सम्पादकीय

India: अस्थिर दुनिया में आत्मनिर्भरता ज़रूरी है

nidhi
9 April 2026 7:40 AM IST
India: अस्थिर दुनिया में आत्मनिर्भरता ज़रूरी है
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दुनिया में आत्मनिर्भरता जरूरी
दुनिया अब सिर्फ़ अलग-अलग देशों का नक्शा नहीं रही। यह एक ऐसा सिस्टम बन गया है जहाँ कहीं भी कोई भी गड़बड़ी दुनिया के हर कोने पर असर डालती है। हाल ही में ईरान, USA और इज़राइल के बीच तनाव ने एक बार फिर यह सच्चाई दिखाई है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी हमें सिखाया कि युद्ध एक इलाके तक सीमित नहीं रहते। उनका असर सीमाओं से आगे भी जाता है।
भारत सीधे तौर पर USA-इज़राइल-ईरान संघर्ष में शामिल नहीं है, लेकिन इसका असर यहाँ साफ़ दिख रहा है। पेट्रोल और LPG सप्लाई में अस्थिरता, छोटी इंडस्ट्रीज़ का बंद होना और एक्सपोर्ट पर असर यह दिखाता है कि हम भी ग्लोबल अस्थिरता का बोझ उठा रहे हैं। दुनिया इतनी जुड़ गई है कि लोग अक्सर इसे “ग्लोबल विलेज” कहते हैं। अगर किसी घर की एक दीवार पर आग लगती है, तो दूसरी दीवार के पास बैठे लोगों को भी उसकी गर्मी महसूस होगी। इसीलिए ईरान, USA और इज़राइल के बीच तनाव सिर्फ़ युद्ध वाले इलाकों तक सीमित नहीं है—यह हमारे किचन, बाज़ार और छोटे बिज़नेस तक पहुँच गया है।
भारत शांति की पॉलिसी पर चलता है, लेकिन ग्लोबल सिस्टम में इसका गहरा दखल ऐसे असर से बचना नामुमकिन बनाता है। चाय बेचने वाला हो या मिठाई की दुकान का मालिक, हर कोई इसका असर महसूस कर रहा है। गैस सिलेंडर बुकिंग में देरी अब सिर्फ़ एक परेशानी नहीं है—यह रोज़ की इनकम पर असर डाल रही है। इसका मुख्य कारण बेसिक ज़रूरतों के लिए दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम इतने ज़्यादा निर्भर हो गए हैं कि कोई भी ग्लोबल गड़बड़ी हमारी अपनी स्थिरता को हिला दे?
यह सच है कि हमारी एनर्जी ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्टेड तेल और गैस से पूरा होता है। जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो सप्लाई चेन पर असर पड़ता है, और इसका सीधा असर हमारे घरों पर पड़ता है। यह निर्भरता सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं बल्कि एक स्ट्रेटेजिक कमज़ोरी भी है। और यह मामला सिर्फ़ एनर्जी तक ही सीमित नहीं है। भारत का इंडस्ट्रियल और एग्रीकल्चर सिस्टम भी कई तरह से ग्लोबल सप्लाई पर निर्भर है। खाने के तेल से लेकर फर्टिलाइज़र, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर डिफेंस इक्विपमेंट तक, हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हैं। यह तब और चिंताजनक हो जाता है जब ग्लोबल संकट लंबे समय तक चलते हैं।
हमें दशकों पहले इराक युद्ध के दौरान पेट्रोल और डीज़ल के लिए लगी लंबी लाइनें याद हैं। अब फिर से वैसी ही स्थिति का डर है। सिर्फ़ इम्पोर्ट ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट भी प्रभावित हो रहा है। बीकानेरी भुजिया, महाराष्ट्र के केले, टेक्सटाइल और सीफूड जैसे प्रोडक्ट्स को इंटरनेशनल मार्केट तक पहुंचने में मुश्किल हो रही है। रोज़ाना बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट होने वाले केले अब पोर्ट्स पर अटके हुए हैं। भुजिया एक्सपोर्ट पर भी असर पड़ा है। असुरक्षित समुद्री रास्तों और बढ़ी हुई लागत के कारण व्यापारियों को नुकसान हो रहा है। यह सिर्फ सामान की बात नहीं है—यह लाखों लोगों की रोजी-रोटी का सवाल है।
आत्मनिर्भरता की चर्चा में, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, हालांकि यह अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बहुत ज़रूरी है। भारत ने डिजिटल रूप से तरक्की की है, लेकिन इसका डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी विदेशी टेक्नोलॉजी पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, क्लाउड सर्विस और सर्वर सिस्टम विदेशी कंपनियों के कंट्रोल में हैं। ग्लोबल तनाव या पाबंदियों की स्थिति में, यह निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। यहां तक ​​कि सोशल मीडिया, सर्च इंजन और डेटा स्टोरेज प्लेटफॉर्म भी विदेशी हैं, जिससे डेटा सुरक्षा और डिजिटल आज़ादी को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
साथ ही, भारत में ओरिजिनल इनोवेशन की कमी भी एक चिंता का विषय है। IT सर्विस में मज़बूती के बावजूद, भारत अभी भी रिसर्च और पेटेंट में पीछे है। रिसर्च और डेवलपमेंट में कम इन्वेस्टमेंट एक बड़ा कारण है। इसलिए, आत्मनिर्भरता के लिए टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन को बढ़ावा देना ज़रूरी है। आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से कट जाना नहीं है—इसका मतलब है ग्लोबल झटकों के असर को कम करने के लिए काफी मज़बूत बनना।
आज, सवाल यह नहीं है कि भारत को ग्लोबल ट्रेड कम करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारी अंदरूनी बुनियाद बाहरी झटकों को झेलने के लिए काफी मज़बूत है।
समय की ज़रूरत है कि हम अल्टरनेटिव एनर्जी सोर्स की ओर बढ़ें। सोलर और विंड एनर्जी अब सिर्फ़ एनवायरनमेंट के मुद्दे नहीं हैं—वे इकोनॉमिक स्टेबिलिटी का बेस भी हैं। इसी तरह, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मज़बूत करना, छोटे उद्योगों को टेक्नोलॉजी और फाइनेंस से सपोर्ट करना, और एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना भारत को अंदर से मज़बूत बनाने के लिए ज़रूरी कदम हैं।
साथ ही, हमें कुछ सवाल पूछने चाहिए: क्या सस्ते इंपोर्ट की वजह से हमारी प्रोडक्शन कैपेसिटी कमज़ोर हो गई है? क्या हमारी पॉलिसी लॉन्ग-टर्म प्लानिंग के बजाय शॉर्ट-टर्म फ़ायदों पर ज़्यादा फोकस कर रही हैं? क्या हम हर संकट के बाद जागते हैं और फिर पुरानी आदतों पर लौट जाते हैं?
ग्लोबल अस्थिरता लगातार बढ़ रही है। एक संकट खत्म होता है, दूसरा शुरू होता है। यह अब कोई एक्सेप्शन नहीं बल्कि एक परमानेंट कंडीशन है। यह उम्मीद करना कि सब कुछ नॉर्मल रहेगा, अनरियलिस्टिक है। चुनौती युद्धों को रोकना नहीं है, बल्कि हमारे देश पर उनके असर को कम करना है।
जब दुनिया जल रही हो, तो हम गर्मी से बच नहीं सकते—लेकिन हम अपने घर को बचाने की कोशिश कर सकते हैं। आत्मनिर्भरता ही वह सुरक्षा है। यह एक ढाल है जो हमें मुश्किल समय में बचा सकती है। हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, सरकार, पॉलिसी बनाने वालों, नागरिकों और संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। यह ज़रूरी है और इसे टाला नहीं जा सकता।
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