सम्पादकीय

राज्यपालों को राजनीति से ऊपर रहना चाहिए

nidhi
17 Oct 2026 10:42 AM IST
राज्यपालों को राजनीति से ऊपर रहना चाहिए
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राज्यपालों को राजनीति से ऊपर
भारत की संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि राज्य सरकारें संविधान के दायरे में रहकर काम करें। फिर भी, संविधान में इस पद के लिए कोई विशेष योग्यता निर्धारित नहीं की गई है। केंद्र सरकार किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश कर सकती है, और अब तक की सरकारों ने अपने इस अधिकार का इस्तेमाल अपने वफादार राजनीतिक सहयोगियों को इनाम देने के लिए किया है।
कई लोगों के लिए, राजभवन एक ऐसा आरामदायक ठिकाना बन गया है जहाँ बिना किसी खास जिम्मेदारी के पद का आनंद लिया जा सकता है। नरेंद्र मोदी सरकार ने राज्यपाल की नियुक्तियों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए एक नए स्तर पर पहुँचा दिया है। विपक्ष शासित राज्यों में, राज्यपालों पर अक्सर चुनी हुई सरकारों के काम में बाधा डालने और संवैधानिक टकराव पैदा करने के आरोप लगते रहे हैं।
वहीं, भाजपा शासित राज्यों में, यही पद अक्सर केवल एक औपचारिक उपस्थिति तक ही सीमित नजर आता है। इस तरह की चुनिंदा सक्रियता उस संस्था में जनता के भरोसे को कम करती है, जिसे दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए।
सिक्किम के राज्यपाल के रूप में दुष्यंत कुमार गौतम की नियुक्ति ने एक बेहद चिंताजनक विवाद को जन्म दिया है। उनका नाम उत्तराखंड के एक रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट रहीं 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की 2022 में हुई हत्या के मामले में, एक अनसुलझे 'वीआईपी' (VIP) एंगल से जोड़ा जा रहा है। अंकिता के माता-पिता ने इस संबंध का आरोप लगाया है, लेकिन आरोप कोई सबूत नहीं होते। गौतम ने इन आरोपों से इनकार किया है, और दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया से उन पोस्ट को हटाने का आदेश दिया है जिनमें उन्हें इस हत्या से जोड़ा गया था। इसलिए, बिना सबूत के उन्हें दोषी ठहराना अन्यायपूर्ण होगा। फिर भी, इस मामले से जुड़े सवालों का एक विश्वसनीय समाधान निकलना चाहिए।
परिवार के दुख और उनकी गहन जांच की मांग को यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका यह डर कि राज्यपाल के पद पर नियुक्ति से आपराधिक कार्यवाही में जटिलता आ सकती है, इसे भी दूर किया जाना चाहिए। इसके लिए राज्यपाल को मिलने वाले संवैधानिक संरक्षणों के बारे में स्पष्ट और आधिकारिक जानकारी दी जानी चाहिए। ऐसा कोई ठोस कारण नहीं है कि जांच पूरी होने और सभी सवालों के जवाब मिलने तक इस नियुक्ति को टाला न जा सके। भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो सिक्किम में यह जिम्मेदारी संभाल सकें। फिर इस समय गौतम को ही नियुक्त करने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस सिफारिश पर पुनर्विचार करना चाहिए। नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे जनता का भरोसा बढ़े, न कि संदेह और गहरा हो। यह सिद्धांत कि 'सीज़र की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए' (यानी उच्च पदों पर बैठे लोगों को हर तरह के संदेह से ऊपर होना चाहिए), एक संवैधानिक पद के मामले में विशेष रूप से लागू होता है।
ओडिशा के मनोनीत राज्यपाल ब्रज मोहन राम से जुड़ा विवाद भी इसी बात को पुख्ता करता है। उनका यह बयान कि वे भाजपा को मजबूत करेंगे और उसका वोट शेयर बढ़ाएंगे, उस पद के बिल्कुल विपरीत है जिसे वे संभालने जा रहे थे।
बाद में उनके द्वारा इसे 'जुबान फिसलने' की घटना बताने से भी शुरुआती चिंता खत्म नहीं होती। नियुक्ति से पहले किसी व्यक्ति की राजनीतिक निष्ठाएं हो सकती हैं, लेकिन शपथ लेने के बाद, पार्टी के प्रति निष्ठा की तुलना में संविधान को सर्वोपरि रखना अनिवार्य है।
उनका कर्तव्य है कि वे बिना किसी डर या पक्षपात के, निष्पक्ष रूप से जनता की सेवा करें। राज्यपाल संवैधानिक पदाधिकारी होते हैं, न कि किसी पार्टी के एजेंट। राष्ट्रपति और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियुक्तियों में इस अंतर का ध्यान रखा जाए। अन्यथा, राजभवन संवैधानिक मर्यादा का संरक्षक बनने के बजाय, सत्ताधारी पार्टी के मुख्यालय का ही एक विस्तार बनकर रह जाएगा।
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