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सम्पादकीय

किसान कब तक इंतजार करेंगे?

Gulabi
23 Feb 2021 4:43 PM GMT
किसान कब तक इंतजार करेंगे?
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केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों को अब इस भ्रम से निकलना चाहिए

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों को अब इस भ्रम से निकलना चाहिए कि उनके आंदोलन से घबरा कर, डर कर या एक लोकतांत्रिक आंदोलन का सम्मान करके केंद्र सरकार कानूनों को वापस ले लेगी। सरकार कानूनों को वापस लेने की बजाय कानूनों की खूबियां बताने का अभियान चला रही है। आंदोलनकारी किसानों से बात करने की बजाय गांव-घर में बैठे किसानों तक पहुंच कर उन्हें कानून समझाने का प्रयास कर रही है। आंदोलन से बाहर रहे किसान संगठनों और खाप पंचायतों के प्रधानों के सहारे आम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। उसने एक महीने से किसान संगठनों से वार्ता बंद कर रखी है। ठीक एक महीने पहले 22 जनवरी को आखिरी बार किसानों के साथ सरकार की वार्ता हुई थी। तब से सरकार ने किसानों को उनके हाल पर छोड़ा है। खुद प्रधानमंत्री ने साफ किया है कि किसान आंदोलन खत्म करें फिर सरकार से बात करें। यानी यह एक तरह से वार्ता की शर्त हो गई है कि पहले आंदोलन खत्म हो।


सरकार के नजरिए को इस बात से भी समझा जा सकता है कि आंदोलन शुरू होने के पहले दिन केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं ने जो कहा है वहीं बात आंदोलन के 90 दिन के बाद भी कही जा रही है। इस दौरान आंदोलन में खूब उतार-चढ़ाव देखने को मिले। एक समय आंदोलन पीक पर पहुंचा, जब सरकार ने लगातार किसानों से वार्ता की और उन्हें कई किस्म के प्रस्ताव दिए। उसके बाद गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली में किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद आंदोलन कमजोर होता दिखा और फिर किसान नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसान आंदोलन में जान फूंकी। पर इस उतार-चढ़ाव के बीच एक चीज नहीं बदली और वह है केंद्र सरकार की जिद! सरकार ने एक बार भी नहीं कहा कि वह किसानों के आंदोलन का सम्मान करते हुए कानूनों की वापसी पर विचार करने को तैयार है।

इसके उलट 21 फरवरी को यानी आंदोलन के 88वें दिन केंद्रीय कृषि मंत्री ने दो टूक अंदाज में कहा कि अगर किसान समझ रहे हैं कि भीड़ जुटा कर कानून बदलवा लेंगे तो ऐसा नहीं होगा। उन्होंने आंदोलन में शामिल लोगों को किसान मानने से इनकार किया और उन्हें किसानों की हितैषी मानने की भी शर्त लगाई। उन्होंने कहा कि अगर आंदोलन कर रहे संगठन किसानों के हितैषी हैं तो वे आंदोलन छोड़ें और सरकार से वार्ता करें। कृषि और किसान कल्याण मंत्री ने यह भी कहा कि किसान संगठन उन्हें समझाएं कि उनको कृषि कानूनों में कौन सा प्रावधान किसान विरोधी लग रहा है। सोचें, 12 दौर की वार्ता हुई और हर वार्ता में कृषि व किसान कल्याण मंत्री ने ही सरकार की ओर से वार्ता की अगुवाई की, उन्हीं के मंत्रालय ने किसानों को कानूनों में बदलाव का मसौदा भेजा और अब 88 दिन बाद वे पूछ रहे हैं कि किसान उनको बताएं कि कानून में कौन सा प्रावधान किसान विरोधी है!

क्या सचमुच किसान कल्याण मंत्री को पता नहीं है कि किसानों को कानून के किन प्रावधानों पर आपत्ति है? उन्होंने 12 दौर की वार्ता की है और उन्हें सब पता है। उन्होंने किसान आंदोलन के विरोध में धारणा बनाने की रणनीति के तहत यह बयान दिया है। आम लोग या दिल्ली से दूर-दराज के इलाके, जहां प्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन की पहुंच नहीं है वहां सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी यह बात पहुंचाना चाहती है कि आंदोलन कर रहे लोग किसान नहीं हैं, वे किसानों के हितैषी भी नहीं हैं और उन्होंने अभी तक यह नहीं बताया है कि उन्हें कानून के किस प्रावधान से दिक्कत है। इसी लाइन को आगे बढ़ाते हुए भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दिन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि यह आंदोलन कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की साजिश है। किसान की मांग भले असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु नहीं पहुंच रही हो पर भाजपा नेताओं की ओर से फैलाई जा रही साजिश थ्योरी की बात पूरे देश में पहुंच रही है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लगभग हर वक्ता ने केंद्रीय कृषि कानूनों की तारीफ की और इसके लिए प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त किया। अब सोचें, जब सत्तारूढ़ पार्टी इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है और सरकार का शुक्रिया कह रही है वह इस कानून की वापसी के बारे में सोच भी कैसे सकती है!

किसानों के आंदोलन की गंभीरता को कम करने के लिए भाजपा ने कृषि व किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को असम का चुनाव प्रभारी बना दिया। तोमर का असम की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है और न उनके गृह राज्य मध्य प्रदेश का कोई कनेक्शन असम से बनता है। फिर भी उनको असम का चुनाव प्रभारी बनाया गया तो उसके जरिए किसानों को और देश के लोगों को भी यह संदेश देना था कि भाजपा और सरकार किसान आंदोलन की परवाह नहीं कर रही है। वह तो चुनाव लड़ने में बिजी है और किसान कल्याण मंत्री दिल्ली से बहुत दूर असम में पार्टी को चुनाव लड़वा रहे हैं। सोचें, लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो ऐसा होता है कि मामूली घटना पर संबंधित मंत्री या संबंधित राज्य का मुख्यमंत्री अपने सारे कार्यक्रम रद्द करके हालात की निगरानी और उससे निपटने के उपाय में लगता है। लेकिन इतने बड़े और इतने लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन से निपटने के प्रयास की बजाय भाजपा ने किसान कल्याण मंत्री को दिल्ली से दूर असम भेज दिया है, चुनाव लड़ाने के लिए। सरकार का मैसेज बहुत स्पष्ट है कि वह किसानों के आंदोलन की परवाह नहीं करती। किसान इस बात को समझ ही रहे होंगे!

सरकार ने अपनी तरह से अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि किसान आंदोलन कर रहे हैं और न उसे इस बात की परवाह है कि पंजाब में इस आंदोलन का अलग तरह से असर हो रहा है। वहां लोगों की नाराजगी बढ़ रही है और वह एक किस्म के अलगाव को जन्म दे रहा है। दिल्ली में बैठे लोगों को नहीं दिख रहा है पर जिस दिन भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कृषि कानूनों की तारीफ हो रही थी उस दिन पंजाब के बरनाला में एक लाख से ज्यादा किसान इसके विरोध में जुटे थे। देश के बाहर की ताकतें इस स्थिति का फायदा उठाने का प्रयास कर रही हैं और तभी मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह को कहना पड़ा कि पाकिस्तान से पंजाब में हथियारों की तस्करी बढ़ गई है। कृषि या किसान के नजरिए से देखने के साथ साथ सरकार को इस पूरे मामले को सुरक्षा के नजरिए से भी देखना चाहिए।

आखिर किसान कब तक सरकार के इंतजार में बैठे रहेंगे? उन्होंने विरोध के सबसे लोकतांत्रिक तरीके का सहारा लिया। वे शांतिपूर्ण आंदोलन पर बैठे और हरियाणा व पंजाब दोनों जगह, जहां स्थानीय निकाय के चुनाव हुए वहां भाजपा के खिलाफ मतदान किया। इसके बावजूद सरकार पर असर नहीं है क्योंकि वह हैदराबाद से लेकर गुजरात के स्थानीय निकाय के चुनाव नतीजों का हवाला देकर कह देगी कि देश में कहीं किसान आंदोलन का असर नहीं है। ऐसी स्थिति में किसान संगठनों को अपने आंदोलन को लेकर गंभीरता से सोचना होगा। सरकार के पिघलने के इंतजार में बैठे रहना कोई विकल्प नहीं हो सकता है। दुष्यंत कुमार का शेर है- वो मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए! किसान आवाज में असर के लिए बेकरार हैं और सरकार पिघलने को तैयार नहीं है।


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