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सम्पादकीय

कोरोना की तीसरी लहर का कहर

Gulabi
22 Nov 2020 4:59 AM GMT
कोरोना की तीसरी लहर का कहर
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कोरोना की तीसरी लहर फिर कहर बरपाने लगी है।

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। कोरोना की तीसरी लहर फिर कहर बरपाने लगी है। मैडिकल विशेषज्ञ पहले से ही चेतावनी दे रहे थे कि सर्दियों में कोरोना वायरस का संक्रमण फिर कहर बरपा सकता है। त्यौहारों के दिनों में जिस तरह लोग बाजारों में उमड़े और कोरोना संकट से जुड़े प्रोटोकॉल नजरंदाज किया, उससे संक्रमण फैलने की आशंकाओं को बलवती बना दिया था। अदालत की सख्ती भी कोई काम नहीं आई। दीपावली की रात लोगों ने जमकर पटाखे और आतिशबाजी चलाई। वायु प्रदूषण बढ़ने से कोरोना संक्रमण और ज्यादा फैलता है, मगर लोगों को अपीलों और चिंताओं की कोई फिक्र नहीं। यह तो भगवान का शुक्र रहा कि दिल्ली, हरियाणा, पंजाब में वर्षा हुई और तेज हवाएं चलने से आसमान साफ हो गया, अन्यथा हर साल दीपावली के बाद आसमान को साफ होने में दस दिन का समय लग जाता था।

दिल्ली में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ने लगे तो दिल्ली सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए मास्क नहीं पहनने पर जुर्माने की राशि पांच सौ की बजाय दो हजार रुपए कर दी। इसके बावजूद सब्जी मंडियों, बाजारों में लोग मास्क नहीं पहन रहे। अगर पहन भी रखें हैं तो वह नाक के नीचे लटक रहे हैं।

महानगर दिल्ली को दूसरे शहरों की अपेक्षा पढ़े-लिखे जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों वाला शहर माना जाता है, मगर जब यहां के लोगों के दिलों से कोरोना वायरस का खौफ निकल चुका है, लॉकडाउन के अनलॉक होने पर कुछ राज्यों में स्कूल खोले गए थे लेकिन हरियाणा में स्कूली बच्चों और शिक्षकों के संक्रमित होने के बाद स्कूलों पर फिर से ताला लगा दिया गया है। दिल्ली में स्कूल तो मार्च में ही बंद हैं। उत्तराखंड में स्कूल खुलने के पांच दिन बाद ही बंद करने पड़े। गुजरात और महाराष्ट्र में भी स्कूल खोलने के फैसले को टाल दिया गया है। 2020 का सत्र अब समाप्ति की ओर है यानि समाप्ति की ओर अग्रसर यानि इस वर्ष स्कूल खुलने की कोई सम्भावना नहीं। अगर भविष्य में शिक्षा संस्थान खोलने का फैसला ​किया भी गया तो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने को तैयार नहीं होंगे। एक वर्ष का समय शिक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। कोरोना ने शिक्षा व्यवस्था को बहुत नुक्सान पहुंचाया है। शिक्षा की निरंतरता में अगर बाधा उत्पन्न हो जाए तो फिर शैक्षिक वातावरण सृजित करने में काफी समय लगता है। कोरोना पर राजनीति करने का समय नहीं है। केन्द्र और राज्य सरकारों के आपसी तालमेल कायम कर महामारी का सामना करना चाहिए। यह सही है कि भारत में संक्रमितों के ठीक होने की दर संतोषजनक है लेकिन बीमारी की जद में आने से बेहतर है कि उससे बचा जाए।

जब यूरोपीय देशों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर कहर बरपा रही थी तो हमें भी सतर्क हो जाना चाहिए था। दरअसल लम्बे समय से लॉकडाउन से उकसाये लोगों ने अनलाक की प्रक्रिया शुरू होते ही अति सक्रियता और लापरवाही बढ़ा दी। इससे गृहमंत्रालय की चिंताएं भी बढ़ीं और गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली सरकार के साथ मिलकर संक्रमण से बचाव और उपचार के अतिरिक्त संसाधन जुटाने की कवायद तेज कर दी है। यदि दूसरे राज्यों से डाक्टरों और चिकित्सा ​कर्मियों को दिल्ली बुलाया जा रहा है तो संकट की स्थि​ति का अहसास किया जा सकता है। अब तो प्राइवेट अस्पतालों में भी कोरोना संक्रमितों के लिए बैड आरक्षित करने के लिए कदम उठाए गए हैं।

धार्मिक आयोजनों को लेकर जिस तरह की सियासत देखने को मिली, उस पर चिंता ही व्यक्त की जा सकती है। ​बिहार के पटना, झारखंड के रांची तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी, लखनऊ समेत अन्य जगहों पर नदी के घाटों पर चार दिवसीय छठ पूजा के बाद सूर्य की पूजा करके व्रत का पारण किया गया। भारी-भरकम भीड़ ने ​बिना मास्क पहने और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई गईं। हालांकि कई लोगों ने घरों की छतों पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया। छठ पूजा के दौरान बिहार के कुछ मंत्री भी बिना मास्क के देखे गए।

जब तक कोई कारगर वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक कोरोना महामारी को विद्यमान ही माना जाना चाहिए। क्योंकि लोगों से सहयोग की कोई उम्मीद ही नहीं बची है। भारत में युद्ध हो या प्राकृतिक आपदा इस देश के लोगों ने एकजुटता का परिचय दिया है मगर अफसाेस इस बात का है कि कोरोना संकट का सामना करने के लिए जनता भागीदारी नहीं बन रही।

यद्यपि कोरोना वैक्सीन को लेकर राहत भरी खबरें रही हैं। भारत में भी कोरोना वैक्सीन का तीसरा ट्रायल शुरू हो चुका है। हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने खुद टीका लगवाकर जनता में ​विश्वास पैदा करने के लिए अच्छी पहल की है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने भी अगले वर्ष के फरवरी-मार्च के महीनों में वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सभी को समय पर वैक्सीन उपलब्ध करा दी जाएगी। इतनी विशाल आबादी वाले देश में अंतिम छोर तक वैक्सीन उपलब्ध कराना अपने आप में बड़ी चुनौती है। ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि हम खुद को सरकार भरोसे छोड़ दे और लगातार लापरवाही बरतते रहे। कोरोना का फिर से विस्फोट हुआ तो अस्पतालों समेत सारी व्यवस्था ही चरमरा जाएगी, उससे और नुक्सान होगा। यदि लोग चूक करते रहे और कोरोना संक्रमण रोकने के मापदंडों का उल्लंघन करते रहे तो हो सकता है कि अगला वर्ष भी अंधकारमय हो जाए। महामारी पर नियंत्रण पाने के लिए अधिक समय लगाना पड़ सकता है। देश पहले ही आर्थिक संकट से गुजर रहा है, कोरोना का प्रसार उसे नुक्सान पहुंचाएगा।

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