सम्पादकीय

History of Potato : यूं ही नहीं आलू बन गया पूरी दुनिया में सब्जियों का राजा

Rani Sahu
14 May 2022 9:56 AM GMT
History of Potato : यूं ही नहीं आलू बन गया पूरी दुनिया में सब्जियों का राजा
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इंग्लैंड की वॉरविक यूनिवर्सिटी की मशहूर खाद्य इतिहासकार रिबेका अर्ल कहती हैं

अनिमेष मुखर्जी |

इंग्लैंड की वॉरविक यूनिवर्सिटी की मशहूर खाद्य इतिहासकार रिबेका अर्ल कहती हैं, आलू दुनिया का सबसे सफ़ल प्रवासी है. आलू (Potato) दुनिया भर में होता है और हर कई इसे अपना मानता है. ये बात सही है. उत्तर भारत की जीरा आलू की सब्ज़ी, चेन्नई का मसाला दोसा, बंगाल का कॉशा मांग्शो, कश्मीर का दम आलू, बंबई का बटाटा बड़ा, इटली का बेक्ड पटैटो, ब्रिटेन का फिश ऐंड चिप्स या दुनिया के तमाम देशों के किसी और हिस्से का कोई व्यंजन हो, आलू हर किसी में पड़ता है. सब आलू को अपना मानते हैं.
हालांकि, खान-पान से जुड़ी जानकारी रखने वाले तमाम लोग ये सुनते आए हैं कि भारत में आलू पुर्तगाली लेकर आए. ये कैरेबियन देशों में पैदा होने वाली सब्ज़ी थी जो पुर्गालियों के साथ भारत (India) आई और वॉरन हैस्टिंग्स के समय में लोकप्रिय हुई. ये कहानी का आधा हिस्सा है. बटाटा से पटैटो नामकरण तो ठीक है, लेकिन पटैटो का नाम बिगड़कर आलू नहीं हो सकता. क्या है पूरी कहानी आइए जानते हैं.
पटाटा, बटाटा, और पापा
महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा जैसे पुर्गाली प्रभाव वाले इलाकों में आलू को बटाटा कहते हैं. अंग्रेज़ी का पटैटो भी कैरिबियन भाषा टाइनो के बटाटा शब्द से बना है, लेकिन उस भाषा में बटाटा आलू नहीं शकरकंद के लिए इस्तेमाल होता था और आलू को पापा कहते थे. स्पैनिश में आलू के लिए पापा और पटाटा दोनों शब्द इस्तेमाल होते हैं. 16वीं शताब्दी के वनस्पति वैज्ञानिक जॉन गैरार्ड ने शकरकंद को कॉमन पटैटो और आलू को वर्जीनिया पटैटो नाम दिया. उस समय पर वर्जीनिया शब्द नई दुनिया से आई चीज़ों के साथ जुड़ने वाला विशेषण था. हालांकि, आलू और शकरकंद दोनों का वनस्पति विज्ञान के आधार पर कोई रिश्ता नहीं है. दोनों अलग-अलग फैमिली से आने वाली प्रजातियां हैं. लेकिन अपने मीठे स्वाद के चलते शकरकंद, स्वीट पटैटो बन गई और आलू का काम सिर्फ़ पटैटो से चल गया.
गोरों की सुनाई कहानी यहां तक तो ठीक है, लेकिन पटैटो के अचानक से आलू कहलाए जाने की वजह समझ नहीं आती. वे कहते हैं कि भारत में आलू पुर्तगाली लेकर आए और उसके पहले हम आलू को जानते भी नहीं थे. जाने-माने खाद्य इतिहासकार डॉ. पुष्पेश पंत कहते हैं, ये सिर्फ़ एक भ्रम है कि भारतीय उपमहाद्वीप में आलू का अस्तित्व ही नहीं था. आलू बीज के ज़रिए फैलने वाली वनस्पति नहीं है. इसकी आंख काटकर कलम लगानी पड़ती है. इसलिए, आलू अचानक से यहां उन दुर्गम इलाकों तक फैल गया, जहां तक अंग्रेज़ पहुंचे भी नहीं थे, ये मानना मुश्किल हैं. डॉ. पंत कहते हैं कि भारत में पहले तमाम कंद जंगली प्रजातियों के रूप में पैदा होते थे. आयुर्वेद से जुड़े तमाम ग्रंथों, जैन धर्म की किताबों, और तमाम दूसरे पुरातन साहित्य में रक्तालू, पिंडालू, कचआलू वगैरह का नाम और इस्तेमाल लिखा मिलता है. पुर्तगालियों द्वारा लाया आलू इसमें आकर मिला, तो जल्द ही लोकप्रिय हो गया.
हर सब्ज़ी में आलू क्यों होता है
गीतकार आनंदबख्शी हों या पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव, समोसे में आलू के युगों-युगों तक मौजूद रहने की तस्दीक दोनों कर चुके हैं. वृंदावन के सात्विक भोग में तमाम विदेशी मूल की सब्ज़ियां इस्तेमाल नहीं होतीं, लेकिन आलू का इस्तेमाल होने लगा है. कोलकाता की बिरयानी हो या मटन आलू की उनमें मुक्मल जगह है. कई लोग कहते हैं कि वाजिद अली शाह कोलकाता में पहुंचे तो गरीबी और मुफ़लिसी के मारे मीट में आलू मिलवाकर पकवाने लगे. ये बात कोरी कल्पना है. वाजिद अली शाह को अंग्रेज़ों ने 12 लाख सालाना की पेंशन बांधी थी. ये रकम उनके शाही रुतबे को बनाए रखने में थोड़ी कम पड़ सकती थी, लेकिन इतनी भी कम नहीं थी कि गोश्त में आलू मिलाकर खाने की नौबत आए. असल में आलू उस समय पर एक विदेशी सब्ज़ी थी और फिरंगियों के एलीट वर्ग में लोकप्रिय थी. नवाब के खानसामों ने आलू को लेकर तमाम प्रयोग इसीलिए किए कि इस मंहगी विदेशी सब्ज़ी का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल किया जाए. इसलिए, आलू वाले समोसे खाते समय कभी ये मत सोचिएगा कि सस्ता है, इसलिए खा रहे हैं. राजा-महाराजाओं की पसंदीदा चीज़ रही है आलू.
वैसे, आलू के शाही दस्तरखानों से आम लोगों तक पहुंचने के कारण भी बड़े रोचक हैं. आलू बहुत ही पोषक सब्ज़ी है. इसमें भरपूर कार्बोहाइड्रेट और ठीक मात्रा में प्रोटीन और कुछ विटामिन होते हैं. साथ ही, ये कम जगह में ज़्यादा पैदावार देने वाली फसल है. इसके अलावा, आलू ज़मीन के अंदर होता है, तो युद्ध या बलवों के दौरान इसकी फसलें गेहूं की तरह घोड़ों से या आग लगाने से नष्ट नहीं होती थीं. चोरों के लिए भी ज़मीन खोदकर आलू लूटकर ले जाना मुश्किल काम था. गोरे अधिकारी या ज़मीदारों के कारिंदे लहलहाती फसल देखकर ही लगान तय करते थे, तो आलू उस मामले में भी राहत देता था. आलू जल्दी खराब नहीं होता. इसे आग पर भूनकर पका लें, पानी में उबालकर खा लें या किसी किसी शोरबे में मिला लें. आलू की जीवटता गज़ब की है. इसीलिए, युद्ध की रसद से लेकर, रेलवे के जनता भोजन के पैकेट तक आपको आलू के तमाम व्यंजन मिलेंगे. आलू और दूध से मिलकर एक स्वस्थ इंसान के लिए पर्याप्त आहार बन जाता है.
बीबीसी ट्रैवल के लिए लिखे एक लेख में डिएगो आर्गुडास, तो यहां तक कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की इतनी ज़्यादा आबादी में आलू का बड़ा हाथ है. इसने हर वर्ग लोगों को आसानी से पोषण और ऊर्जा दी. वैसे, आलू से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा फ़्रेंच फ़्राई का भी है. अमेरिकी चेन मैक्डॉनल्ड्स ने फ़्रेंच फ़्राई को दुनिया में लोकप्रिय किया, लेकिन दुनिया भर के देश इसपर अपना दावा ठोकते हैं. बेलजियम ने यूनेस्को में दावा किया था कि फ़्रेंच फ़्राई को बेल्जियम से जोड़ा जाए. वहां सर्दियों में नदी जम जाने से मछली मिलना मुश्किल हो जाता था, इसलिए लोग आलू काटकर तलकर ये फ़्राई खाते थे. चूंकि उस इलाके में फ़्रेंच बोली जाती थी, तो इसका नाम फ़्रेंच फ़्राई पड़ गया. वहीं फ़्रांस वाले कहते हैं कि पेरिस के पॉम पोंट-न्यूफ़ पुल के किनारे किसी खोमचे वाले ने पहली बार फ़्रेंच फ़्राई बनाए और बेचे और ये फ़्रांस की देन है. अब सच चाहे जो हो, आलू के तमाम व्यंजनों ने दुनिया भर में लोगों का पेट भी भरा और उनका दिल भी खुश किया है. अगली बार, जब कभी आलू से बना कुरकुरा, चटपटा, और मसालेदार व्यंजन खाइएगा, तो याद रखिएगा कि इस थाली में इतिहास का भी एक छौंक लगा हुआ है.
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