सम्पादकीय

चेहरों के बदलते मुखौटे

Rani Sahu
23 Jun 2022 4:46 PM GMT
चेहरों के बदलते मुखौटे
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बदलते हुए समाज विज्ञान की शोध में नए आंगन खुलते रहते हैं

बदलते हुए समाज विज्ञान की शोध में नए आंगन खुलते रहते हैं। नई शोध का विषय पिछले दिनों एक यह भी रहा है कि कार्टून बनाने वाले क्यों यह सच बांचते नज़र आते हैं, जब वे देश के महाभ्रष्ट लोगों और सब कुछ समेट कर अपनी जेब में डाल लेने वाले लोगों को भारी भरकम और तोंदियल बताते हैं तो जंचता है। महामारी के इस प्रकोप में मुफ्त लंगर और राशन बांटने वाले की कतारों में जो लोग अंतहीन नुक्कड़ तक खड़े नज़र आते हैं, वे तो लगता है अभी गिरे कि गिरे क्योंकि सब सींकिया बदन और फटेहाल हैं। होने भी चाहिएं। आजकल बेकारी, बीमारी और निकम्मेपन के दिनों में भिक्षा पात्र लेकर भिक्षा देहि के नारों के साथ द्वार-द्वार भटकना एक ऐसा आमफहम सत्य हो जाता है कि लगता है कि अगर इसे देश का नया घरेलू उद्योग घोषित कर दिया जाए तो अतिकथन न होगा। सरकारी स्तर पर आम जनता के इन कठिन दिनों में मुफ्तखोरी को दया धर्म कह कर दुरूह समस्याओं का एक सरल समाधान मान लिया गया है।

वैसे अभी विकट महामारी के इन दिनों में जान से पहले अपने-अपने जहान की रक्षा के लिए जो अपूर्णबंदी के एक के बाद एक चरण की घोषणा हो रही है, अभी उसका तीसरा चरण चल रहा है। चौथा तैयारी पकड़ रहा है लेकिन जनाब, राहतों की सांस फूलने लगी। समस्या तो एक भी हल होती नज़र नहीं आई, बल्कि महामारी से पहले ही बेकारी माशा अल्लाह छह प्रतिशत से ऊपर थी। अब तो बेकारों की कतार इतनी लंबी होती नज़र आ रही है कि विद्वान बताते हैं कि पिछले पैंतालिस बरस में इतनी महंगाई नहीं देखी। बात न कीजिए बढ़ती महंगाई की। वर्तमान सुशासन युग शुरू हुआ था तो घोषणा की गई थी कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी अर्थात न रहेगी महंगाई और न करेगा कोई चोर बाज़ारी, लेकिन ये कैसे दिन आए बंधु, चोर बाज़ारी तो इस देश के लोगों की स्वाभाविक वृत्ति बन गई है। अब देखो न कोरोना वायरस का संक्रमण भय फिर मौत का डंडा सिर पर बजा रहा है और यार लोग दवाओं की बात छोड़ो, उनके माकूल होने की अफवाहों पर भी चोर बाज़ारी कर रहे हैं। दस्तानों और मास्कों से मुंह ढकने को कहा गया था तो बजाय लोगों ने शर्मिन्दगी बना यह नकाब ओढ़ने के उन्हें भी बाज़ार से गायब कर दिया और लगे उसकी चोर बाज़ारी करने। कीमतों की भली पूछिये। सरकार कहती है कि महामारी के इन दिनों में आर्थिक गतिविधियां मृत प्रायः हो गईं। सरकारी खज़ाना खाली है। कर्मचारियों का वेतन लेटलतीफ हो रहा है, लेकिन ज़रूरी चीज़ों की कीमतें आतिशबाज़ी होकर आकाश की ओर उड़ रही हैं। ऐसी-ऐसी बातें होती हैं कि असल सच किसी के पल्ले नहीं पड़ता।
अब भला पूछिये मेहरबानों से कि दुनिया भर में पैट्रोलियम उत्पादों की कीमतें आकाश चूम रही हैं और अपने देश में पैट्रोल और डीज़ल की कीमतों का कनकौआ आसमान पर पांव जमाए बैठा है। पहले छलांग लगा रहा था, कहते हुए सरकारी खज़ाना भरना है। अब जब अर्थतंत्र खोलने का मौसम आया, वाहन सड़कों पर भागने लगे, तो पैट्रोलियम कम्पनियों को घाटे की बीमारी की चिंता सताने लगी। देखते ही देखते पैट्रोल और डीज़ल की कीमतें कुलांचें भरने लगीं और वाहन चालक उदास होकर सोचते हैं कि भैय्या यह कैसी गतिशीलता? हां, चुनावी मजबूरी आ गई तो उन्हीं स्थानीय करों को घटा कर वाहवाही लूटी जा सकती है। बंधु, यह काम थोड़ा छिप-छिप कर भी करना पड़ता है। अब देखो न पहले गैस का ईंधन सिलेंडर दो दामों पर मिलता था। एक थोड़ा सस्ता अनुदान सहायता प्राप्त और दूसरा सामान्य बिना सहायता के। अब पैट्रोलियम उत्पादों की घटती कीमतों का यह प्रभाव हुआ कि मिजऱ्ा नौशा भी कह उठे, 'बर्क गिरती है तो बेचारे मुसलमीनों पर' अर्थात सामान्य सिलेंडर की कीमत ही कम होकर कटौती वाले सिलेंडर के बराबर हो गई। अब चाहे अनुदान प्राप्त सिलेंडर खरीद कर मुसलमीन कहलाओ। जब कटौती है ही नहीं तो पैसा तुम्हारे खाते में जाएगा कैसे?
सुरेश सेठ

सोर्स- divyahimachal


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