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हिंदुत्व और परिवारवाद के बीच तीसरा विकल्प उभरता
कभी-कभी अपने देश की चुनावी सरगर्मियों को दूर से देखने में नए पहलू साफ नजर आते हैं। कुछ ऐसा हुआ मेरे साथ पिछले सप्ताह जिस दिन तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, असम और पुदुचेरी के चुनाव नतीजे आए थे, तब मैं स्विट्जरलैंड में एक छोटे, सुंदर से गांव में थी।
यहां आना इसलिए हुआ क्योंकि इस गांव में एक खास अस्पताल है, जहां सिर्फ पुनर्वास होता है उन लोगों का, जो किसी मस्तिष्क आघात या पार्किंसंस जैसी गंभीर बीमारी के बाद पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं। चिंता न करें, मैं बात अपने स्वास्थ्य की नहीं कर रही हूं, एक करीबी दोस्त की कर रही हूं, जिनके साथ आई हूं।
स्विट्जरलैंड में इलाज करवाने के लिए बहुत पहले से मरीज आते रहे हैं। पुराने जमाने में तपेदिक के मरीज आते थे। पहले पहाड़ों की ठंडी और साफ हवा को तपेदिक का इलाज माना जाता था। अपने देश में भी तपेदिक के मरीज पहाड़ों में जाते थे। मसूरी जैसी जगहों में इस किस्म के उपचार के लिए अस्पताल बने थे। यूरोप के लोग स्विट्जरलैंड आते थे। जिस गांव में मैं हूं, उसकी लगभग सारी अर्थव्यवस्था इसी अस्पताल पर आधारित है।
दूर से दिखी भारतीय राजनीति की नई तस्वीर
इसलिए इस गांव में रहते हुए मैंने इंटरनेट की मदद से वे सारे शो देखे जिनमें चुनावों से जुड़े लंबे-चौड़े विश्लेषण राजनीतिक पंडितों ने किए थे। वे सारे अखबार भी पढ़े जो मैं रोज पढ़ती हूं जब भारत में होती हूं। मुझे वह बात बहुत कम सुनने को मिली जो मेरी राय में इन चुनावों में खास है।
वह यह है कि शायद पहली बार उस ‘जेन-जी’ की क्रांति के आसार दिखे हैं, जो हमारे पड़ोसी देशों में बहुत पहले दिखे थे। शुरुआत श्रीलंका में हुई थी, जब आम लोग अपने राजनेताओं से इतने तंग आ चुके थे कि राष्ट्रपति के घर में घुसकर उन्होंने तोड़फोड़ की और कई राजनेताओं के घर तक जला दिए गए। राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा। फिर इसी तरह की हलचल बांग्लादेश में दिखी और हाल में नेपाल में भी ‘जेन-जी’ की क्रांति देखने को मिली।
मतदाता अब पुराने राजनीतिक विकल्पों से ऊब चुके हैं
भारत में इस तरह की क्रांति आना मुश्किल है। शायद इसलिए कि लोकतंत्र की जड़ें हमारे देश में मजबूत हैं, लेकिन ऐसा कहने के बाद यह भी कहना होगा कि आम मतदाता उन राजनेताओं और राजनीतिक दलों से तंग आ चुके हैं, जिन्हें उन्होंने बारी-बारी मौका दिया था कुछ ठोस परिवर्तन लाने के लिए, लेकिन विशेष परिवर्तन आया नहीं।
इस बार तमिलनाडु में अभिनेता विजय को जिताकर मतदाताओं ने साबित किया है कि उन्हें असली परिवर्तन चाहिए। कौन कह सकता था नतीजे आने से पहले कि यह नई राजनीतिक पार्टी और उसके बिल्कुल नए-नवेले नेता दोनों द्रविड़ दलों को हरा देंगे। न राजनीतिक पंडितों को इसका अंदेशा था और न ही चुनाव सर्वेक्षण करने वालों को।
परिवर्तन की इसी भावना के कारण पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जैसी अनुभवी मुख्यमंत्री को भारतीय जनता पार्टी ने इस बार बुरी तरह हरा दिया है। ममता को खुद इतना विश्वास था अपनी जीत पर कि नतीजों को स्वीकार करने के बजाय वे नाराज हो गईं और कहने लगीं कि चुनाव चोरी किया गया है। इसलिए त्यागपत्र देने के बदले वे सड़कों पर अपनी लड़ाई लेकर जाएंगी। अगर वे वास्तव में ऐसा करती हैं, तो नुकसान उनका अपना तो होगा ही, भारतीय लोकतंत्र का भी होगा।
सवाल यह है कि अपने देश में मतदाता इतने गुस्से में क्यों हैं कि क्रांति करने की कोशिश कर रहे हैं? यहां याद रखिए कि इस क्रांति की थोड़ी बहुत कोशिश लोकसभा चुनाव में भी दिखी थी, जब नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, बावजूद इसके कि आत्मविश्वास इतना था कि ‘चार सौ पार’ की बात की जा रही थी।
खैरात नहीं, अब बदलाव चाहता है मतदाता
मतदाताओं का गुस्सा मुझे काफी हद तक समझ में आता है। इसलिए कि साल में कई महीने मैं महाराष्ट्र के एक समुद्र किनारे गांव में गुजारती हूं। कोरोना के समय पूर्णबंदी के दौरान पूरा एक साल यहीं गुजारा था। इस गांव में पर्यटन की वजह से काफी तरक्की हुई है। मुंबई के अमीर लोगों ने आलीशान कोठियां बनाई हैं। गांव में हर घर छोटे होटल बन गए हैं और पूरी अर्थव्यवस्था अब पर्यटन पर निर्भर है, लेकिन गांव के गरीब लोग अब भी वैसे ही गरीब हैं जैसे पहले थे।
कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय स्तर पर पूरे भारत में भी हुआ है। राजनेता जानते हैं कि गरीब मतदाता उनसे खुश नहीं हैं, इसलिए उनके वोट लेने के लिए हर चुनाव से पहले खैरात बांटी जाती है। लोग इसे खुशी-खुशी ले लेते हैं, लेकिन जानते हैं कि इस खैरात से न उनकी बेरोजगारी खत्म होने वाली है और न ही उनके जीवन में वह सुधार आने वाला है जिसका उन्हें इंतजार है।
अभी तक उनके सामने दो ही विकल्प हैं—एक तरफ भारतीय जनता पार्टी अपने हिंदुत्व के चोले में, और दूसरी तरफ विपक्षी दल अपने परिवारवाद को धर्मनिरपेक्षता के चोले में छिपाए हुए।
तमिलनाडु के इस चुनाव ने साबित किया है कि तीसरा विकल्प जब भी आएगा, लोग उसे स्वीकार करने को तैयार हैं। यानी वे दिन गए जब मुफ्त की सौगात बांटकर चुनाव जीते जा सकते थे। आम लोगों को असली परिवर्तन चाहिए और जो भी उन्हें उस परिवर्तन की झलक दिखा सकेगा, मतदाता उसकी तरफ जाने को तैयार हो जाएंगे।
अब जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी के बादल दिखने लगे हैं, हमारे राजनेताओं को संभलकर रहना पड़ेगा, वरना उनकी खैर नहीं है। मेरी अपनी राय यह है कि भारत को अब सख्त जरूरत है उस तीसरे विकल्प की, जैसा हमने तमिलनाडु के इस चुनाव में देखा।
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