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सरकार को आर्थिक संकेत
पिछले कुछ हफ्तों में, सरकार ने GDP, महंगाई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) जैसे कई आर्थिक आंकड़े जारी किए हैं। इसी बीच, महंगाई को काबू में रखने के लिए केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में बढ़ोतरी की है।
इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखने पर यह साफ हो जाता है कि हमारी अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है, जितना कि बताया जा रहा है। इसके सामने एक मुश्किल नीतिगत चुनौती है: महंगाई को जड़ जमाने से कैसे रोका जाए और साथ ही आर्थिक विकास को भी कैसे बचाया जाए?
असली चुनौती यह समझने की है कि ये सभी आंकड़े मिलकर क्या संकेत दे रहे हैं, न कि इन्हें अलग-अलग करके देखा जाए। जहां GDP की वृद्धि आर्थिक विस्तार की गति को दर्शाती है, वहीं महंगाई यह बताती है कि बढ़ती कीमतें परिवारों और व्यवसायों पर क्या असर डाल रही हैं। दूसरी ओर, रेपो रेट यह दिखाता है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधियों को नुकसान पहुंचाए बिना कीमतों के दबाव को कैसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
खुदरा महंगाई RBI के लक्ष्य से ऊपर पहुंची
भारत में खुदरा महंगाई अगस्त के 4.83 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 5.54 प्रतिशत हो गई है, जो यह दिखाता है कि कीमतों का दबाव अभी खत्म नहीं हुआ है। 12 अक्टूबर को जारी किए गए ये ताजा आंकड़े, मौजूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) सीरीज के तहत अक्टूबर 2024 के बाद से सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। यह लगातार चौथे महीने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर बना हुआ है। महंगाई के 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा के करीब पहुंचने पर RBI का चिंतित होना स्वाभाविक है, लेकिन मुख्य सवाल यह है कि क्या यह बढ़ोतरी सप्लाई में रुकावटों के कारण हुई है या फिर अत्यधिक मांग के कारण?
खाद्य और कोर महंगाई ने बढ़ाई चिंताएं
एक क्षेत्र जिस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, वह है खाद्य महंगाई। यह अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत हो गई है, जो प्याज, अदरक और लहसुन जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में भारी उछाल को दर्शाता है। इसके अलावा, मानसून की कमी (जो औसत से लगभग 13 प्रतिशत कम रहा और पिछले एक दशक में सबसे कमजोर रहा) और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बढ़ा दिए हैं। बता दें कि भारत अपनी ऊर्जा खपत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि 'कोर महंगाई' (जिसमें खाद्य और ईंधन की अस्थिर कीमतों को शामिल नहीं किया जाता) अगस्त के 4.16 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 4.6 प्रतिशत हो गई है। कोर महंगाई में बढ़ोतरी पर ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि यह संकेत हो सकता है कि कीमतों का दबाव अब केवल भोजन और ईंधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी फैल रहा है। अगर कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो महंगाई लंबे समय तक बनी रह सकती है। ऐसे में, RBI के लिए महंगाई को वापस अपने तय लक्ष्य के दायरे में लाना और भी मुश्किल हो जाएगा।
ऊंची ब्याज दरों की भी अपनी सीमाएं हैं
महंगाई को काबू में करने के लिए, RBI ने अक्टूबर में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया था, और आगे भी इसमें और बढ़ोतरी की उम्मीद है। अब यह देखना होगा कि क्या इससे महंगाई में कोई बड़ी कमी आती है। मौद्रिक नीति (monetary policy) मुख्य रूप से कर्ज लेने की लागत और खर्चों के जरिए काम करती है। ऊंची ब्याज दरें महंगाई को नियंत्रित करने में तो मदद कर सकती हैं, लेकिन इनसे न तो बारिश अच्छी हो सकती है, न ही सब्जियों की आपूर्ति बढ़ सकती है और न ही ईंधन की कीमतें कम हो सकती हैं।
सितंबर के महंगाई के आंकड़े एक चेतावनी हैं, जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए और सबसे अहम बात यह है कि उसे अपने नागरिकों के प्रति पूरी तरह पारदर्शी रहना चाहिए।
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