सम्पादकीय

कुरुक्षेत्र: 2022 नहीं 2024 को संभालने के लिए वापस हुए कृषि कानून

Gulabi
23 Nov 2021 7:02 AM GMT
कुरुक्षेत्र: 2022 नहीं 2024 को संभालने के लिए वापस हुए कृषि कानून
x
कृषि कानून वापस
जिन तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार व पूरी भाजपा ने करीब एक साल तक देश हित और किसानों की समृद्धि का दरवाजा खोलने वाला बताया अचानक उन्हें क्यों वापस लिया गया। यह सवाल आम तौर पर हर मन में तब उठा जब 19 नवंबर की सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के जरिए अपनी तपस्या में कुछ कमी को स्वीकारते हुए इन कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा कर रहे थे।
आम तौर पर सबका यही मानना है कि फरवरी-मार्च 2022 में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभा के चुनावों में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रधानंत्री मोदी ने ये कदम उठाया है। इनमें भी सबसे ज्यादा अहम उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब है, जहां किसान आंदोलन का खासा असर भाजपा के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ था। लेकिन भाजपा के भीतरी सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह अप्रत्याशित कदम 2022 की चुनावी हार से बचने के लिए नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के बुरी तरह से सफाए की आशंका को देखते हुए उठाया गया है। क्योंकि 2024 में लोकसभा चुनावों की जीत का रास्ता 2022 के पांच राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों के भीतर से निकलेगा।
यह बात किसी और ने नहीं खुद गृह मंत्री अमित शाह ने अपने लखनऊ दौरे के दौरान एक जनसभा में कही जब उन्होंने कहा कि अगर मोदी जी को 2024 में फिर से प्रधानमंत्री बनाना है तो उसके लिए 2022 में उत्तर प्रदेश में योगी जी को मुख्यमंत्री बनाना होगा। और किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सवा सौ विधानसभा सीटों पर भाजपा के समीकरण बिगड़ चुके हैं और लखीमपुर खीरी की हिंसक घटना के बाद किसान असंतोष की आंच तराई से होते हुए मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पहुंचने की आशंका बढ़ गई है। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्होंने अपने चुनावी राजनीतिक जीवन में 2001 से लेकर अभी तक कोई सीधी हार नहीं देखी है, नहीं चाहते कि उनकी शानदार राजनीतिक जीवन की पारी का अंत किसी शर्मनाक हार से हो। वह अटल बिहारी वाजपेयी की शाइनिंग इंडिया और फील गुड वाली कहानी नहीं दोहराना चाहते हैं।
कोरोना काल में लॉक डाऊन के बीच अचानक जिन तीन कृषि कानूनों को कृषि सुधारों के नाम पर जोर शोर से अध्यादेश के जरिए लाया गया और फिर संसद में विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद राज्यसभा में दुर्भाग्यपूर्ण हंगामे के बीच पारित किया गया। जिनके विरोध में करीब एक साल से किसानों के जत्थे दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले रहे और उन पर हर तरह के छल बल का प्रयोग होने के बावजूद वह नहीं हटे बल्कि किसान नेताओं ने घूम-घूम कर देश भर में इन कृषि कानूनों के विरोध में माहौल तैयार किया और जवाब में उन्हें खालिस्तानी, आतंकवादी, गुंडे, नक्सलवादी माओवादी आढ़तिये विदेशी एजेंट जैसे तमाम तमगों से नवाजा गया।
इसमें मीडिया के एक बड़े हिस्से से लेकर सत्ताधारी दल के नेता, केंद्रीय मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मंत्री, वरिष्ठ नेता और सोशल मीडिया के दस्ते तक शामिल रहे। लेकिन आंदोलनकारी किसानों को न तो पुलिस की लाठियां, आंसू गैस, पानी की बौछारें, बैरीकेड, लाल किले, करनाल और खीरी लखीमपुर जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं डिगा पाईं न ही सर्दी, गरमी, बारिश और कोरोना की दूसरी भयानक लहर और न ही उनके खिलाफ दुष्प्रचार कारगर हुआ और आखिरकार केंद्र सरकार या कहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने कदम वापस खींचने पड़े।
दरअसल जिन्होंने भी भाजपा के जमाने से जब नरेंद्र मोदी पार्टी संगठन में विभिन्न पदों पर काम करते थे, उनकी राजनीति और कार्यशैली को बेहद करीब से देखा है, उन्हें यह बात समझते देर नहीं लगेगी कि मोदी ने किसानों को खुश करने के लिए अपने कदम वापस क्यों खींचे। नरेंद्र मोदी ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में व्यक्तिगत विफलता का मुंह कभी नहीं देखा। गुजरात में जब पार्टी की अंदरूनी राजनीति की खींचतान की वजह से उन्हें राज्य की राजनीति से हटाया गया तो भाजपा के केंद्रीय संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई। वह हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के प्रभारी महासचिव रहे और तत्कालीन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी दोनों के बेहद भरोसेमंद रहे। बाद में वह आडवाणी के प्रमुख सिपहसालार हो गए।
2001 में केशूभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया, तब तक उन्होंने अपने जीवन में एक भी चुनाव नहीं लड़ा था। उनकी प्रशासनिक क्षमता और नेतृत्व की योग्यता की कोई परख पार्टी ने नहीं की थी। लेकिन गुजरात की कमान संभालने के बाद मोदी रुके नहीं और उन्होंने गोधरा कांड और उसकी प्रतिक्रिया में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौर में पहले खुद को हिंदू ह्रदय सम्राट के रूप में स्थापित किया। क्योंकि संघ भाजपा की हिंदुत्वादी राजनीति में कल्याण सिंह के वैचारिक और राजनीतिक विचलन के बाद यह स्थान खाली हो गया था और नरेंद्र मोदी ने उसे बेहद चतुराई से भरा और वह हिंदुत्व की राजनीति के सबसे बड़े योद्धा के रूप में उभरकर राष्ट्रीय राजनीति में आए। लेकिन साथ ही उन्होंने हिंदुत्व में विकास और सुशासन का तड़का भी लगाया और देश के सामने विकास और सुशासन का ऐसा गुजरात मॉडल पेश किया जो भारत की बहुसंख्यक आबादी के भीतर एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर विकास और भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन के सपने जगाने वाला था तो दूसरी तरफ उस हिंदू मन को भी आह्लादित करता था जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गैर भाजपा राजनीतिक दलों की कथित मुस्लिम परस्ती और वैश्विक इस्लामीफोबिया से आक्रांत और नाराज था। मोदी ने इसके साथ बेहद सधी हुई राजनीतिक चतुराई से सामाजिक संतुलन को भी साधा और उन्होंने खुद को हिंदुत्व और विकास सुशासन के नायक के साथ साथ वंचित गरीब और पिछड़े वर्गों के नुमाईंदे के तौर पर भी स्थापित किया।
मोदी की इस दीर्घकालिक रणनीति ने अटल अडवाणी युग के अवसान के बाद उन्हें भाजपा व पूरे संघ परिवार में सबसे ज्यादा लोकप्रिय और सशक्त नेता के रूप में सबसे आगे कर दिया। 2002 से लेकर 2012 तक गुजरात विधानसभा चुनावों में उन्होंने सिर्फ अपने चेहरे पर पार्टी को लगातार सफलता दिलाई और 2014 से लेकर 2019 तक हुए दोनों लोकसभा चुनावों और सभी विधानसभा चुनावों में न सिर्फ मोदी ही भाजपा की विजय का प्रतीक बने बल्कि पूरी पार्टी उनकी छवि और लोकप्रियता की बंधक बन गई। छोटे से लेकर बड़े चुनाव को मोदी के ही नाम पर लड़ा जाने लगा।हालांकि मोदी की अपील जितनी लोकसभा चुनावों में कामयाब हुई उतनी विधानसभा चुनावों में कभी हुई तो कभी नहीं हुई। जैसे 2014 के लोकसभा चुनावों की अपार सफलता के बाद मोदी के नेतृत्व में भाजपा महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू कश्मीर में अप्रत्याशित रूप से जीती। लेकिन 2015 में पहले दिल्ली और फिर बिहार में उसे मोदी के धुआंधार प्रचार के बावजूद आम आदमी पार्टी और राजद, जद(यू) और कांग्रेस महागठबंधन के सामने बुरी तरह हारना पड़ा। लेकिन 2016 में असम की जीत ने फिर मोदी और भाजपा का परचम बुलंद कर दिया और नोटबंदी के बाद 2017 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की तूफानी जीत ने पंजाब और गोवा की विफलताओं को ढक दिया।
लेकिन इसी साल गुजरात में भाजपा को जिताने के लिए नरेंद्र मोदी को जी तोड़ मेहनत करनी पड़ी और पार्टी हारते हारते बची। जबकि 2018 मई में कर्नाटक में मोदी की तमाम चमक के बावजूद भाजपा बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाई और इसी साल के आखिर में हुए चुनावों में भाजपा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस से हार गई। बाद में कर्नाटक और मध्य प्रदेश में दल बदल कराकर भाजपा ने वहां अपनी सरकारें बनाईं।लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में पुलवामा में आतंकवादी हमले के जवाब में बालाकोट हवाई हमले के दांव ने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ फिर आसमान पर पहुंचा दिया और भाजपा ने 2014 की 283 सीटों के मुकाबले अकेले 303 सीटें जीतीं।
एक बार फिर मोदी माने जीत के नारे गूंजने लगे। लेकिन इसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में भाजपा फिर पिछड़ गई। हरियाणा में बहुमत का आंकड़ा न छू पाने की वजह से उसे जजपा से गठबंधन करना पड़ा जबकि महाराष्ट्र और झारखंड में वह सत्ता से बाहर हो गई। 2020 में दिल्ली में भाजपा की फिर जबर्दस्त पराजय और बिहार में हारते-हारते किसी तरह जीतने से मोदी की चमक फिर कमजोर पड़ने लगी। 2021 में असम में हालांकि भाजपा ने अपनी सरकार दोबारा बनाई लेकिन पश्चिम बंगाल में जिस तरह उसकी हार हुई और ममता बनर्जी अपना खुद का चुनाव भले हार गईं लेकिन उनकी पार्टी का वोट और सीटें दोनों ही पहले से ज्यादा बढ़ गईं।
बंगाल की हार के बाद अब अगले साल फरवरी मार्च में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव भाजपा और नरेंद्र मोदी दोनों के लिए जबर्दस्त चुनौती हैं।क्योंकि इन चुनावों पर कोरोना की दूसरी लहर के कुप्रबंधन, हजारों मौतों, पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, जबर्दस्त महंगाई, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा बढ़ती कीमतें, महंगी बिजली, खाद की किल्लत और कालाबाजारी और लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक चीनी अतिक्रमण जैसे मुद्दों की छाया है।
विपक्ष इन मुद्दों को गरम कर रहा है। हालांकि नरेंद्र मोदी की छवि और उनकी सरकार की कल्याणकारी योजनाएं जैसे किसान सम्मान राशि, आत्मनिर्भर भारत, प्रधानमंत्री गरीब आवास योजना, मुफ्त गैस सिलेंडर, हर गांव और घर को बिजली, अस्सी कोरोड़ लोगों को मुफ्त राशन आदि को गिनाकर भाजपा मुकाबला कर रही है। लेकिन सबसे ज्यादा समस्या किसान आंदोलन से रही है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में भाजपा के नेताओं का अपने प्रचार के लिए गांवों में जाना बेहद मुश्किल हो रहा है। जगह-जगह उनका विरोध, काले झंडे और कहीं-कहीं तो हिंसक हमले की घटनाए बढ़ रही थीं।
लखीमपुर खीरी की घटना ने विपक्ष को उत्तर प्रदेश में आक्रामक बना दिया और जिस विपक्ष पर घर से न निकलने का आरोप था, वही अब सड़कों पर जबर्दस्त भीड़ जुटा रहा है। उत्तर प्रदेश में चाहे अखिलेश यादव की सभाओं और रैलियों में लोगों का सैलाब हो या प्रियंका गांधी की सभाओं में उमड़ती भीड़ प्रधानंत्री, गृह मंत्री और मुख्यमंत्री की सभाओ से ज्यादा ध्यान खींच रही हैं। तमाम संसाधनों और सरकारी तंत्र की मदद के बावजूद पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन समारोह में उतनी भीड़ नहीं जुट सकी जितनी उसके अगले दिन अखिलेश यादव की गाजीपुर से एक्सप्रेस-वे पर निकाली गई रैली में थी।
इन सारी खबरों ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, संघ नेताओं के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी विचलित कर दिया। लेकिन सिर्फ इतने भर ने ही मोदी जैसे कठोर फैसले के लिए जाने जाने वाले नेता को परेशान नहीं कर दिया। क्योंकि विधानसभा चुनावों में 2014 के बाद मोदी के तमाम आक्रामक प्रचार के बावजूद भाजपा कई राज्यों में हार चुकी है। लेकिन उस हार का सीधा ठीकरा मोदी पर नहीं फूटा और न ही उससे मोदी की अपनी केंद्रीय सत्ता पर कोई असर पड़ा। पार्टी के प्रचार तंत्र और मीडिया प्रबंधन ने इन पराजयों की जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं और कारणों पर डालकर अपने शीर्ष और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता की छवि को बचा लिया।
बात इससे ज्यादा आगे की है। दरअसल किसान आंदोलन को लेकर भाजपा के भीतर भी भारी छटपटाहट शुरू हो गई थी। सांसद वरुण गांधी और मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक तो खुलकर किसानों के पक्ष में बयान दे रहे थे। जबकि भाजपा किसान सेल के उपाध्यक्ष नरेश सिरोही पहले दिन से ही कृषि कानूनों का विरोध और किसान आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं। इनके अलावा कई नेता दबी जुबान से यह मानने लगे थे कि अगर किसान आंदोलन यूं जारी रहा या किसान थक हार कर लौट भी गए तो 2022 के चुनाव तो भाजपा हारेगी ही, 2024 के लोकसभा चुनाव और बुरी तरह हारेगी। क्योंकि तीनों कृषि कानून केंद्र सरकार लाई और किसानों का आंदोलन केंद्र सरकार के ही खिलाफ है। केंद्र सरकार का मतलब नरेंद्र मोदी हैं और पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस की बढ़ती कीमतों के लिए भी लोग उनकी नीतियों को जिम्मेदार मान रहे हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में योगी से ज्यादा लोगों की नाराजगी मोदी से बढ़ रही है और जितना गुस्सा विधानसभा चुनाव में निकलेगा उससे ज्यादा लोकसभा चुनावों में निकलेगा।
इस जमीनी हकीकत की खबरें तमाम स्रोतों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी पहुंचनी शुरू हो गई। रही सही कसर हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजों ने पूरी कर दी। इन नतीजों ने जिनमें हिमाचल में एक लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा की हार, राजस्थान की दोनों विधानसभा सीटों पर भाजपा का तीसरे और चौथे नंबर पर खिसक जाना, महाराष्ट्र और कर्नाटक की विधानसभा सीटों पर हार और मध्य प्रदेश में रैगांव जैसी भाजपा की मजबूत सीट पर कांग्रेस का जीत जाना और खंडवा में कांग्रेस के बुजुर्ग उम्मीदवार के मुकाबले भाजपा उम्मीदवार की जीत की बढ़त का 2019 के मुकाबले दो लाख वोट कम हो जाने का संकेत था कि तमाम प्रचार अभियान और मीडिया प्रबंधन के बावजूद जमीन पर सब कुछ ठीक नहीं है।
पीएमओ से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक आशंका यहां तक बढ़ने लगी कि अगर इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरता रहा तो लोकसभा चुनावों में भारी चुनौती खड़ी हो जाएगी और विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार से उत्साहित विपक्ष एकजुट हो गया तो 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का उससे भी बुरा हाल हो सकता है जैसा 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का हुआ था। इस पूरे माहौल में आखिरी कील ठोंकी मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जब उन्होंने कहा कि अगर किसान आंदोलन जारी रहा तो न सिर्फ भाजपा उत्तर प्रदेश के चुनावों में हारेगी बल्कि लोकसभा चुनावों में भी इस कदर साफ होगी कि संसद में भाजपा ढूंढ़े नहीं मिलेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो इस तरह की हार की कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने अभी तक निजी हार नहीं देखी है। इन खबरों ने उन्हे बेहद विचलित किया और इसके बाद आनन-फानन में उन्होंने तय किया कि फिलहाल किसानों को संतुष्ट करने के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ता है तो ले लेना चाहिए। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले की जानकारी सरकार और पार्टी में किसी को नहीं थी। आखिरी वक्त पर शीर्ष स्तर पर जरूर कुछ वरिष्ठ मंत्रियों को इसका अनुमान हो गया था जिसे उन्होंने अपने कुछ खास मित्रों को इशारों में बता भी दिया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आकलन है कि उनके इस फैसले से किसानों का असंतोष खत्म होगा और अगर थोड़ा बहुत गुस्सा रहा भी तो उसका असर विधानसभा चुनावों तक ही होगा। उसके बाद उनके पास करीब दो से ढाई साल का वक्त है जिसमें एक बार वह फिर अपनी लोकप्रियता स्थापित कर सकते हैं और 2024 में फिर कोई नया चुनावी दांव चल कर खुद को और पार्टी को 2004 की पुनरावृत्ति से बचा सकते हैं। इसलिए उन्होंने यह कदम 2022 से ज्यादा 2024 के लिए उठाया है।
अमर उजाला
Next Story
© All Rights Reserved @ 2022Janta Se Rishta