सम्पादकीय

भारतीय सिनेमा में मनोरोगों को अमूमन पागलपन से जोड़कर देखा जाता रहा है

Gulabi
22 Feb 2022 2:08 PM IST
भारतीय सिनेमा में मनोरोगों को अमूमन पागलपन से जोड़कर देखा जाता रहा है
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वर्ष 2015 में जब दीपिका पादुकोण ने दुनिया को बताया कि वे डिप्रेशन के दौर से गुजर चुकी हैं
कावेरी बामजेई का कॉलम:
वर्ष 2015 में जब दीपिका पादुकोण ने दुनिया को बताया कि वे डिप्रेशन के दौर से गुजर चुकी हैं और मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों की सहायता के लिए लिव लव लॉफ फाउंडेशन शुरू करने जा रही हैं, तो पहले-पहल इसे अविश्वास की नजरों से देखा गया था। लेकिन धीरे-धीरे इंडस्ट्री में उन्हें समर्थन मिला। बाद में करन जौहर ने भी डिप्रेशन से अपनी लड़ाई के बारे में बात की। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में इस बारे में लिखा।
बॉलीवुड की मुख्यधारा इस विषय पर फिल्में बनाने लगी। ये फिल्में केवल 'तारे जमीं पर' (2007) की तरह लर्निंग डिसऑर्डर्स की बातें नहीं करती थीं, बल्कि विनिल मैथ्यू की 'हंसी तो फंसी' (2014) जैसी फिल्म में डीप एंग्जायटी को भी विषय बनाया गया। इसमें परिणीति चोपड़ा को 'मेंटल' की तरह प्रदर्शित किया गया। साल 2019 में जब 'मेंटल है क्या' आई, तब तक इस विषय पर फिल्में पहले से अधिक परिष्कृत हो चुकी थीं।
बाद में फिल्म का नाम बदलकर 'जजमेंटल है क्या' कर दिया गया। इसमें मुख्य किरदार को एक्यूट साइकोसिस से लेकर डिसोसिएटिव डिसऑर्डर तक अनेक प्रकार की व्याधियों से ग्रस्त दिखाया गया था। 2020 में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद तो जैसे सार्वजनिक चर्चाओं में अवसाद जैसे विषय की बाढ़ आ गई। इन चर्चाओं में सभी प्रगतिशील नहीं थीं। खुद सुशांत ने सार्वजनिक रूप से अपने अवसाद को नहीं स्वीकारा था, उन्हें डर था कि इससे कॅरिअर पर बुरा असर पड़ेगा।
लेकिन अब बॉलीवुड फिल्में स्क्रीन पर हर तरह के मनोरोगों को प्रदर्शित कर रही हैं। 'डियर जिंदगी' में आलिया भट्‌ट के द्वारा निभाए गए कायरा के किरदार ने किया था। लेकिन चूंकि उस फिल्म में थैरेपिस्ट शाहरुख थे, इसलिए वो सामान्य थैरेपिस्टों जैसे नहीं हो सकते थे। उनकी थैरेपी में बाइक-राइड्स और बीच-वॉकिंग भी शामिल होती थी। नेटफ्लिक्स पर शीघ्र ही आने वाली सीरिज़ 'द फेम गेम' में मानव कौल एक ऐसे सुपरस्टार की भूमिका निभा रहे हैं, जिन्हें बहुत बाद में पता चलता है कि उन्हें बायपोलर डिसऑर्डर है और वे अपनी शादी की नाकामी के लिए इसे ही दोष देते हैं।
और ज़ी-5 पर हाल ही में रिलीज हुई 'मिथ्या' में हुमा कुरैशी को भी एंग्जायटी से जूझता हुआ दिखलाया गया है, जिससे बचने के लिए वे दवाइयां लेती हैं। जहां बॉलीवुड में यह बदलाव स्वागतयोग्य है, वहीं जिस तरह से हिंदी सिनेमा में सभी मनोरोगों को सरलीकृत तरीके से दिखलाया जाता है, वह चिंतित भी करता है। बॉलीवुड सितारों में डिप्रेशन नई बात नहीं है। दिलीप कुमार तक इसके शिकार हो चुके हैं। उन्होंने मनोचिकित्सक की मदद ली थी। और भी ऐसे सितारे होंगे, जिनकी कहानी सामने नहीं आई।
मिसाल के तौर पर मीना कुमारी, जिनकी शराब की लत अवसाद का परिणाम हो सकती थी। वर्ष 1993 में आई फिल्म 'डर' की सनसनीखेज कहानी उसके नायक के मानसिक असंतुलन का ही नतीजा थी। वर्ष 2003 में आई 'तेरे नाम' में सलमान को एक मनोरुग्णालय में दिखलाया गया था, जो कि प्यार में पागल होने वाली पुरानी कहावत को चरितार्थ करता था। अभिनेत्री परवीन बाबी भी एक्स्ट्रीम ऑब्सेशन का शिकार थीं और उनसे अपने सम्बंधों के आधार पर महेश भट्‌ट ने एक फिल्म बनाई थी।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट वरखा चुलानी कहती हैं कि भारतीय सिनेमा में मनोरोगों को अमूमन पागलपन से जोड़कर देखा जाता रहा है, जिसमें रोगी विक्षिप्तों की तरह हरकतें करता है। बॉलीवुड के पटकथा-लेखकों और निर्देशकों को यह नहीं सूझता है कि हमारे जैसे नाइस-न्यूरोटिक्स भी भावनात्मक रूप से असंतुलित हो सकते हैं।
दुनिया में ऐसी अनेक छोटी-मोटी परिस्थितियां होती हैं- जैसे कि किसी छात्र का परीक्षा के दौरान स्तब्ध रह जाना, एक स्त्री का अपने साथी के साथ यौन-सम्बंधों में सहज नहीं होना, किसी जोड़े के बीच लंबा अबोला होना आदि, जिन्हें विक्षिप्तता नहीं समझा जाता, लेकिन ये भी मानसिक व्याधियों की ही श्रेणी में आती हैं।
अब बॉलीवुड फिल्में हर तरह के मनोरोगों को प्रदर्शित कर रही हैं। 'अतरंगी रे' में सारा अली खान ने शिजोफ्रेनिक लड़की का चरित्र निभाया, तो 'गहराइयां' में दीपिका पादुकोण ने अलीशा का चरित्र निभाया, जो एंग्जायटी से जूझ रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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