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इस मुद्दे पर तो देश का पूरा कृषि से जुड़ा वर्ग शामिल होगा। तब निश्चित ही 'सबका विकास' हो सकेगा।
देश में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। इसके साथ ही प्रत्येक राजनीतिक पार्टी मतदाताओं को रिझाने के लिए तमाम तरह के वादों के साथ अपने घोषणा पत्र तैयार कर रही हैं। इसी के तहत मिलेटस (मोटा अनाज) से बने सतुआ आदि जैसे तमाम पौष्टिक आहारों को छोड़कर कोई मोमोज, तो कोई पार्टी चाउमीन का स्वाद अपने-अपने घोषणा पत्र में लोगों को देना चाहती है।
ठीक उसी तरह, जिस तरह बिल गेट्स ने आम लोगों को जलवायु परिवर्तन रोकने या कम करने के लिए कृत्रिम बीफ खाने का सुझाव दिया है! चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियां यह भूल जाती हैं कि जो घोषणाएं वे कर रही हैं, सरकार में आने के बाद उन घोषणाओं को पूरा करने में वे कितनी सक्षम एवं तनाव रहित होंगी। यह तनाव उन कर्मचारियों को होता है, जो जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़े हुए हैं।
आज जिन पर्यावरणीय समस्याओं से आम आदमी जूझ रहा है, उनका हल या उपाय ग्रीन टेक्नोलॉजी में है, ऐसा सरकारों व उद्योगपतियों का कहना है। लेकिन ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि आर्थिक विकास असीमित नहीं हो सकता। अतः आज एक ऐसे घोषणा पत्र की जरूरत है, जिसमें समाज अपनी ऊर्जा से आगे बढ़े और अपने देश की प्रमुख बड़ी समस्याओं का स्वत: समाधान बनकर राज्य सरकारों को देश-दुनिया की समस्याओं से निजात दिलाने का मार्गदर्शक बनाए।
अब प्रश्न यह है कि कौन-से क्षेत्र को सशक्त बनाया जाए, जिससे वैश्विक और स्थानीय समस्याओं का समाधान मिले व देश उन्नति व खुशहाली के मार्ग पर चल पड़े। देश के विकास में विभिन्न सेक्टरों के योगदान को देखते हुए कृषि का क्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें देश की कम से कम पचास फीसदी जनसंख्या जुड़ी हुई है, एवं सतत जीवन लक्ष्यों का कृषि से सीधा संबंध है। कृषि और कृषक के दोहन की समस्याएं बहुत हैं, इसलिए प्रश्न भी बहुत होना स्वाभाविक है।
अतः राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वे अपने घोषणा पत्र में किसानी को प्रमुखता के साथ राष्ट्रीय कार्य घोषित करें। इसके लिए किसानों के लिए मानक तय किए जाएं। उदाहरण के लिए, ऐसे किसान, जो अपने खेत में वर्षा जल का उपयोग व संरक्षण करते हों, अपने खेत में बागवानी करते हों, जो अपने खेत के अनुपात में पशुपालन/गौपालन करते हों, अपने ही घर-गांव में कृषि उत्पाद प्रसंस्करण कार्य करते हों और ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार देते हों, जिनके पास बीज-खाद स्वयं का हो, बैलों से खेती करते हों, घरेलू उपयोग और कृषि सिंचाई पानी के लिए सौर ऊर्जा का प्रयोग करते हों, एवं बहु फसली खेती करते हों, उन्हें मानक माना जा सकता है और उन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है।
ऐसे कदम से भू-जल समृद्धि, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन, रोजगार और पौष्टिक आहार में वृद्धि हो सकती है और खेती के प्रति रुझान में कमी, पलायन, शहरों में बढ़ती आबादी के दबाव, कुपोषण जैसी समस्याओं से निजात मिल सकती है। इससे जैव-विविधता को बचाने में भी मदद मिल सकती है और किसान आत्महत्या पर अंकुश लग सकता है। किसानों को साठ वर्ष की उम्र के बाद मासिक और निश्चित सम्मान निधि दिए जाने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
ऐसे घोषणा पत्र से राज्य और केंद्र की सरकारें कम आर्थिक बोझ महसूस करेंगी। जब चिली जैसा देश जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे के हल के लिए एक नया संविधान तक बना सकता है, तब क्या हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणा पत्रों के केंद्र में अहिंसात्मक कृषि को नहीं रख सकतीं। कृषि में उपयोग होने वाले रासायनिकों, कीटनाशकों आदि के कारण जैवविवधता या पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचता है, यह मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और जालसाजी के बाद दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आपराधिक गतिविधि है।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मुझे 100 अच्छे लोग अगर मिल जाएं, तो देश को खुशहाल बना दूंगा। इस मुद्दे पर तो देश का पूरा कृषि से जुड़ा वर्ग शामिल होगा। तब निश्चित ही 'सबका विकास' हो सकेगा।
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