सम्पादकीय

तीन पूर्वोत्तर राज्यों में AFSPA का दायरा कम कर क्या केंद्र ने इसे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है?

Gulabi Jagat
2 April 2022 10:21 AM GMT
तीन पूर्वोत्तर राज्यों में AFSPA का दायरा कम कर क्या केंद्र ने इसे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है?
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विस्तृत अधिसूचना के अभाव में उग्रवाद प्रभावित राज्यों के उन क्षेत्रों के बारे में अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है
सुबीर भौमिक।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने गुरुवार को बताया कि भारत सरकार नागालैंड, असम और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत अशांत क्षेत्रों को कम करेगी. हालांकि गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि AFSPA को इन तीन उग्रवाद प्रभावित राज्यों से पूरी तरह से हटा लिया गया है. यह तीन राज्यों के कुछ क्षेत्रों में लागू रहेगा.
ट्वीट्स की एक श्रृंखला में, शाह ने कहा: "एक महत्वपूर्ण कदम में भारत सरकार ने पीएम नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व में दशकों बाद नागालैंड, असम और मणिपुर राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत अशांत क्षेत्रों को कम करने का निर्णय लिया है." गृह मंत्री ने कहा कि उत्तर पूर्व में स्थायी शांति लाने के लिए मोदी सरकार के लगातार प्रयासों से पूर्वोत्तर में सुरक्षा स्थिति में सुधार और तेजी से विकास हुआ है जिसके चलते AFSPA के तहत अशांत क्षेत्रों में कमी आई है.
यह निर्णय सभी लोगों को खुश नहीं कर पाएगा
शाह ने कहा कि मोदी जी की अटूट प्रतिबद्धता के कारण हमारा पूर्वोत्तर क्षेत्र जो दशकों से उपेक्षित था अब शांति, समृद्धि और अभूतपूर्व विकास के एक नए युग का गवाह बन रहा है. मैं इस खास मौके पर नॉर्थ-ईस्ट (पूर्वोत्तर) के लोगों को बधाई देता हूं." मौजूदा स्थिति को देखते हुए मोदी सरकार ने विवादास्पद कानून को रद्द किए बिना असम, नागालैंड और मणिपुर राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत "अशांत क्षेत्रों" को कम करने का एक तटस्थ निर्णय लिया है.
लेकिन यह निर्णय उन लोगों को खुश नहीं कर पाएगा जो इस कठोर कानून का पूरी तरह अंत चाहते थे और इसे खत्म करने के लिए अदालतों और सड़कों पर लंबे समय से अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं. केंद्र सरकार संभवतः एक संकेत देने की कोशिश कर रही है कि वह कानून का लापरवाह तरीके से इस्तेमाल नहीं करेगी और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएगी. इस निर्णय को इन तीन राज्यों के निवासियों से कुछ प्रशंसा जरूर मिल सकती है. खासकर उन क्षेत्रों से जहां अफस्पा (AFSPA) अब लागू नहीं होगा.
विस्तृत अधिसूचना के अभाव में उग्रवाद प्रभावित राज्यों के उन क्षेत्रों के बारे में अभी तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है जहां AFSPA लागू नहीं किया जाएगा. दो महीने पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने AFSPA से जुड़ी कुछ सकारात्मक खबरों की बात की थी. सरमा जो पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह सहित बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के बहुत करीबी माने जाते हैं उन्हें निश्चित रूप से इस बात की जानकारी थी कि सरकार AFSPA में कुछ छूट देने पर विचार कर रही है.
नागालैंड सरकार की जांच ने स्पष्ट रूप से सेना को दोषी ठहराया है
हालांकि असम सरकार ने 1 मार्च को पूरे राज्य में AFSPA को 28 फरवरी से छह महीनों के लिए और बढ़ा दिया था. मणिपुर और नागालैंड में भी, AFSPA को क्रमशः 1 दिसंबर और 30 दिसंबर को छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया था. सभी संकेतों को देखते हुए इन तीन राज्यों में AFSPA के दायरे को कम करने का केंद्र का निर्णय नागालैंड के मोन जिले के ओटिंग में 4 दिसंबर को हुई हत्याओं पर देशव्यापी आक्रोश की प्रतिक्रिया लग रहा है. 4 दिसंबर को सेना के पैराट्रूपर्स ने 13 कोयला खनिकों की गोली मारकर हत्या कर दी थी जिनका उग्रवाद से कोई संबंध नहीं था. गृह मंत्रालय ने भी सेना और नागालैंड सरकार की तरह इस घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं. सेना द्वारा अपने सैनिकों की पैरवी करने के उसके इतिहास को देखते हुए सेना की जांच से ज्यादा कुछ सामने आने की उम्मीद नहीं थी.
देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता उन खबरों से नाराज थे जिनमें कहा गया था कि पैराट्रूपर्स को पड़ोसी असम के जोरहाट में उनके बेस से म्यांमार की सीमा से लगे नागालैंड के एक सुदूर कोने में ले जाया गया. यह आरोप लगाया गया था कि संदिग्ध खुफिया जानकारी के आधार पर नागरिकों की गाड़ियों पर नकली नंबर प्लेट लगाई गई थी. यह भी आरोप लगाया गया कि पैराट्रूपर्स ने संदिग्धों की पहचान किए बिना गोलियां चला दीं. एक धारणा यह बन गई है कि AFSPA ने सैनिकों को लोगों को मारने का लाइसेंस दे दिया है.
नागालैंड सरकार की जांच ने स्पष्ट रूप से सेना को दोषी ठहराया है. राज्य के एक अधिकारी ने इसे "कोल्ड ब्लडेड मर्डर" कहा. अब ऐसा लगता है कि गृह मंत्रालय की जांच जिसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और शायद कभी किया भी नहीं जाएगा, ने नागालैंड रिपोर्ट की ओर इशारा किया है. ओटिंग नरसंहार ने लोगों के इस विश्वास को और मजबूत किया कि पैराट्रूपर्स AFSPA के तहत प्रदान की गई सुरक्षा की बदौलत कुछ भी कर सकते हैं.
फिलहाल पश्चिमी असम के बोडो बहुल क्षेत्र में शांति बरकरार है
एक तरह से अशांत क्षेत्रों का कम होना समझ में आता है. उदाहरण के लिए, दो साल पहले केंद्र और असम सरकार द्वारा बोडो विद्रोही समूहों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से पश्चिमी असम के बोडो बहुल क्षेत्र में शांति बरकरार है. इसलिए बोडोलैंड टेरिटोरियल ऑटोनॉमस काउंसिल के पूरे क्षेत्र को AFSPA के तहत रखने का कोई मतलब नहीं है. इसी तरह, बंगाली बहुल बराक घाटी को AFSPA के तहत रखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इस क्षेत्र में उग्रवाद का कोई इतिहास नहीं रहा है. असम में अब एक प्रमुख विद्रोही समूह उल्फा (ULFA) है, जो ऊपरी असम के कुछ हिस्सों में सक्रिय है. इसलिए उन कुछ जिलों को ही AFSPA में रखना काफी होगा.
नागालैंड और मणिपुर के साथ भी यही स्थिति है. अधिकांश नगा विद्रोही गुट केंद्र के साथ बातचीत कर रहे हैं. बातचीत की धीमी गति ने भले ही उनके कई नेताओं को परेशान कर दिया हो लेकिन उनके लोग अपने गुरिल्ला अभियान को फिर से शुरू करने के लिए जंगलों में नहीं लौटे हैं. जब तक इन समूहों के साथ संघर्ष विराम कायम है वहां के निवासियों को 'शांति लाभांश' से वंचित क्यों किया जाना चाहिए? जब निवासियों को आधी रात को विद्रोहियों या सुरक्षा बलों द्वारा दरवाजा खटखटाए जाने का डर नहीं है – क्या वे विद्रोहियों पर शांतिपूर्ण समझौता करने के लिए दबाव डालने में सक्षम होंगे? AFSPA को अतीत में अन्य पूर्वोत्तर राज्यों जैसे त्रिपुरा और मेघालय से हटाया जा चुका है. तो इस तरह से अमित शाह द्वारा आज घोषित किया गया निर्णय अनोखा नहीं है. यह महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि यह तीन राज्यों के विद्रोही समूहों के साथ चल रही शांति वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनाने की संभावना पैदा करेगा.
हिमालय में बर्फ पिघल रही है और भारतीय सेना चीन की हर हरकत पर करीब से नजर बनाए हुए है ऐसे में सेना के लिए LAC में कुछ यूनिटों को स्थानांतरित करने के बारे में सोचना एक अच्छा कदम हो सकता है. उत्तर-पूर्व में स्थिति काफी हद तक शांतिपूर्ण है और इस क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का जोर स्वागत योग्य पहल है. अशांत क्षेत्रों को कम करने से सेना को अपनी यूनिटों को उन जगह स्थानांतरित करने में मदद मिल सकती है जहां उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उत्तर-पूर्व की स्थिति पर लिखते हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)
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