सम्पादकीय

जिनपिंग का नया माओवाद: माओत्से तुंग की विचारधारा को बताया मजबूत

Nidhi Singh
14 Oct 2021 5:14 AM GMT
जिनपिंग का नया माओवाद: माओत्से तुंग की विचारधारा को बताया मजबूत
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दस महीने से भी कम समय में कई तरह के उपाय करते हुए शी जिनपिंग की सत्ता ने वॉल स्ट्रीट और अन्य जगहों पर बन रहे सुविधाजनक खोलों को नष्ट कर दिया

करीब साल भर पहले नवंबर, 2020 में शी जिनपिंग की सरकार ने एंट ग्रुप के 37 अरब डॉलर के आईपीओ को रोक दिया, अन्यथा उसकी कुल कीमत छलांग लगाकर 300 अरब डॉलर हो जाती। जैक मा के महीनों लापता रहने के दौरान पंडित और सटोरिये लीपा पोती कर रहे थे। आमराय थी कि जैक मा मूर्तिभंजक हैं और मनमाने ढंग से पेश आते हैं और यह उनके अहंकार की एकतरफा लड़ाई का नजीता है। भ्रमित करने वाला सामूहिक चिंतन शायद ही कभी इतनी तेजी से धुंधला पड़ता है।

दस महीने से भी कम समय में कई तरह के उपाय करते हुए शी जिनपिंग की सत्ता ने वॉल स्ट्रीट और अन्य जगहों पर बन रहे सुविधाजनक खोलों को नष्ट कर दिया, जिनमें दीदी उर्फ चीन के उबर पर ताबड़तोड़ कार्रवाई से लेकर परोक्ष रूप से ऑनलाइन ट्यूटरिंग को बंद करने, क्रिप्टो करेंसी पर प्रतिबंध लगाने और गेमिंग प्लेटफार्म्स पर बंदिशें लगाने जैसी कार्रवाइयां शामिल थीं। यह शायद ही मायने रखता है कि कट्टरपंथी उपायों ने कंपनियों के बाजार मूल्य और निवेशकों की संपत्ति में बीस खरब डॉलर से अधिक का क्षरण किया है। इसकी ताजा प्रविष्टि है, कर्जदाताओं के 350 अरब डॉलर के ऋण से लदी चीन की दिग्गज रियल एस्टेट कंपनी एवरग्रैंड पर छाया असमंजस, जो कि दिवालिया होने के कगार पर है। जिसे पूंजीवाद की ज्यादतियों के रूप में चिह्नित किया गया है, उसका सुनियोजित शुद्धीकरण भी एक तरह की राजनीतिक क्रांति ही है। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का संवाहक सिद्धांत जोखिमों का आकलन करना और उनका प्रबंधन करना होता है।

किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा अरबपतियों की बेहिसाब संपत्ति और सूचनाओं के नियंत्रण से उपजता है। सामाजिक स्तर पर अरबपतियों के विस्तार ने स्पष्ट तौर पर सामाजिक विभाजन को बढ़ाया है। ढांचागत स्तर पर चीन की दिग्गज टेक कंपनियों ने सत्ता के मौजूदा ढांचे के लिए जोखिम पेश किया है, क्योंकि उन्होंने उम्मीदों और नतीजों के प्रबंधन के वैकल्पिक तरीके पेश किए हैं। शी जिनपिंग ने टेक कंपनियों के आधिपत्य को सीमित करके परोक्ष रूप से धन की शक्ति को निष्प्रभावी कर दिया है। डाटा नियंत्रण को अपने कब्जे में लेकर उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और ताकतवर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पर अपनी पकड़ मजबूत की है। हांगकांग में लोकतंत्र का दमन और ताइवान को हड़पने/हथियाने की खुली धमकी अधिनायकवादी लोकलुभावनवाद के ही साधन हैं। निर्विवाद रूप से यह सब उन्हें 2022 की पार्टी कांग्रेस के मद्देनजर विस्तार की उनकी महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने में सक्षम बनाता है।

नियति से असंतुष्ट होने से बड़ी कोई और आपदा नहीं

राजनीतिक स्थिरता भीतर से मिल रही चुनौतियों के बीच व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता कायम रखने की राजनीतिक चाहत दोनों से जुड़ी है। उनके मौजूदा दृष्टिकोण 'सामूहिक समृद्धि' की केंद्रीय थीम ताओवाद के उनके एक पसंदीदा उद्धरण से ली गई है 'अपनी नियति से असंतुष्ट होने से बड़ी कोई और आपदा नहीं।' जैसा कि हर समाज में होता है, चीन में भी मध्य वर्ग जीवन और आजीविका की चिंता और पीड़ा के अधीन है। जो चीज चीन को अलग करती है, वह है इसका आकार— वहां के मध्य वर्ग का आकार कह सकते हैं कि, अमेरिका की कुल आबादी से भी बड़ा है। पिछले साल से शी और उनकी सत्ता ने पीड़ितों और खलनायकों का कथानक गढ़ने पर ध्यान केंद्रित किया है, उदाहरण के लिए रियल एस्टेट से जुड़े लोगों को मकान और किराये की लागत कम करने के लिए लक्षित किया जा रहा है।

यह उल्लेखनीय है कि चीन और अमेरिका के बीच छह जनवरी को वाशिंगटन में हुई आखिरी वार्ता में चीनी प्रतिनिधिमंडल ने महामारी के प्रबंधन से लेकर प्राकृतिक आपदाओं तक और आय असमानता से लेकर नस्लीय असमानताएं तक सूचियां गिनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिन्होंने दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र को तहस-नहस किया है। व्यवस्था के अंगों पर नियंत्रण के बजाय व्यवस्था के आभास से पैदा हुआ सूचना का अभाव शी को उस विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है, बीजिंग जिसका भू-राजनीतिक परिदृश्य में विस्तार करना चाहता हैः चीन के आर्थिक कौशल और स्थिरता को दुनियाभर के लोकतंत्रों में देखी गई अराजकता के आकर्षक व्यवहार्य विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना।

दरअसल नए चीन का स्थिरता और सामूहिक समृद्धि का 'कथानक गीत' अस्तित्व केसंकट से उपजा है। पूर्व निक्सन युग में चीन का भय था, जैसा कि चाऊ एन लाई ने हेनरी किसिंजर से खुलासा किया था, सोवियत संघ, अमेरिका और उभरते जापान द्वारा उसे तीन टुकड़ों में बांटना। बर्लिन की दीवार के ढहने के बाद चीन को यह भय सता रहा था कि उसका हस्र भी सोवियत संघ जैसा हो सकता है। 1992 में देंग श्याओपिंग ने आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण का दौरा (क्विंग राजवंश के सम्राटों द्वारा इसी तरह के दौरों से प्रेरित) शुरू किया था, विशेष रूप से शेनझेन में विघटन के खिलाफ आर्थिक समृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए।

माओत्से तुंग की विचारधारा को जिनपिंग ने बताया मजबूत

साथ ही उन्होंने निर्देश दिया था कि सुधारों में तेजी लाई जाए और एलान किया कि जो भी सुधारों का विरोध करेगा उसे पद छोड़ना होगा। इसके विपरीत, शी जिनपिंग ने 2013 के अपने 'नए दक्षिणी दौरे' पर आर्थिक विकास की संभावना पर सवाल उठाया और माओत्से तुंग की तरह विचारधारा की तीव्रता का तर्क दिया। उन्होंने कहा, 'सोवियत संघ का बिखराव क्यों हुआ? सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी क्यों ध्वस्त हो गई? इसका महत्वपूर्ण कारण यह था कि उनके आदर्श और विश्वास हिल गए थे।'सामूहिक समृद्धि प्राप्त करने के लिए शी का दृष्टिकोण असामान्य खतरों सेरहित नहीं है। रुग्ण होती उद्यमशीलता और रिटर्न के निवेश का अनिर्वाय रूप से प्रभाव पड़ेगा और दमन में लिपटी कम वृद्धि सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकती है, जिसे वे टालना चाहते हैं। नैतिकता के पैकेज में शी का नया माओवाद कैसे आगे बढ़ेगा यह चीन के लोगों की इच्छा पर निर्भर करेगा। दुनिया इतिहास के मुहाने पर है। एक नियम-आधारित विश्व व्यवस्था के विचार में निवेशित लोकतंत्रों को शी जिनपिंग के वैचारिक और क्षेत्रीय विस्तारवादी एजेंडे को चुनौती देनी चाहिए।

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