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मज़दूरों की बात करना हो या मज़दूर दिवस की, इससे अच्छी लाइनें नहीं मिलतीं
शकील खान
हम मेहनतकश जग वालों से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.
मज़दूरों की बात करना हो या मज़दूर दिवस की, इससे अच्छी लाइनें नहीं मिलतीं. फैज़ अहमद फैज़ की ये लाइनें मज़दूरों के हक की बात पूरे दमखम से रखती हैं. मज़दूरों की और मज़दूर के आंदोलन का जि़क्र जब भी होता है, वामपंथी विचारधारा याद आती है. यह सच है कि लेफ्ट विचारधारा के कवियों, शायरों और साहित्यकारों ने मज़दूरों पर बहुत कुछ लिखा है, लेकिन ये भी सच है कि मज़दूरों की बात करने वाला साहित्य लेफ्ट हो या राईट, हमेशा मज़दूरों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है. लेबर लिटरेचर हमेशा से सिर्फ मज़दूर के हितों की बात करता है, फिर चाहे वो सर्वहारा का लेखन हो या फिर पूंजीपति समर्थित दक्षिणपंथी लेखन
हम इसे यूं भी देख सकते हैं कि दक्षिण पंथ से जुड़ाव रखने वाले ग्रूप में भी मज़दूर संघ हैं और वे मज़दूरों के बीच काम भी करते हैं. और अगर मज़दूरों के बीच पैठ बनाना है तो उनके हितों की बात करनी ही पड़ेगी. वर्कर में उत्साह जगाने के लिए कविता चाहिए, शायरी चाहिए और साहित्य भी. सो रचनाधर्मिता अपने आप मज़दूरों के आंदोलन में दाखिल हो जाती है, हो चुकी है. इसीलिए उत्तर हो, दक्षिण हो, पूरब हो, पश्चिम हो, हर तरफ का रचनाधर्म मज़दूरों का हितैषी बनकर सामने आता है. इस रचनाकर्म के अंदर झांकने की कोशिश करें तो ढेर सारी खूबसूरत लाइनें कविता और शायरी के रूप में सामने आती हैं.
फिल्मी गीतकार और कवि शैलेन्द्र की ये कविता बड़ी मशहूर हैं और सभी तरह के आंदोलनों की जान है. ये लाईनें मुर्दे में भी जान फूंकने में सक्षम हैं
'तू जिंदा है तो जि़ंदगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र,अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता 'चल रही उसकी कुदाली' भी खेतिहर मज़दूर के साहस की सराहना करती है.
'वह सुखाता खून पर-हित,
वाह रे साहस अपरिमित,
युगों-युगों से वह खड़ा है,
विश्व-वैभव से अपरिचित,
जल रहा संसार धू-धू,
कर रहा वह वार कह 'हूं',
साथ में संवेदना के स्वेद-कण पड़ते कभी चूं,
कौन-सा लालच ? धरा की शुष्क छाती फाड़ डाली,
चल रही उसकी कुदाली…
विद्रोही कवि नागार्जुन अलग ही अंदाज़ में मज़दूरों की बात करते हैं
'खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूक,
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक,….
जली ठूंठ पर बैठकर गाई कोकिला कूक,
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक.'
अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस या मई दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई 1986 से मानी जाती है जब अमेरिका की मज़दूर यूनियनों ने काम का समय आठ घंटे से ज्यादा न रखे जाने के लिए हड़ताल की थी. इस हड़ताल के दौरान शिकागो की मार्केट में बम धमाका हुआ था. यह बम किसने फेंका, यह पता नहीं चल पाया. लेकिन इसके कारण पुलिस ने मज़दूरों पर गोली चला दी और सात मज़दूर मारे गए. इसका तत्काल तो कोई असर नहीं हुआ, लेकिन बाद में अमेरिका में आठ घंटे काम करने का समय निर्धारित कर दिया गया. फिर भारत सहित अन्य मुल्कों में भी यह कानून लागू हुआ. पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने लेबर रिफार्म के नाम पर श्रम कानूनों में बदलाव किया है. यह समय बढ़ाकर 12 घंटे (कुछ शर्तों के साथ) किया गया है. यह कानून संसद में पास हो गया है पर फिलहाल लागू नहीं हुआ है. इसे लेकर हाल ही में मजदूरों की देशव्यापी हड़ताल भी हुई थी.
यह तो हमें पता है कि शिकागो हड़ताल के बाद ही आठ घंटे का मज़दूर हितैषी कानून लागू किया गया था. यह भी माना जाता है कि आठ घंटे काम की मांग इसी आंदोलन की देन थी. लेकिन ऐसा नहीं है, आठ घंटे काम की बात सबसे पहले हमारे देश में उठी थी. इस बारे में मध्य प्रदेश के जाने माने लेबर लीडर और सीपीएम के नेता बादल सरोज कहते हैं. शिकागो आंदोलन से भी तीन साल पहले कोलकाता के हावड़ा रेलवे यार्ड में एक आंदोलन हुआ था. यह वो दौर था जब यूरोपियन यूनियन और अमेरिकन यूनियन भी सक्रिय हो चुकी थीं. हावड़ा ही वो जगह थी जहां पहली बार यह मांग उठाई गई थी कि काम के घंटे निर्धारित किए जाएं और इसे आठ घंटे में सीमित किया जाए. कहा गया कि 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे जिंदगी के दूसरे काम'. इस तरह शिकागो स्ट्राइक से तीन साल पहले 1983 में ही आठ घंटे काम का स्लोगन अस्तित्व में आ गया था और यह स्लोगन हिंदुस्तान की ज़मीन में ही पैदा हुआ था.
बात भारत में हो रहे आंदोलन की चल रही है तो याद करते चलें हाल ही में हुए किसान आंदोलन की. लंबे अरसे बाद किसी संगठन का इतना लंबा और इतना व्यवस्थित आंदोलन देखने को मिला. सबसे खास बात ये है कि साल भर के लगभग चलने वाला यह आंदोलन सफल भी हुआ और किसानों की मांग पर संसद में पास कृषि कानून वापस लिए गए. 2014 के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि सरकार आंदोलनकारियों के सामने झुकी. वरना इसके पहले कोई आंदोलन सिरे ही नहीं चढ़ पा रहा था. बैंक स्ट्राइक और उनके आंदोलन को लिटमस टेस्ट की तरह देख सकते हैं. एक ज़माना था जब बैंक स्ट्राइक की घोषणा होती थी तो सरकार के हाथ-पैर फूल जाते थे. अब तो स्थिति ये है कि कर्मचारी यूनियन अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी देती है और सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती. बता दें बैंक यूनियन देश की, दुनिया की भी सबसे ताकतवर और व्यवस्थित कर्मचारी यूनियन है, जिसकी आवाज का पालन प्रत्येक मेंबर करता है, हंड्रेड परसेंट मेंबर संगठन की बात मानते हैं. बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है फिर भी उनकी हड़ताल से सरकार का नहीं डरती, ऐसा क्यों? दरअसल इसके पीछे मशीनीकरण सबसे बड़ा कारण है. बैंकिंग सेवाओं के लिए अब कस्टमर इनकी शाखाओं के खुलने के मोहताज नहीं रह गए हैं. अब उनका काम एटीएम, नेट बैंकिंग और यूपीआई पेमेंट सिस्टम के सहारे चल जाता है. इससे इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि मशीनों के बढ़ते उपयोग और कम्प्युटराईजेशन ने मज़दूर आंदोलनों की धार कमजोर कर दी है. मज़दूर आंदोलन के लिए यह सबसे बुरा समय है. इसीलिए आज के दौर में मई दिवस या मज़दूर दिवस ज्यादा रिलेवेंस भी है. मज़दूर नेता और मज़दूर हितों से जुड़े संगठन के लोग कहते हैं कि मज़दूर आंदोलन कमज़ोर जरूर पड़ा है पर न तो खत्म हुआ है और न कभी खत्म होगा. ये दौर है, ये भी गुज़र जाएगा.
बहरहाल. अब बात बॉलीवुड की, उन फिल्मों की जो 'मज़दूरों' पर केन्द्रित हैं. मज़दूरों की आंतरिक दुनिया में झांकने वाली फिल्म 'नमकहराम' सबसे चर्चित फिल्म है. इस फिल्म में उन दिनों के सुपर स्टार राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने एक साथ काम किया था. इस फिल्म का स्क्रीनप्ले गुलज़ार ने लिखा था और इसे हृषिकेश मुखर्जी ने निर्देशित किया था. फिल्म के लिए राजेश खन्ना को बेस्ट एक्टर का बीएफजेए अवार्ड और अमिताभ बच्चन को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्म फेयर अवार्ड मिला था. इस फिल्म का कथानक बहुत रोचक और यूनिक था. राजेश खन्ना और अमिताभ के बीच गहरी दोस्ती है. अमिताभ बड़ा इंडस्ट्रियलिस्ट है. उसके कहने पर या खुद राजेश की सलाह पर, राजेश खन्ना मज़दूरों के बीच मज़दूर बनकर रहने लगता है, ताकि अपने दोस्त को अंदर की खबर दे सके. लेकिन मज़दूरों के बीच रहकर उनकी हालत देखकर राजेश खन्ना द्रवित हो जाता है और उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है. अब वो अपने दोस्त का विरोधी है और मज़दूरों का हितैषी बन चुका है. यह 'नमकहरामी' इंडस्ट्रियलिस्ट को नापसंद होना थी, हुई. इसके बाद घटनाक्रम दिलचस्प मोड़ लेते हैं. इस फिल्म में रज़ा मुराद एक शायर की भूमिका में थे और उन पर फिल्माया एक गीत बहुत पापुलर हुआ था – 'मैं शायर बदनाम'.
'मज़दूर' शीर्षक से 1983 में एक फिल्म आई थी जिसमें दिलीप कुमार मुख्य भूमिका में थे. बीआर चौपड़ा निर्मित और रवि चौपड़ा निर्देशित इस फिल्म में राज बब्बर, सुरेश ओबेराय, नंदा, रति अग्निहोत्री थे. यह नंदा की आखिरी फिल्म थी. इस फिल्म में फैज़ की नज़्म ' हम मेहनतकश जग वालों से' के मुखड़े का थोड़े हेर फेर के साथ इस्तेमाल किया गया है और एक गीत रचा गया है
किसी ने खूब कहा है, सच भी,
'मैं मज़दूर हूं मजबूर नहीं, यह कहने में मुझे शर्म नहीं,
अपने पसीने की खाता हूं मैं मिट्टी को सोना बनाता हूं.
चलते-चलते निदा फ़ाज़ली को याद कर लेते हैं, उन्होंने अपने दोहे में मज़दूरों के लिए क्या बढि़या बात कही है :
'सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर.'
TagsLabour Day
Rani Sahu
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