सम्पादकीय

बदलाव की परतें

Subhi
21 Oct 2022 11:47 AM IST
बदलाव की परतें
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एक ओर जहां वे सक्षम हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रही हैं, वहीं एक ऐसा तबका भी है, जहां औरतों को स्वतंत्रता के नाम पर केवल स्कूल तक ही जाने की अनुमति है। एक ओर उन्हीं स्कूलों में महिला शिक्षिका है और दूसरी ओर वहीं कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं

Written by जनसत्ता; एक ओर जहां वे सक्षम हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रही हैं, वहीं एक ऐसा तबका भी है, जहां औरतों को स्वतंत्रता के नाम पर केवल स्कूल तक ही जाने की अनुमति है। एक ओर उन्हीं स्कूलों में महिला शिक्षिका है और दूसरी ओर वहीं कुछ ऐसी भी बच्चियां हैं, जिन्हें सिर्फ एक निश्चित कक्षा तक पढ़ने की स्वतंत्रता मिली है। महिलाएं देश के लिए स्वर्ण पदक जीत रही हैं तो साथ ही देश के किसी कोने में ऐसी भी महिलाएं हैं, जिन्हें ऐसा सपना देखने तक का भी अधिकार नहीं है।

इसके पीछे जितना जिम्मेदार पुरुष है, उससे ज्यादा पुरुष वर्चस्व की मानसिकता इस घोषित-अघोषित नियंत्रण का कार्य करती है। पुरुष सक्षम महिलाओं की तारीफ कर आधुनिक बनते हैं, उन्हें दूसरी औरतों और बच्चियों के लिए आदर्श बताते हैं, वही अपने घर के महिलाओं और अपनी बच्चियों को इतना अधिकार हासिल नहीं करने देते कि वे अपने सपने का फैसला खुद कर सकें और सपने से जुड़े कार्य कर सके।

दरअसल, जब से कुछ महिलाओं ने सारी बंदिशें तोड़ कर खुद को साबित किया है, तब से कथित महान पुरुष ज्ञानियों की चिंता बढ़ने लगी कि कहीं उनके ज्ञान पर संदेह उत्पन्न न हो। इसलिए नए सामाजिक नियम-कानून, धर्म और सदियों से चली आ रही परंपरा का नाम दे कर और बंदिशें लगाई गर्इं और कहा गया कि ये महिलाओं के भले के लिए हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता में हमें मातृ देवी या फिर मातृसत्तात्मक समाज होने के प्रमाण मिलते हैं। इससे यह पता चलता है कि मौजूदा दौर की भेदभाव की भावना सदैव नहीं थी। यह भेदभाव समय के साथ परिवर्तित स्थितियों के कारण हुई और यह भावना लोगों के दिमाग में बैठ गई। आज के जमाने में जहां महिलाएं अपने परिवार के साथ देश का भी नाम रोशन कर रही हैं।

वहीं समाज में बलात्कार, यौन उत्पीड़न और महिला उत्पीड़न के अन्य अपराध बढ़ते जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2019 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में बलात्कार के 32,033 के मामले या औसतन 88 मामले प्रतिदिन दर्ज किए गए। महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों की तस्वीर भी बेहद अफसोसनाक है। इससे यह पता चलता है कि समाज में चाहे जितना भी बदलाव आ जाए, स्त्रियां खुद में चाहे जितना भी बदलाव कर लें, पुरुष की संकीर्ण मानसिकता का कोई अंत नहीं।



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