सम्पादकीय

कानून ने दलबदल पर तो अंकुश लगाया है लेकिन विधायक दल में तोड़फोड़ कैसे रुके

Gulabi
25 Nov 2021 2:46 PM GMT
कानून ने दलबदल पर तो अंकुश लगाया है लेकिन विधायक दल में तोड़फोड़ कैसे रुके
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शिमला के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में दल बदल कानून को और सख्त बनाए जाने पर सहमति नहीं बन पाई
शिमला के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में दल बदल कानून को और सख्त बनाए जाने पर सहमति नहीं बन पाई. कानून में बदलाव के साथ ही नेताओं ने अयोग्यता से बचने के रास्ते में भी बदलाव किया है. दलबदल करने वाले नेताओं के लिए सबसे चर्चित जुमला आया राम, गया राम का है. आया राम, गया राम के कारण ही राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार दलबदल कानून लाई और उसके बाद बड़ा संशोधन अटल बिहारी वाजपेई की नेतृत्व वाली सरकार ने किया. लेकिन, राजनीति में आया राम, गया राम अभी भी बरकरार है. दलबदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही से बचने के लिए दलबदल करने वाला नेता सांसद अथवा विधायक के पद से इस्तीफा दे देता है. इसका असर यह होता है कि वह वह उपचुनाव लड़ने की अपनी योग्यता को बनाए रखता है.
इस्तीफे से नैतिकता बचाने की कोशिश
मेघालय के दलबदल में यद्यपि कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है. लेकिन, यह बात गौर करने वाली है कि विधायक अब समूह में पद त्याग कर सरकार बना रहे हैं और गिरा रहे हैं. नेता अपने भविष्य और लाभ की राजनीति के लिहाज से भी दल का चयन कर रहे हैं. दल छोड़ने और दल चुनने में नेतृत्व का चेहरा भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. मेघालय में कांग्रेस विधायकों को ममता बनर्जी के साथ भविष्य सुरक्षित दिखा. गांधी परिवार के किसी सदस्य का व्यक्तित्व अब उतना करिश्माई ना लगता हो? शायद इस कारण ही उन्होंने दलबदल किया. दरअसल इस तरह के दलबदल में सिर्फ नैतिक मूल्यों का हवाला देकर आलोचना की जा सकती है. दलबदल की प्रवृत्ति को रोकने के लिए राज्यों के विधानसभा अध्यक्ष भी कोई सकारात्मक भूमिका अदा करते दिखाई नहीं दे रहे हैं. जबकि, कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी उन पर है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यह जरूर कहा के इसके लिए एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण बनाया जाना चाहिए. किसी भी राजनीतिक दल को इस तरह के न्यायाधिकरण को स्वीकार करना आसान नहीं है! आज भले ही दलबदलने के कारण सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस पार्टी को दिखाई दे रहा होगा लेकिन, अतीत में कांग्रेस पार्टी ने भी बड़े पैमाने पर दलबदल करवा कर अपना कुनबा बढाया है. चौधरी चरण सिंह तो देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जो दल बदल के कारण ही इस कुर्सी पर पहुंचे थे. दलबदल करने वाले नेता अपने आप को नैतिक कदाचरण के आरोपों से बचाने के लिए ही इस्तीफे का मार्ग अपनाते हैं. ऐसा अनुमान ही लगाया जा सकता है. अधिकांश मामलों में यह भी देखा गया कि नए राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने के बाद भी दलबदल करने वाले नेता लोकसभा एवं राज्यसभा में फिर से चुनकर पहुंच जाते हैं. फर्क इतना होता है की उनकी सीट बदली हुई होती है.
दो तिहाई का नियम भी नहीं रोक पा रहा दलबदल
दो साल पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बाइस विधायकों के इस्तीफे के बाद दल बदल कानून की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े हुए थे? दल बदल कानून उसी स्थिति में चुनाव लड़ने से अयोग्य कर सकता है जबकि दलबदल दो तिहाई से कम सदस्यों ने किया हो. संविधान के 52 वें संविधान संशोधन विधेयक में पहले एक तिहाई से कम सदस्यों के दलबदल करने पर ही अयोग्य ठहराने का प्रावधान किया गया था. लेकिन, वर्ष 2003 तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने यह संख्या बढाकर दो तिहाई सदस्य कर दी. इसके बाद भी देश में विधायक एवं सांसदों के दलबदल का सिलसिला थमा नहीं है.छुटपुट दलबदल के मामले लगातार सामने आते रहते हैं.चुनाव से पहले भी और बाद में भी. सरकार जाने की संभावनाएं कई राज्यों से सुनाई देती रहती है. जबकि दल बदल कानून लाने का मकसद सरकारों को स्थिरता प्रदान करना रहा है.
जनमत पर भारी राजनैतिक दल
पिछले कुछ साल से कई राज्यों में दलबदल के रोचक मामले सामने आए हैं. खासकर गोवा, मेघालय जैसे छोटे राज्यों में. गोवा में लगभग दो साल पहले कांग्रेस पार्टी के 15 में से दस विधायकों ने एक अलग ग्रुप बना कर उसका विलय भारतीय जनता पार्टी में कर दिया. दलबदल करने वाले विधायकों की संख्या दो तिहाई से अधिक थी, इस कारण कानून के हिसाब से वे अयोग्य नहीं ठहराए गए. यद्यपि कांग्रेस ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दल छोडने वाले सदस्यों को अयोग्य करने का आग्रह किया है. दस दिसंबर को इस पर फैसला आने की संभावना है. मेघालय का घटनाक्रम भी कुछ ऐसा ही है यहां भी विपक्ष के नेता सहित कांग्रेस पार्टी के बारह विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. राज्य में ममता बनर्जी की पार्टी बिना चुनाव लड़े मुख्य विपक्षी दल बन गई. कह सकते है कि ममता बनर्जी अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए छोटे राज्यों का ही उपयोग कर रही हैं छोटे राज्यों की विधानसभाओं का आकार सीमित होने के कारण दलबदल भी आसान होता है. पुडुचेरी मैं भी यह साबित हुआ था. नारायण सामी के नेतृत्व वाली सरकार विधानसभा चुनाव से पहले गिर गई. छोटे राज्यों में आमतौर पर राजनीतिक दलों को बहुमत बहुत बड़े अंतर का नहीं होता.
इस कारण सदस्य संख्या के आधार पर विधायक तोड़कर सरकार बनाना भी आसान हो जाता है. निर्दलीय विधायक या छोटी पार्टियां भी इसमें काफी मददगार साबित होती है. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बना ली. बाद के सालों में दलबदल कानून से बचने के लिए विधायकों से इस्तीफे कराने की रणनीति अपनाई जाने लगी. यह काफी कारगर साबित भी हुई. कर्नाटक और मध्य प्रदेश इसके दो बड़े उदाहरण है. मध्य प्रदेश में मार्च 2020 में एक साथ 22 कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिए लेकिन दल बदल कानून के तहत यह विधायक अयोग्य नहीं हुए. राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली 15 माह पुरानी सरकार जरूर गिर गई . सरकार गिर जाने के बाद कांग्रेस पार्टी ने विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के बारे में कोई गंभीर कदम भी नहीं उठाया. विधायक फिर से चुनकर विधानसभा में पहुंच गए. इस घटनाक्रम से कुछ माहपहले कांग्रेस की सरकार का नेतृत्व कर रहे कमलनाथ ने अपनी सरकार को बचाने के लिए भाजपा के दो विधायकों को तोड़कर अपने पक्ष में खड़ा कर लिया था. भाजपा के विपक्ष में थी. इसके बाद भी उसने इन विधायकों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. शरद कोल और नारायण त्रिपाठी के तेवर अभी भी वैसे ही हैं. हाल ही में खंडवा लोकसभा के उपचुनाव के दौरान कांग्रेस के एक विधायक सचिन बिरला ने सर्वजनिक मंच पर ही भारतीय जनता पार्टी की की सदस्यता ग्रहण कर ली. लेकिन, कांग्रेस ने अब तक उन्हें आपने दल से भी निष्कासित नहीं किया और ना ही विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष बिरला को अयोग्य ठहराने के बारे में कोई याचिका प्रस्तुत की. दल बदल कानून को और सख्त बनाए जाने के लिए राजस्थान के विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी की अध्यक्षता में लोकसभा अध्यक्ष की ओर से एक कमेटी का गठन किया गया. जोशी अपनी रिपोर्ट सौंप चुके हैं. वे कहते हैं कि दलबदल करने वाले सांसद अथवा विधायक को आगे चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने के लिए अधिकार पार्टी अध्यक्ष को ही दे दिए जाने चाहिए.
जोशी का तर्क है कि जो राजनीतिक दल टिकट देता है, फैसले का अधिकार भी उसके पास ही होना चाहिए? दल बदल कानून में इस बात पर बात जोर दिया गया है कि जिस राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह से सांसद विधायक चुना जाता है यदि उस दिल को छोड़ देता है तो उसे सदन की शेष अवधि के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा. दल बदल की तमाम छोटी बड़ी घटनाओं मे यह बात भी सामने आई है कि विधानसभा अध्यक्ष समय सीमा में अयोग्य ठहराने या ना ठहराने के बारे में कोई आदेश ही जारी नहीं करते. सालों तक मामला लंबित रहता है. विधानसभा की अवधि बीत चुकी होती है. दलबदल रोकने वाले कानून का कोई असर भी नहीं रह जाता. पश्चिम बंगाल में मुकुल रॉय का मामला कुछ इसी तरह का है. मुकुल रॉय ने चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली थी. वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते भी. लेकिन, ममता बनर्जी की सरकार फिर से बन जाने के बाद वे वापस तृणमूल कांग्रेस में आ गए. लेकिन अब तक कानूनी कार्रवाई से बचे हुए हैं.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

दिनेश गुप्ता
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.
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