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नागा समझौते
एक नए वार्ताकार की नियुक्ति से नागा शांति प्रक्रिया को फिर से गति मिलने की उम्मीद जगी है। यह भारत में विद्रोह से जुड़ी बातचीत की सबसे लंबी प्रक्रिया है। केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त IPS अधिकारी और जॉइंट इंटेलिजेंस कमिटी (JIC) के पूर्व अध्यक्ष अजीत लाल को अपना वार्ताकार चुना है।
साथ ही, केंद्र सरकार बातचीत के ढांचे में एक या एक से अधिक केंद्रीय मंत्रियों को शामिल करने पर भी सहमत हो गई है — जो कि नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN-IM) की लंबे समय से चली आ रही मांग थी। 1997 में NSCN-IM और केंद्र सरकार के बीच संघर्ष-विराम (सीजफायर) समझौता हुआ था, जिसके बाद शांति वार्ता शुरू हुई। लेकिन, एक चौथाई सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाई है। 2015 में, केंद्र सरकार ने नागा राजनीतिक मुद्दे को सुलझाने के उद्देश्य से एक 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' (ढांचागत समझौता) पर हस्ताक्षर किए थे।
इस गतिरोध की मुख्य वजह नागा प्रतिनिधियों की दो मांगें हैं: एक अलग संविधान और एक अलग झंडा। उम्मीद है कि शांति प्रक्रिया को अब जरूरी गति मिलेगी, क्योंकि केंद्र सरकार ने पहली बार अपनी वार्ता टीम में केंद्रीय मंत्रियों को शामिल किया है। पिछले साल अक्टूबर में, 92 वर्षीय NSCN (IM) प्रमुख थुइंगालेंग मुइवा ने चेतावनी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे फिर से विद्रोह शुरू कर देंगे। भारत सरकार और NSCN-IM के बीच हुए इस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में नागाओं के "विशिष्ट इतिहास और परिस्थितियों" को तो मान्यता दी गई, लेकिन मुख्य मुद्दे अनसुलझे ही रह गए। हालांकि, केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अलग संविधान और अलग झंडे की मांग को स्वीकार नहीं कर सकती। पिछले ही महीने, मुइवा ने फिर दोहराया कि संप्रभुता, एक अलग झंडा और एक अलग संविधान उनके समूह की मुख्य मांगें बनी हुई हैं।
राजनीतिक स्तर पर बातचीत के लिए सहमत होकर और एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी को वार्ताकार नियुक्त करके, केंद्र सरकार ने यह संकेत दिया है कि वह राजनीतिक आश्वासन देने के लिए तैयार है। साथ ही, इसका मकसद नागालैंड में जन-दबाव बनाना भी है, जहां लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। नागालैंड के लोगों के लिए, 1997 से लागू संघर्ष-विराम का मतलब यह है कि दो पीढ़ियां बिना किसी संघर्ष के बड़ी तो हो गईं, लेकिन उन्हें कोई ठोस समाधान भी नहीं मिला।
अब इस संघर्ष-विराम को अक्सर एक 'कभी न खत्म होने वाले प्रतीक्षा कक्ष' (endless waiting room) के रूप में देखा जाने लगा है। NSCN(I-M) ने सभी विकल्पों को खारिज कर दिया है, जिनमें राष्ट्रीय ध्वज की जगह सांस्कृतिक ध्वज अपनाना और अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद संविधान से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना शामिल है। इसका मतलब यह है कि ध्वज और संविधान के मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। चर्चा के अन्य मुद्दों में नागा सेना, अलग मुद्रा और 'नागालिम' (असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में नागा आबादी वाले क्षेत्रों को एक साथ मिलाना) शामिल हैं।
जहाँ कम से कम सात अलग-अलग समूहों का संगठन, 'नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स' (NNPGs), एक राजनीतिक समाधान स्वीकार करने और बातचीत जारी रखने के लिए सहमत हो गया है, वहीं NSCN-IM अपने अलग ध्वज और संविधान की मांग पर अड़ा हुआ है। इस रुख के कारण दशकों से चल रही बातचीत का कोई अंतिम समाधान नहीं निकल पा रहा है। केंद्रीय खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि मुख्य रूप से मणिपुर में अभी भी सक्रिय उग्रवाद का नागालैंड से गहरा संबंध है। खराब शासन-व्यवस्था ने लोगों के असंतोष को और बढ़ा दिया है। किसी समझौते तक पहुँचने के लिए सरकार और नागा समूहों के प्रतिनिधियों, दोनों को ही लचीला रुख अपनाना होगा।
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