सम्पादकीय

न्याय आंशिक या सीमित नहीं हो सकता

nidhi
30 Sept 2026 12:15 PM IST
न्याय आंशिक या सीमित नहीं हो सकता
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न्याय आंशिक
सोहराबुद्दीन शेख़ 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' मामले में 22 लोगों (जिनमें से 21 गुजरात और राजस्थान के पुलिसकर्मी थे) को बरी करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के इस साल मई के फ़ैसले के कुछ पहलुओं की जांच करने के लिए भारत के सुप्रीम कोर्ट की रज़ामंदी, लेकिन फ़ैसले के पैरा 43 (जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जुड़ा है) की जांच करने से साफ़ इनकार करना, न्यायिक क्षेत्र की कमियों की एक गंभीर याद दिलाता है। चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों वाली बेंच ने यह तय किया था कि वह नवंबर 2005 में शेख़ और उनकी पत्नी कौसर बी, और एक साल बाद उनके दोस्त तुलसीराम प्रजापति की एनकाउंटर में हुई हत्या से जुड़े पूरे मामले की दोबारा जांच नहीं करेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
शेख़, जो कई आपराधिक मामलों का सामना कर रहा एक कुख्यात डीलर था, उसे गुजरात-राजस्थान सीमा पर गिरफ़्तार किया गया था। उस पर हथियार रखने और नरेंद्र मोदी (जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे और मई 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं) पर हमले की साज़िश रचने का आरोप लगाया गया था। शाह उस समय मोदी के मंत्रिमंडल में गृह मंत्री थे। याद रहे कि 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को CBI को और मुक़दमे की सुनवाई को मुंबई ट्रांसफ़र कर दिया था। दिसंबर 2014 में स्पेशल CBI जज एमबी गोसावी ने शाह को इस मामले से बरी कर दिया था। उनसे पहले इस मामले को देख रहे जज बीएच लोया उसी महीने रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने सबसे पहले दिसंबर 2018 में 22 आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया था। मई में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस फ़ैसले को बरकरार रखा।
सीमित समीक्षा से सवाल उठते हैं
एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने एक मुश्किल काम को सुलझाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। शेख़ के छोटे भाई रुबाबउद्दीन शेख़ की अपील को खारिज न करके, कोर्ट ने यह दिखाया है कि शीर्ष अदालत के दरवाज़े उन मामलों में भी खुले हैं जिनमें कभी प्रभावशाली लोग आरोपी रहे हों। हालाँकि, जजों का यह कहना कि "कुछ गवाहों के बयान देखें... आप हमें वे 3-4 बयान दें जो आपको ज़रूरी लगते हैं," एक अजीब और खुद से लगाई गई सीमा को दर्शाता है। इस तरह की समीक्षा केस को फिर से खोलने का विकल्प नहीं हो सकती; केस को फिर से खोलने पर सभी सबूतों की दोबारा जांच होती, उन सुरागों की पड़ताल होती जो अचानक ठंडे पड़ गए थे, और इस बात की तह तक जाया जाता कि आखिर क्यों 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए, जिसके कारण आरोपी बरी हो गए।
शाह को आरोपमुक्त करने के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद के मुताबिक सुरक्षित रास्ता अपनाया। अगर कोर्ट इस मामले पर दोबारा विचार करने को तैयार हो जाता, तो यह एक स्वतंत्र, मजबूत और निडर न्यायपालिका के लिए एक आधुनिक मिसाल कायम करता। न केवल यह मौका गंवा दिया गया, बल्कि शाह को आरोपमुक्त करने के फैसले को पलटने की मांग वाली अर्जी पर कोर्ट की टिप्पणियों—कि यह अर्जी "शाह के किसी राजनीतिक विरोधी" द्वारा "छिपे हुए मकसद" से दायर की गई थी—ने दुर्भाग्य से इस प्रचार को और बल दिया है कि यह चुनौती राजनीतिक कारणों से प्रेरित है। इस केस में आए उतार-चढ़ाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसकी गहन समीक्षा की जानी चाहिए थी। सीमित समीक्षा से दोषियों को सजा मिलने की संभावना कम ही है, जिससे 21 साल बाद भी यह सवाल अनसुलझा ही रह जाता है: सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी और प्रजापति की हत्या किसने की?
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