सम्पादकीय

किसान हुए बेहाल: अब बाढ़ से जूझता बुंदेलखंड

Gulabi
13 Aug 2021 12:20 PM IST
किसान हुए बेहाल: अब बाढ़ से जूझता बुंदेलखंड
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बाढ़ से जूझता बुंदेलखंड

संजय सिंह।

सूखे और अकाल का पर्याय बन चुके बुंदेलखंड में किसानों के लिए खेती सबसे जोखिम भरा उपक्रम है। यहां के किसान लगातार सूखे और बेमौसम बारिश और अन्य आजीविका के अभाव में केवल मजबूरी में खेती करते हैं। अधिक पठारी क्षेत्रों वाले बुंदेलखंड का भूगोल ऐसा है कि वर्षा का पानी पठारों से नीचे की ओर तेजी से बहता है। इस स्थिति को समझते हुए वनों की रक्षा और तालाबों व अन्य जलस्रोतों के निर्माण पर पहले ध्यान दिया गया, पर हाल के दशकों में इसकी उपेक्षा हुई। जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार झेलते इस इलाके में जुलाई के अंत तक भीषण सूखे का संकट झेलने वाले अधिकांश गांव इन दिनों अतिवृष्टि से त्रस्त हैं।

इस वर्ष बुंदेलखंड में भारी बारिश हो रही है, पिछले साल के 372 मिलीमीटर की जगह इस साल अगस्त के दूसरे सप्ताह तक औसत 1,072 मिलीमीटर वर्षा हुई है। यह पिछले दो दशकों का कीर्तिमान है। सूखे के बाद इतनी जल्दी बाढ़ के संकट को बिगड़ते पर्यावरण, खासकर वनों के विनाश, अनियंत्रित खनन, नदियां से रेत खनन तथा परंपरागत जलस्रोतों के ह्रास से जोड़कर देखा जा सकता है। बुंदेलखंड का यह संकट नया नहीं है। अगर ध्यान से देखें, तो यह लंबे समय से प्राकृतिक पर्यावरण की उपेक्षा करके अपनाए गए विकास मॉडल की वजह से उत्पन्न दीर्घकालीन जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। इसके लिए किए जाने वाले तात्कालिक उपाय नाकाफी हैं।
उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में वृक्षारोपण व तालाब खोदने को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर जमीनी स्तर पर कथनी और करनी में बहुत फर्क है। जालौन क्षेत्र में 400 बंधिया बनाई गई थीं। इनमें से आधी से ज्यादा तबाह हैं। ललितपुर जिले में जल संरक्षण के लिए तीन करोड़ रुपये से चल रहा काम निरर्थक हो चुका है। इसी इलाके में बादहा और रसिन बांध के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजा शून्य रहा।
बुंदेलखंड का जालौन जिला जो खेती की दृष्टि से सबसे उपयुक्त है, इसे बुंदेलखंड का पंजाब भी कहा जाता है। यहां पर पांच नदियां-यमुना, चंबल, सिंध, कुमारी और पहुज आकर मिलती हैं। आज यह पंचनद का पूरा इलाका बाढ़ का सामना कर रहा है। बेवक्त बारिश ऐसी तबाही मचा रही है कि दलहन-तिलहन के किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं। जिन किसानों ने कर्ज लेकर तिल, मूंगफली, उड़द, मूंग की बुआई की थी, उनका मूलधन भी डूब रहा है। इसी अगस्त माह की शुरुआत के दिनों में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में हुई भारी बारिश के कारण अपने क्षेत्रों में बाढ़ को रोकने और बढ़ते जल स्तर को नियंत्रित करने के लिए राजस्थान के कोटा स्थित बैराज के 10 गेट खोलकर 80 हजार क्यूसेक पानी की निकासी की गई।
नतीजतन चंबल नदी के जल स्तर में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण चंबल तथा इसकी सहायक नदियों-सिंध, काली सिंध एवं कूनो के निचले इलाकों में बाढ़ के हालात उत्पन्न हो गए। चंबल में आई बाढ़ ने राजस्थान के कोटा, धौलपुर तथ मध्य प्रदेश के मुरैना व भिंड आदि जिलों से होते हुए उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन को भी अपनी चपेट में ले लिया। कुठांद, महोबा तथा कालपी क्षेत्र के लगभग 60 से अधिक गांवों में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई है। बुंदेलखंड के जालौन, झांसी, बांदा, हमीरपुर एवं ग्वालियर-चंबल इलाके के अशोकनगर, गुना, शिवपुरी, श्योपुर, मुरैना, भिंड सबसे ज्यादा बाढ़ से प्रभावित हुए हैं।
इन सभी जिलों की छह लाख हेक्टेयर जमीन की खेती को नुकसान हुआ है। यही नहीं, गांव वालों को बाढ़ का अंदेशा न होने के कारण अनेक परिवार फंस गए। प्रशासन को सेना की भी सहायता लेनी पड़ी। सेना ने बाढ़ में फंसे हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला। बुंदेलखंड में अनेक वर्षों से किसानों के लिए प्रतिकूल मौसम नजर आ रहा है। क्षेत्र के अधिकांश जिलों में तिल की फसल 100 प्रतिशत, जबकि उड़द, मूंग की फसल 80 प्रतिशत से अधिक खराब हो गई है। दुखद है कि इतनी क्षति होने पर भी किसानों को बीमा राशि नहीं मिलती। बुंदेलखंड में स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल जल संरक्षण और संचयन की दीर्घकालीन योजना बनाने की जरूरत है।
(- लेखक जल जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं।)
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