सम्पादकीय

प्रकृति के साथ जीवन

Subhi
4 Dec 2022 5:39 AM GMT
प्रकृति के साथ जीवन
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दरअसल, आज दुनिया को एक ऐसी जीवनशैली को अपनाने की जरूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरह से करे, ताकि उनकी उपलब्धता भावी पीढ़ियों के लिए भी बनी रहे।

सुभाष चंद्र लखेड़ा: दरअसल, आज दुनिया को एक ऐसी जीवनशैली को अपनाने की जरूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरह से करे, ताकि उनकी उपलब्धता भावी पीढ़ियों के लिए भी बनी रहे। पेयजल के माध्यम से इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। अगर हम पेयजल का इस्तेमाल विवेक से करें और उसको कभी भी व्यर्थ न बहने दें तो आज भी दुनिया के कई इलाकों में पेयजल की जो कमी दिखती है, वह आसानी से दूर हो सकती है। ऊर्जा के लिए हम जिन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करते हैं, उनमें जीवाश्म ईंधन, कोयला और लकड़ी शामिल हैं। यह दुनिया जानती है कि इन सभी का भंडार सीमित है और अगर हमने ऊर्जा के लिए इनका अंधाधुंध इस्तेमाल जारी रखा तो आने वाले समय में इनके भंडार समाप्त हो जाएंगे।

अपनी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी है कि दुनिया के सभी देश नवीकरणीय ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा, जैसे अक्षय ऊर्जा के उत्पादन और इस्तेमाल के लिए पहल करें। दरअसल, 'अक्षय ऊर्जा' ऊर्जा के उस स्वरूप को कहते हैं जो भावी पीढ़ियों की ऊर्जा आवश्यकताओं से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों को पूरा करती है।

अक्षय ऊर्जा स्रोतों में अक्सर सभी नवीकरणीय स्रोत शामिल होते हैं, जैसे वनस्पति पदार्थ, सौर शक्ति, पवन शक्ति, भू-ऊष्मा शक्ति, तरंग शक्ति और ज्वार द्वारा उत्पन्न शक्ति। ऊर्जा अक्षयता की ओर अग्रसर होने के लिए न केवल ऊर्जा पूर्ति करने के तरीकों को बदलना होगा, बल्कि ऊर्जा के उपयोग के तरीकों को भी बदलना होगा और विभिन्न सेवाओं और वस्तुओं के लिए 'आवश्यक ऊर्जा' की मात्रा को भी घटाना अनिवार्य होगा।

उदहारण के लिए भवन निर्माण करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा कि उसमें दिन में रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल न करना पड़े। यों इसमें आमतौर पर ऊर्जा के प्रभाव को बढ़ाने वाली 'एलईडी' जैसी प्रौद्योगिकियां भी शामिल हैं।

वर्तमान में वातानुकूलन के लिए भी हम जो रसायन इस्तेमाल में लाते हैं, उनसे भी प्रदूषण का दायरा बढ़ता है। जहां तक संभव हो, हमें ऐसे सभी कार्यों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए यथाशीघ्र वैकल्पिक उपाय खोजने होंगे। मोटे तौर पर किसी भी प्राकृतिक संसाधन का उपयोग करते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि उसकी मात्रा सीमित है और उसकी जरूरत कमोबेश दुनिया के सभी लोगों को है। खाद्य पदार्थ इसी श्रेणी में आते हैं।

भोजन गरीब हो या अमीर, सभी को चाहिए। खेद की बात यह है कि अन्न को हम लोग बड़ी मात्रा में बर्बाद करते आए हैं, जबकि दुनिया भर में लाखों लोग भुखमरी के शिकार हैं। जरूरत इस बात की है सिर्फ संश्लेषित रसायनों के सहारे खेती की पैदावार बढ़ाने पर जोर न दिया जाए, बल्कि पैदा हुए कृषि उत्पादों के भंडारण, प्रसंस्करण और उसे इस्तेमाल करने के तौर-तरीकों में ऐसे बदलाव किए जाएं, ताकि विभिन्न स्तरों पर होने वाली अन्न की बर्बादी से पूरी तरह से बचा जा सके। हमें यह बात भी समझनी होगी कि संश्लेषित रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है।

दरअसल, आज दुनिया को ऐसी प्रदूषण मुक्त प्रौद्योगिकियों की जरूरत है जो एक ओर हमारी जरूरतों को पूरा करती हों और दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम इस्तेमाल करती हों। जहां भी संभव हो, इस्तेमाल की गई सामग्री का पुनर्चक्रण करके उसे फिर से उपयोग किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर, अगर जल, जमीन और जंगल सहित धरती की प्राकृतिक क्षमताओं में कोई गिरावट नहीं होगी तो उससे हमें एक टिकाऊ जीवनशैली की तरफ तेजी से बढ़ने में मदद मिलेगी।

सवाल उठता है कि क्या दुनिया इसके लिए तैयार है? सच्चाई यह है कि पर्यावरण से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर भी दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है। कुछ देशों के लिए आज पर्यावरण एक अहम मुद्दा है, वहीं कुछ देश अपनी विकास की गति को बनाए रखने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं। वजह जो भी हो, सच यह है कि जो विकास हमें विनाश की तरफ ले जाता हो, उससे हम सभी को बचने की कोशिश करनी होगी।

पर्यावरण की समस्या ठीक से समझने के लिए हमें प्राकृतिक साधनों के बंटवारे को और उसकी खपत को भी समझने की जरूरत है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार करीब पांच फीसद आबादी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों के साठ फीसद हिस्से पर काबिज है।

दस फीसद आबादी के हाथ में पच्चीस फीसद संसाधन हैं। लेकिन साठ फीसद लोगों के हिस्से में मुश्किल से पांच फीसद संसाधन हैं। अगर यही सब कुछ यथावत रहा और हमने अपनी जीवनशैली में कोई बड़े बदलाव न किए तो सन् 2050 तक दुनिया की साढ़े नौ अरब मानव आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे पास ऐसी दो और पृथ्वी होनी चाहिए।


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