सम्पादकीय

तालिबान के मामले में हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा, भारत अपने भरोसे बनाए अफगान नीति

Rani Sahu
15 Sep 2021 8:35 AM GMT
तालिबान के मामले में हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा, भारत अपने भरोसे बनाए अफगान नीति
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यदि भारत के विदेश मंत्रालय के पास दूरदृष्टि होती तो वह भी अन्य महाशक्तियों की तरह तालिबान के साथ खुले-आम या गोपनीय संबंध बनाए रख सकता था

डॉ. वेदप्रताप वैदिक। यदि भारत के विदेश मंत्रालय के पास दूरदृष्टि होती तो वह भी अन्य महाशक्तियों की तरह तालिबान के साथ खुले-आम या गोपनीय संबंध बनाए रख सकता था। जब से तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा शुरू किया, तभी से भारत झिझका रहा। वह झिझक स्वाभाविक थी लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के नाते वह चाहता तो अगस्त में अफगानिस्तान में एक संयुक्त शांति सेना भिजवाकर सालभर में लोकतांत्रिक चुनाव से काबुल में सरकार बनवा सकता था।

यदि भारत सक्रिय रहता तो इस बात की पूरी संभावना थी कि वह तालिबान के आचरण को प्रभावित कर सकता था। इस संभावना के कई आधार हैं। पहला तो यह कि दोहा में चल रहे तालिबान-अमेरिका संवाद में भारत पर्यवेक्षक के तौर पर बुलाया गया था। वहां जानेवाले हमारे अफसर तालिबान नेताओं से गुपचुप संबंध बना सकते थे। तालिबान को पता है कि अफगानिस्तान की विभिन्न सरकारों से भारत के जो संबंध रहे हैं, वे सदा निस्वार्थ रहे हैं।
रूस, अमेरिका, पाकिस्तान और अब चीन की तरह हमें अफगानिस्तान से कोई आर्थिक, राजनीतिक या सामरिक फायदा नहीं उठाना है। हमने अफगानिस्तान में तीन बिलियन डाॅलर खर्च करके उसके 34 प्रांतों में क्या-क्या नहीं बनाया है। उसके संसद भवन और अस्पताल से लेकर सड़कें, नहरें, विद्यालय भवन आदि भारत ने बनाकर खड़े कर दिए हैं। भारत के मुकाबले किसी भी देश के काम को अफगान जनता इतना नहीं सराहती है। स्वयं तालिबान प्रवक्ताओं ने भारतीय निर्माण-कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
हमें शिकायत है कि पाकिस्तान तालिबान को कश्मीर में हमारे खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। यह बात पहले सही थी लेकिन अब तालिबान प्रवक्ता कह चुके हैं कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है। तालिबान प्रवक्ता ने भारत को दक्षिण एशिया का सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्र कहा है और उससे अच्छे संबंध बनाने की इच्छा प्रकट की है और तुर्कमेनिस्तान से शुरू होनेवाली गैस की पाइपलाइन को अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भारत तक लाने की बात कही है।
अब तालिबान के जो उप-विदेश मंत्री हैं, शेर मुहम्मद स्तानिकजई, वे खुद जाकर दोहा में हमारे राजदूत दीपक मित्तल से मिले हैं। इसके बावजूद भारत सरकार को तालिबान ने काबुल से कोई निमंत्रण नहीं भेजा है। भारत सरकार और तालिबान के बीच कोई संवाद नहीं है जबकि भारत कतर, सऊदी अरब, ईरान, अमेरिका और रूस के नेताओं से बराबर बात कर रहा है। यह खुशी की बात है कि विदेश मंत्री जयशंकर ने अफगान जनता की सहायता करने की घोषणा की है।
भारत के पहले चीन ने 30 लाख डाॅलर की सहायता भिजवा दी है। अमेरिका भी संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए 60 करोड़ डाॅलर की सहायता पहुंचा रहा है। इस समय अफगान के 90% से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। वहां कुछ ही दिनों में भयंकर अकाल भी पड़नेवाला है। तालिबान की वर्तमान अंतरिम सरकार इस योग्य नहीं मालूम पड़ती कि वह संकट में फंसे देश को संभाल सके। उसके 33 मंत्रियों में से सिर्फ 3 गैर-पठान हैं जबकि अफगानिस्तान के राष्ट्रगान में 14 जातियों को गिनाया गया है।
उनमें सिख और हिंदू भी जोड़ लें तो वे 16 हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में यह सर्वसमावेशी सरकार नहीं है। इसमें शामिल पठान भी आपस में भिड़ रहे हैं। उप प्रधानमंत्री मुल्ला बिरादर की हत्या की अफवाह भी फैली थी। पाक ने तालिबान का पंजशीर घाटी पर कब्जा करवा दिया है। वह ही तालिबान सरकार को चला रहा है। यह शक सरकार में हक्कानी गिरोह को मिले महत्वपूर्ण पदों से भी पैदा होता है। लेकिन तालिबान की वर्तमान सरकार को दुनिया के किसी भी देश ने औपचारिक मान्यता नहीं दी है।
बड़बोले चीन को शक है कि उसके मुसलमान उइगरों को तालिबान भड़का सकते हैं। पाकिस्तान को भी डर है कि तालिबान पठान कहीं डूरेंड रेखा को खत्म करने की मांग न करने लगे। ईरान ने भी आपत्ति प्रकट कर दी है। वैसे भी अफगानिस्तान के ज्यादातर लोगों को तालिबानी जीवन-पद्धति पसंद नहीं है।
ऐसी स्थिति में इस सरकार के अस्थिर होने की पूरी आशंका है। यदि ऐसा हुआ तो भारत को तैयार रहना होगा। और यदि तालिबान काबुल में जम जाते हैं, तो भारत को दूसरे विकल्प के लिए भी तैयार रहना चाहिए। भारत को अपने भरोसे नीति बनानी होगी। वह दक्षिण एशिया का सबसे जिम्मेदार देश है।
भारत विकल्प खुले रखे
अफगान के ज्यादातर लोगों को तालिबानी जीवन-पद्धति पसंद नहीं। इसलिए सरकार के अस्थिर होने की आशंका है। ऐसे में भारत को तैयार रहना होगा। यदि तालिबान काबुल में जम गए और चीन व पाक के इशारे पर शासन चलाते हैं तो भारत को दूसरे विकल्प के लिए भी तैयार रहना चाहिए। भारत को अपने भरोसे अपनी नीति बनानी होगी।


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