सम्पादकीय

दिवाली पर जगाएं मन का दीपक, जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व

nidhi
6 Nov 2026 12:02 PM IST
दिवाली पर जगाएं मन का दीपक, जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व
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अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है दिवाली
हर साल, जैसे-जैसे दिवाली करीब आती है, हम अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े खरीदते हैं और हर कोने को दीयों से सजाते हैं। सड़कें रोशनी से जगमगा उठती हैं, बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ती है, लेकिन फिर भी, कई लोगों के मन के भीतर अंधेरा और बेचैनी बनी रहती है। क्या यह अजीब बात नहीं है कि रोशनी का यह त्योहार अब 'प्रकाश' से ज्यादा 'दिखावे' का त्योहार बन गया है? परंपरा के अनुसार, दिवाली अंधेरे के अंत का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी राक्षस नरकासुर के विनाश का प्रतीक है, जो शारीरिक चेतना और बुराइयों को दर्शाता है। यह केवल बाहर के किसी राक्षस का वध नहीं, बल्कि भीतर की दैवीय शक्ति की जीत है। इसलिए, यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जब हर आत्मा उस परम प्रकाश से जुड़ती है, तो वह स्वयं प्रकाशित हो उठती है—ठीक वैसे ही, जैसे वह कभी 'स्वर्ण युग' में हुआ करती थी। लेकिन अपने आस-पास देखिए। कृत्रिम रोशनी की भरमार होने के बावजूद, इंसानी मन डर, लालच और असंतोष के अंधेरे से घिरा हुआ है। हम धन के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा तो करते हैं, लेकिन क्या हमें याद है कि वे वहीं वास करती हैं जहाँ पवित्रता और शांति होती है? सच्ची समृद्धि हमारे पास क्या है, इसमें नहीं, बल्कि हम दूसरों के साथ क्या साझा करते हैं, इसमें निहित है।
हमारे पूर्वजों ने दिवाली को केवल धन या सफलता के त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक नवीनीकरण के प्रतीक के रूप में मनाया था। चाहे वह श्री राम की अयोध्या वापसी हो, समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का प्रकट होना हो, या भगवान महावीर को ज्ञान की प्राप्ति—इन सबका संदेश एक ही था: अशुद्धता पर शुद्धता की जीत, अज्ञान पर ज्ञान की जीत, और शरीर पर आत्मा की विजय। मिट्टी से बने एक साधारण दीये के बारे में सोचिए, जो चुपचाप एक मंद लेकिन स्थिर लौ के साथ जलता रहता है। यह हमें याद दिलाता है कि असली सुंदरता इस बात में नहीं है कि रोशनी कितनी तेज है, बल्कि इस बात में है कि उसे जलाने वाला ईंधन क्या है। जिस तरह लौ को जलने के लिए तेल की जरूरत होती है, उसी तरह हमारी आत्मा को भी चमकने के लिए 'दिव्य ज्ञान' रूपी तेल की आवश्यकता होती है। जब वह आंतरिक प्रकाश प्रज्वलित होता है, तो अज्ञान, भय या दुख का अंधेरा टिक नहीं पाता।
इसलिए, इस दिवाली, कोई और सजावटी दीया जलाने से पहले, एक पल के लिए रुकें। खुद से पूछें: क्या मैंने अपने मन में जागरूकता का दीया जलाया है? क्या मैंने किसी और के जीवन का मार्ग रोशन करने में मदद की है? पटाखे जलाने के बजाय, अपने भीतर की बुराइयों को जलाएं। शोर बढ़ाने के बजाय, शांति फैलाएं। दूसरों से आशीर्वाद मांगने के बजाय, खुद दूसरों के लिए एक आशीर्वाद बनें। जब हममें से हर कोई अपने भीतर चेतना का दीपक जलाएगा, तो कोसने के लिए कोई अंधेरा नहीं बचेगा। तब हर हृदय एक मंदिर बन जाएगा, हर घर एक स्वर्ग, और यह एक ऐसी नई दिवाली की शुरुआत होगी, जो कभी खत्म नहीं होगी।
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