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- हड़ताल से सबक

जनता से रिश्ता वेबडेसक | बैंकों की हड़ताल पहले ही दिन चुभती हुई लगी। आखिर ऐसी नौबत क्यों आई? करीब दस लाख बैंककर्मियों की हड़ताल साफ तौर पर संकेत है कि बैंकों के निजीकरण की राह आसान नहीं है। पीएसयू बैंक संघ की हड़ताल के पहले ही दिन देश भर में बैंकिंग सेवाओं जैसे नकद निकासी, जमा, चेक और व्यापारिक लेन-देन पर असर पड़ा है। यूएफबीयू, नौ श्रमिक संघों का मिला-जुला मंच है, जिसने पिछले महीने ही 15 और 16 मार्च को हड़ताल का आह्वान कर दिया था। उन्हें मनाने की कोई ठोस कोशिश नजर नहीं आई, तो इससे निजीकरण के प्रति सरकार की दृढ़ता का पता चलता है। बैंककर्मियों को मनाने के लिए हुई तीन बैठकें बेनतीजा रही हैं। आज भी अगर बैंकों की हड़ताल जारी रही और कामकाज प्रभावित हुआ, तो सरकार को गंभीर होना पड़ेगा। आज देश जिस मोड़ पर है, वहां किसी भी तरह की हड़ताल अर्थव्यवस्था के लिए दुखदाई है। पिछले महीने पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकार की विनिवेश योजना के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों के निजीकरण की घोषणा की थी। उसके बाद से ही बैंककर्मियों में हलचल है। ज्यादातर बैंक कर्मचारियों को लगता है कि अगर वे आज चुप रहे, तो कल उनके बैंकों का भी निजीकरण होगा। बैंक कर्मचारियों का कहना है कि सरकार की नीतियों का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ने वाला है। देश में अनेक जगह कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन भी किए हैं। एक बड़ा खतरा यह भी है कि मांग न माने जाने की स्थिति में बैंककर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल के बारे में भी सोच रहे हैं। यह हड़ताल या आंदोलन किसान आंदोलन की तर्ज पर चलाने की चर्चा है। बैंककर्मी अपने ग्राहकों को भी यह बताना चाहते हैं कि बैंकों के निजीकरण की कोशिश कैसे सेवाओं को प्रभावित करेगी। बैंककर्मी अपनी मांग को लेकर गंभीर नजर आ रहे हैं और यह शासन-प्रशासन के लिए चिंता की वजह बने, तो ही सार है। उनकी मांग है कि सरकार निजीकरण की घोषणा वापस ले। अब सरकार के लिए सोचने वाली बात है कि हड़ताल या आंदोलन का मोर्चा खुल रहा है। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मोर्चा है, जहां समस्याएं बढ़ीं, तो अर्थव्यवस्था के लिए बहुत मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। यह विवाद इतना सहज नहीं है, जितना लगता है। देश में विरोध का हक सबको है, लेकिन सरकारी बैंकों की हड़ताल से किसे फायदा होगा, यह भी बैंककर्मियों के संगठनों को सोचना चाहिए। लंबी हड़ताल सरकारी बैंकों के व्यवसाय पर असर डालेगी और ग्राहकों को निजी बैंकों की ओर जाने के लिए मजबूर करेगी। बैंकों को अपनी बात रखते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि जरूरतमंद ग्राहकों को ज्यादा परेशानी न हो। ग्राहक ही किसी बैंक को मजबूत करते हैं, लेकिन ऐसी हड़ताल से ग्राहकों को ही सबसे ज्यादा परेशानी होती है। इसके साथ ही, सरकार को बैंककर्मियों का विश्वास जीतना चाहिए। निजीकरण से बचना आसान नहीं है, लेकिन अगर कर्मचारियों को विश्वास दिला दिया जाए कि निजीकरण से उनके हित प्रभावित नहीं होंगे, तो वे मान जाएंगे। क्या यह संभव है? निजी क्षेत्र आखिर क्यों लोगों का विश्वास नहीं जीत पा रहा है? सरकारी नौकरी क्यों ज्यादातर लोगों की पहली पसंद है? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब हमारी सरकारें ही खोज सकती हैं।





