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सम्पादकीय

उत्तर प्रदेश सरकार में नेतृत्व संकट टला पर सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए चुनौतियां पहले से बढ़ीं

Gulabi
11 Jun 2021 11:07 AM GMT
उत्तर प्रदेश सरकार में नेतृत्व संकट टला पर सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए चुनौतियां पहले से बढ़ीं
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योगी आदित्यनाथ

पंकज कुमार। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव बीजेपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ेगी यह पूरी तरह से तय हो चुका है . गुरुवार को नई दिल्ली में सीएम योगी के पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद यूपी का नेतृत्व संकट टल चुका है. पर अब योगी सरकार राज्य में कई कसौटियों पर परखी जाएगी. इसमें जाति समीकरण को साधना अहम होगा. पार्टी कुछ नेताओं को साथ लेकर सोशल इंजीनियरिंग के काम में जुट गई है लेकिन जनता तक सकारात्मक मैसेज पहुंचाना आसान नहीं होगा. ज़ाहिर है इस चुनाव में बीजेपी का नारा सबका साथ सबका विकास कई कसौटियों पर परखा जाएगा.


बीजेपी के लिए यूपी की राह चुनौतीपूर्ण क्यों है ?
बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को सत्ता की चाभी थमा हिंदुत्व को आगे रखने की कोशिश की थी. लेकिन चुनाव से पहले ब्राह्मण नेता सहित पटेल और राजभर नेताओं से मुलाकात और उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी की खबर यूपी की राजनीति की असलियत बयां कर रही है. पार्टी भले ही भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को आगे रख हिंदुओं को जोड़े रखने की मंशा रखती हो लेकिन पार्टी का ऐन वक्त पर सोशल इंजीनियरिंग का रास्ता अख्तियार करना व्यवहारिक राजनीति की असली कहानी बयां कर रहा है. दरअसल ओ पी राजभर पूर्वांचल के पच्चीस से तीस सीटों पर दबदबा रखते हैं इसलिए उन्हें मनाने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व और राज्य इकाई लगातार प्रयासरत है. वैसे राजभर पहले यूपी सरकार में मंत्री बनाए गए थे और उनके बेटे को दिल्ली लाने की तैयारी थी लेकिन ओ पी राजभर ने तकतरीबन तीन साल पहले ही बीजेपी का साथ छोड़ विरोधी रुख अख्तियार करना ही मुनासिब समझा.
राजनीति शास्त्र के जानकार संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि बीजेपी ने राजभर को लुभाने के लिए उनके समाज के सम्मानित महापुरूष सुहैलदेव के नाम से रेलगाड़ी भी चलाई लेकिन ओ पी राजभर के विरोध अख्तियार करने के बाद मनोज सिन्हा जैसे कद्दावर नेता को लोकसभा चुनाव गाजीपुर से हारना पड़ा.
दरअसल ओ पी राजभर मउ, बलिया,गाजीपुर बनारस,चंदौली, भदोई, मिर्जापुर जैसे जिलों में अपनी जातियों पर अच्छी पकड़ रखते हैं और राजभर जाति के सहारे वो पिछड़ों की राजनीति कर अपना रेलेवेंस राजनीति में बखूबी बनाए हुए हैं. पिछले तीन साल से सत्ता को छोड़ विरोध का स्वर अलापने वाले ओ पी राजभर बीजेपी में किन शर्तों पर आएंगे इसको लेकर तमाम अटकलें तेज हैं.
यही हाल अनुप्रिया पटेल का है जो पूर्वांचल के पटेल समुदाय की नेता हैं. मोदी की पहली सरकार में उन्हें केन्द्र में मंत्री पद का दर्जा मिला था लेकिन मोदी टू में वो बीजेपी की सहयोगी रहकर भी सत्ता से दूर हैं. माना जा रहा है कि पूर्वांचल में बीजेपी समाजवादी पार्टी के ताकत की धार को कुंद करने के लिए अनुप्रिया पटेल को केन्द्र में और उनके पति आशीष पटेल को योगी मंत्री मंडल में जगह देनेवाली है.
पूर्वांचल के पत्रकार और राजनीति में पैनी नजर रखने वाले शुभ्रांशु मिश्रा कहते हैं कि बीजेपी के लिए असली चुनौती पिछड़े और अतिपिछड़े को एक साथ रखना है.
शुभ्रांशु मिश्रा कहते हैं कि दरअसल ठाकुर और यादव नेता के हाथ जब भी सत्ता आती है तो बड़ा खतरा काउंटर पोलेराइजेशन का होता है क्योंकि ये जातियां बहुत ही आक्रामक तेवर रखने की वजह से लाउड मानी जाती हैं.


अगड़ों और पिछड़ों में संतुलन कायम रखना बीजेपी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है
यूपी में ब्राह्मणों को साथ रखना बीजेपी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है. ब्राह्णणों की संख्या यूपी में 8 से 10 फीसदी बताई जाती है पर उनके बड़े नेताओं को राज्य की राजनीति में वो दबदबा नहीं मिला जो कभी कलराज मिश्र सरीखे नेता यूपी की राजनीति में रखते थे. कांग्रेस नेता जतिन प्रसाद को बीजेपी यूपी में लाकर उन्हें साधने की कोशिश कर रही है. जतिन प्रसाद जितेन्द्र प्रसाद के बेटे हैं और उन्हें बीजेपी पार्टी में लाकर ब्राह्मण समुदायों को जोड़े रखने की फिराक में है. दरअसल ब्यूरोक्रेसी हो या मंत्रीमंडल काउ बेल्ट में जाति आधारित राजनीति ज़मीनी सच्चाई है . इसलिए साल 2007 से 2012 तक मायावती सत्ता में आने के लिए ब्राह्मणों,दलितों और मुस्लिमों का गठजोड़ बनाकर अपने दम पर सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई थी.
सूत्रों के मुताबिक जतिन प्रसाद ब्राह्मणों को साधने के लिए वहीं संजय निषाद पूर्वांचल के निषादों को साधने के लिए राज्य सरकार में मंत्री बनाए जाएंगे ताकि सरकार का चेहरा सबका साथ और सबका विकास वाला दिखे और जमीन पर सोशल इंजीनियरिंग को मूर्त रूप देकर जनता तक ये मेसेज देने में कामयाबी मिल सकती है.

बीजेपी राज्य इकाई के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा समझा लिए जाएंगे और वो योगी नेतृत्व में ही पार्टी को जिताने में आगे बढ़कर भूमिका निभाएंगे.
दरअसल केशव प्रसाद मौर्या पिछड़ों के नेता हैं और यूपी में उन्हें उपमुख्यमंत्री पद पर बिठाया गया है. खबरों के मुताबिक योगी के खिलाफ राज्य बीजेपी के नाराज नेताओं में उनका भी नाम शुमार है. इसलिए योगी के खिलाफ पिछले दिनों उठ रही आवाजों को समझने और पऱखने के लिए बीजेपी नेता बी एल संतोष यूपी भेजे गए थे.
वैसे बीजेपी प्रवक्ता अनिला सिंह कहती हैं कि बीजेपी को साल 2014,साल 2017 और 2019 में लोगों ने वोट जाति और धर्म से उपर उठकर दिया था इसलिए राज्य के लोगों ने जाति के बेड़ियों को पिछले तीन चुनाव में नकारा है.

राज्य का नेतृत्व संकट टला लेकिन बीजेपी को एकजुट रखना राज्य में बड़ी चुनौती
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी से मिल लंबी मंत्रणा करने में कामयाब हुए लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं और पिछले चुनाव में मिले जनाधार को एक साथ रखने की जिम्मेदारी पीएम मोदी पर ही होगी. बंगाल चुनाव के बाद विपक्ष के तेवर बदले हैं और मोदी पराजित नहीं हो सकते ये धारणा भी बदली है. बंगाल में बीजेपी की हार के बाद राजनीतिक फिजा बदली नजर आ रही है. समाजवादी पार्टी राज्य की राजनीति में सक्रिय नजर आने लगी है.
बीजेपी प्रवक्ता अनिला सिंह कहती हैं कि राज्य का चुनाव योगी जी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा ये तो साफ हो चुका है वहीं देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पार्टी को चुनाव जिताने में फिर अहम योगदान देंगे इसमें कहां शक है.


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