सम्पादकीय

हिमाचल में मानविकी अध्ययन

Gulabi
5 Oct 2021 5:30 AM GMT
हिमाचल में मानविकी अध्ययन
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हिमाचल प्रदेश से संबंधित अध्ययन का पाठ्यक्रम तथा प्रेरणा का माहौल दिखाई नहीं देता है

दिव्याहिमाचल।

हिमाचल प्रदेश से संबंधित अध्ययन का पाठ्यक्रम तथा प्रेरणा का माहौल दिखाई नहीं देता है, नतीजतन शिक्षा के उद्देश्य एक तरह से करियर की मंडी में सीमित सी बोली लगाते हैं। शिक्षा की सफलता और शिक्षा में सफलता का मूल्यांकन न तो समग्रता से भविष्य को पढ़ पा रहा है और न ही युवाओं की ऊर्जा का दोहन, उनकी क्षमता का रेखांकन है। शिक्षा को जीवन की उपलब्धियों के जो भी ताज मिले, उनसे पढ़ाई का दस्तूर बदल गया। पिछले तीन दशकों में पढ़ाई से रोजगार की जरूरतें तो पूरी की गईं, लेकिन इससे हिमाचली युवा का क्षितिज नहीं खुला। हिमाचली शिक्षा की मेरिट का बाजार इंजीनियरिंग-डाक्टरी तक की पढ़ाई का संबोधन बना, लेकिन इसके दूसरी ओर योग्यता के दर्पण शिकायत करते रहे। करियर की विविधता में मानविकी अध्ययन आज भी हिमाचल की क्षमता में सामने नहीं आ रहा है। प्रदेश भर के स्कूली माहौल में विज्ञान की पढ़ाई को ही श्रेयस्कर मानने से अभिभावक व छात्रों की तलाश को पूरा करते कई संस्थान खुल गए, मगर ह्यूमैनिटीज में श्रेष्ठता का माहौल अछूता रह गया। बच्चे चाहकर भी हिमाचल भर में ऐसे स्कूल नहीं ढूंढ पाते जहां मनुष्य जाति संबंधित ज्ञान-विज्ञान का उपार्जन हो।


यह दीगर है कि पिछले कुछ वर्षों से अभिभावकों या बच्चियों ने दिल्ली की राह पकड़ते हुए ह्यूमैनिटीज विषयों को अपनी योग्यता से पुष्ट किया। राष्ट्रीय स्तर पर टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसिस, लेडी श्रीराम, हिंदू कालेज, मिरांडा हाउस, हंसराज, श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स, सेंट जैवियर्स मुंबई व चंडीगढ़ का महिला सरकारी कालेज की तरफ बढ़ता हिमाचली बच्चियों का रुझान बताता है कि प्रदेश के बच्चों की ऐसे पाठ्यक्रमों की तलाश बढ़ रही है। दरअसल बीए पाठ्यक्रम अब बीएससी से कहीं अधिक सशक्त हो रहे हैं। एंथ्रोपोलॉजी, आर्कियोलॉजी, काम्युनिकेशनल स्टडीज, मनोविज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, कॉमर्स, राजनीति शास्त्र, अंतरराष्ट्रीय संबंध, विदेशी भाषाएं, फिलोसफी, भाषा एवं कला प्रदर्शन, जियोग्रॉफी, खेल, फिजीकल एजुकेशन तथा डिफेंस स्टडीज जैसे विषयों की पढ़ाई का माहौल स्कूल से ही सुदृढ़ हो सकता है। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड को मानविकी अध्ययन को विस्तार देते हुए पाठ्यक्रम में बदलाव करना चाहिए।


पाठ्यक्रमों तथा स्कूली शिक्षा के सर्वेक्षण करते हुए भविष्य के विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। आरंभिक तौर पर हिमाचल के शिक्षा विभाग को हर संसदीय क्षेत्र में कम से कम एक ऐसा आदर्श स्कूल खोलना चाहिए जहां मेरिट के आधार पर मानविकी अध्ययन को नया आकार दिया जा सके। इसी तरह प्रदेश में शिमला, मंडी, धर्मशाला व हमीरपुर जैसे शहरों में ह्यूमैनिटीज कालेज ऑफ एक्सीलेंस खोलने चाहिएं। प्रदेश अपने कई कालेजों को विषय के आधार पर राज्य का दर्जा देते हुए स्टेट कालेज ऑफ इक्नोमिक्स, डिफेंस स्टडीज, कालेज ऑफ आर्ट्स, कालेज ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स, कालेज ऑफ सोशल स्टडीज, हिमाचल की स्टडीज पर केंद्रित कालेज तथा अन्य मानविकी अध्ययन के विषयों से जोड़ सकते हैं। हर दिन हिमाचली बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धियों का वर्णन मिलता है, लेकिन इसके पीछे किसी न किसी बाहरी राज्य के शिक्षण संस्थान की तारीफ होती है। गुरुनानक देव विश्वविद्यालय में हिमाचल के कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी शिक्षा ग्रहण करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, तो प्रदेश की ऊना जैसी जगह में कालेज ऑफ स्पोर्ट्स क्यों नहीं बन सकता। प्रदेश में अगर डेढ़ दर्जन से अधिक लॉ कालेज हैं, तो इनमें से किसी एक में शिक्षा की गुणवत्ता को लॉ अकादमी या लीगल सर्विसिज प्रवेश के लिए ही चिन्हित क्यों नहीं कर दिया जाता है। हिमाचली बच्चों खास तौर पर बेटियों का रुझान जिस तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी की मेरिट में ह्यूमैनिटीज विषयों को चुन रहा है, उसे देखते हुए अब शिक्षा में मानविकी अध्ययन की जरूरत बढ़ रही है।
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