रारूप तैयार करते हुए बहुत सी व्यावहारिक चीजों का ध्यान नहीं रखा गया है और न ही इसका उस स्तर तक प्रचार-प्रसार किया गया है, ताकि इस अधिनियम के जरिये वैसे जरूरतमंद बुजुर्गो तक मदद पहुंच सके, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है।
इस संबंध में कई अन्य देशों में उदाहरण अनुकरण योग्य हैं। चीन के बुजुर्ग, भारतीय परंपरा की तरह लंबे समय तक बच्चों से सहयोग लेते थे, लेकिन अब वहां बहुत कुछ बदल गया है। दुनिया भर में सबसे उदार और अविश्वसनीय रूप से व्यापक देखभाल प्रणालियों के बीच जापान ने दीर्घकालिक देखभाल बीमा की शुरुआत की है। कई अन्य देशों ने अपने बुजुर्गो की समुचित देखभाल के लिए कुशल पैरामेडिकल सहायता में निवेश किया है।
इसमें निजी क्षेत्र की भी भूमिका है। उन्हें बदलते जीवनकाल परितंत्र का पूर्वानुमान लगाने और भविष्य के वेतन भुगतान का प्रारूप तैयार करने समेत समग्र कल्याण कार्यक्रमों में निवेश करने की आवश्यकता होगी। वहीं दूसरी ओर सरकार को योग्यता आधारित पेंशन की शुरूआत करनी चाहिए। आगामी दशकों के लिए कुछ मामलों में रणनीति अभी से तैयार करनी होगी। मसलन हमें स्कूलों से अधिक वृद्धाश्रमों की आवश्यकता होगी। इसका ढांचा अभी से ही तैयार करना होगा। अधिक समग्र रूप में नीतियों को तैयार करना अर्थात बुढ़ापे में उनकी मदद करना, लंबे समय तक उन्हें अधिकतम आत्मनिर्भर और न्यूनतम निर्भर बनाना, स्थायी रूप से उनकी सक्रियता को कायम रखने का इंतजाम करना और उससे भी अधिक गरिमापूर्ण स्वतंत्र जीवन प्रदान करना महत्वपूर्ण है।
देखा जाए तो हमारी कल्याणकारी योजना गतिमान नहीं रह सकती। जिस तरह से सामाजिक प्रवृत्ति निरंतर बदल रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि बुजुर्गो को संयुक्त परिवारों, जो खुद अत्यधिक मांग और अधिक तनाव में होते हैं, उनसे ज्यादा सहयोग नहीं मिलेगा। हमारे नीति नियंताओं को इसे समग्रता में देखना होगा। हमारी जनसंख्या में बुजुर्गो का हिस्सा 10 प्रतिशत है। हम पेंशन पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का 0.03 प्रतिशत से भी कम खर्च करते हैं और वह भी 10 में से केवल एक को ही इसका फायदा देते हैं।
ऐसे में हमारे नेतृत्व को बुजुर्गो की सुविधा के लिए अपनी राजनीतिक पूंजी और समर्थन का इस्तेमाल करना होगा। भारत का सामाजिक ढांचा अब मजबूत नहीं है। यह समय है जब राज्य हर बुजुर्ग को एक बुनियादी आय सहायता प्रदान करे, ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। हमने सामाजिक विकास के मोर्चे पर कई अच्छे मानक गढे हैं। समय आ गया है जब हमें अपने बुजुर्गो के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए।




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