सम्पादकीय

हिमाचल निर्माण के लिए

Rani Sahu
25 Nov 2021 6:57 PM GMT
हिमाचल निर्माण के लिए
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हिमाचल में कमोबेश हर सरकार चुनावी साल में घोषणाओं के पिटारे खोलते हुए सियासत की पपडि़यां हटाती रही है

हिमाचल में कमोबेश हर सरकार चुनावी साल में घोषणाओं के पिटारे खोलते हुए सियासत की पपडि़यां हटाती रही है और इसी परिदृश्य में कई ढकोसले भी खड़े किए जाते रहे हैं। बिजलियां गिराने के आलोक में हर मुख्यमंत्री ने बड़े से बड़ा करने के बजाय बड़ा दिखने की कोशिश की है। हिमाचल निर्माण के बजाय सत्ता की राजनीति का निर्माण इतना आगे निकल गया है कि विकास की निरंतरता क्षेत्रवाद की संकीर्णता में उलझ रही है और हर बार सत्ता का प्रस्थान व आगमन, फर्जी ढोल ढमाकों के बीच प्रदेश का भविष्य नहीं देख पा रहा है। बहरहाल सत्ता की महत्त्वाकांक्षा में पुनः नए जिलों के गठन के द्वार पर हल्की सी दस्तक क्या हुई, सियासत को शक है कि कारवां लूटा जा रहा है। चिंगारी कांगड़ा के विभाजन को लेकर फिर पैदा की जा रही है और इसी के परिप्रेक्ष्य में पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा का बयान सियासत के इस तीर की तरफ इशारा करता है। इससे पहले भी कांगड़ा को तोड़ने की शक्तियां सक्रिय रही हैं, लेकिन विरोध के चलते ऐसा नहीं हुआ। स्वयं शांता कुमार इस तरह के आइडिया के खिलाफ रहे हैं, जबकि प्रेम कुमार धूमल को काफी आगे बढ़कर भी कदम पीछे खींचने पड़े थे। हिमाचल की तात्कालिक राजनीति में नेताओं का वजन इतना हल्का हो चुका है कि वे हर पक्ष को टुकड़ों में विभक्त करके लाभार्थी बनना चाहते हैं।

विडंबना यह भी रही कि प्रदेश का सबसे बड़ा कांगड़ा जिला अगर पंद्रह विधानसभा सदस्यों के बावजूद और हर बार सत्ता का द्वार खोलकर भी मुख्यमंत्री का पद हासिल नहीं कर पा रहा है, तो टुकड़ों में बंट कर इसकी हैसियत 'नगर निगम' के स्तर से भी बदतर हो जाएगी। हो सकता है अनेक जिलों के मार्फत कुछ नेता क्षेत्रीय क्षत्रप बनना चाहते हों, लेकिन यथार्थवादी दृष्टिकोण के बिना कौन राज्य की मिलकीयत में सही साबित होगा। जिस प्रदेश को छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए अतिरिक्त दस हजार करोड़ का प्रबंध करना हो या जहां 65 हजार करोड़ की उधारी सिर पर खड़ी हो, उसे आर्थिक संसाधन पैदा करने, आत्मनिर्भर बनने, सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने तथा रोजगार के अवसर पैदा करने की चिंता करनी चाहिए। इससे पूर्व हाल ही में तीन नए नगर निगमों का गठन तो हो गया, लेकिन उनके लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का प्रश्न अभी हल नहीं हुआ। अगर हम राजधानी शिमला को राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप स्वच्छता में साबित नहीं कर पा रहे, तो मसला इस हकीकत से भी जुड़ा है। प्रदेश को क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, ट्रांसपोर्ट नगर, उपग्रह शहर, औद्योगिक क्षेत्र या आईटी पार्क जैसे संकल्पों की जरूरत को नजरअंदाज करके नए जिलों की इबारत में शायद ही कुछ मिले। फिर प्रश्न तो यह भी उठेगा कि शिमला से राजधानी को उठाकर सुंदरनगर या जाहू पटक दें
जिस सुशासन की तफतीश में जनमंचों का आयोजन भी तमाशबीन बन जाए, वहां सबसे पहले प्रशासनिक सुधारों की जरूरत है। भारतीय जिलों की बात करें तो गुजरात के कच्छ जिला का क्षेत्रफल 45662 वर्ग किलोमीटर है, जबकि पूरे हिमाचल का क्षेत्रफल 55673 वर्ग किलोमीटर है। आबादी के हिसाब से जिलों की समीक्षा करें तो महाराष्ट्र के ठाने जिला में 1.11 करोड़ बाशिंदे हैं, जबकि सारा हिमाचल मात्र सत्तर लाख लोगों का समूह है। कोशिश तो यह होनी चाहिए कि हिमाचल से लोकसभा की एक अतिरिक्त सीट कबायली क्षेत्रों की नुमाइंदगी करे। लक्षदीप की संसदीय सीट को अनुसूचित जनजातीय दर्जा हासिल है, जबकि वहां मात्र 47972 मतदाता हैं। इस हिसाब से सबसे पहले गिरिपार जैसे इलाके को ट्राइबल घोषित कराते हुए प्रदेश के पांचवें संसदीय क्षेत्र में भरमौर, पांगी, लाहुल-स्पीति, किन्नौर व अन्य संभावित ट्राइबल एरिया की आबादी पर आधारित लक्षदीप से कहीं बड़ा संसदीय क्षेत्र बनाया जा सकता है। हिमाचल की राजनीतिक स्थिरता के लिए शिमला, मंडी व कांगड़ा जैसे बड़े जिलों का बड़ा योगदान है, वरना पूर्वोतर राज्यों की तरह यहां भी अस्थिरता ही रहेगी। अब तक हम हिमाचल की तमाम बोलियों से हिमाचली भाषा का कोई सूत्र ढूंढ नहीं पाए, तो इसलिए कि यहां भी क्षेत्रवाद दिखाई देता है। बहरहाल नए जिलों के गठन से पहले जिलों के पुनगर्ठन के अलावा यह सोचा जाए कि हिमाचल में क्यों न एक दर्जन निवेश केंद्र, औद्योगिक परिसर या सेटेलाइट टाउन विकसित किए जाएं। विकास और प्रगति के लिए सर्वप्रथम हर गांव, हर शहर और पूरे प्रदेश के लिए लैंड बैंक विकसित करने की अधिक जरूरत है।
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