सम्पादकीय

न्याय की उम्मीद

Gulabi
28 Jan 2021 4:06 AM GMT
न्याय की उम्मीद
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न्याय केवल वही नहीं है, जो सुना दिया जाए, न्याय वह है, जो स्वाभाविक ही महसूस हो।

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। न्याय केवल वही नहीं है, जो सुना दिया जाए, न्याय वह है, जो स्वाभाविक ही महसूस हो। सुप्रीम कोर्ट में भी एक विशेष मामला आया है, जिसमें न्याय की कमी महसूस होती है। दरअसल, महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने त्वचा से त्वचा स्पर्श के अभाव में एक यौन हमले को मानने से मना कर दिया है। 12 वर्षीया नाबालिग को गलत ढंग से छुआ गया था और चूंकि त्वचा से त्वचा का स्पर्श नहीं हुआ था, इसलिए पॉक्सो के तहत अपराध मानने से इनकार कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी है।

यह एक ऐसा मामला है, जिस पर विस्तार से चर्चा और सुनवाई की जरूरत है। खास यह है कि यूथ बार एसोसिएशन ने इसे लेकर याचिका दाखिल की है। क्या यह सही है कि किसी नाबालिग को छूना केवल इसलिए वैध या सही मान लिया जाएगा, क्योंकि त्वचा से त्वचा का स्पर्श नहीं हुआ है? पूरे वस्त्र में क्या किसी का शोषण नहीं किया जा सकता?

क्या किसी को कपड़े के ऊपर से छूना पॉक्सो के तहत यौन हमले की श्रेणी में नहीं आता? महाराष्ट्र हाईकोर्ट के फैसले से ऐसे बहुत से संवेदनशील सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट को मानवीयता के साथ खोजना होगा। महाराष्ट्र उच्च न्यायालय की नागपुर बेंच की एक जज ने अपने 19 जनवरी को दिए गए आदेश में कहा था कि किसी भी छेड़छाड़ की घटना को यौन शोषण की श्रेणी में रखने के लिए घटना में यौन इरादे से किया गया त्वचा से त्वचा स्पर्श होना चाहिए। लगे हाथ उन्होंने यह भी कह दिया है कि नाबालिग को टटोलना यौन शोषण की श्रेणी में नहीं आएगा।

यह जान लेना जरूरी है कि एक सत्र न्यायालय ने 39 साल के व्यक्ति को 12 साल की बच्ची का यौन शोषण करने के अपराध में तीन साल की सजा सुनाई थी, पर उच्च न्यायालय ने सजा में संशोधन करते हुए कह दिया कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता। भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला का शील भंग करना अपराध है।

धारा 354 के तहत जहां न्यूनतम सजा एक साल की कैद है, वहीं पॉक्सो कानून के तहत यौन हमले की न्यूनतम सजा तीन साल की कैद है। इस पूरे मामले को सभ्यता, मानवता और ममता के चरम पर पहुंचकर देखना चाहिए। अदालतें लोगों की उम्मीद हैं। केवल बालिगों ही नहीं, नाबालिगों के लिए भी अदालतों को विशेष रूप से संवेदनशील रहने की जरूरत है। यौन शोषण के मामले में दी गई थोड़ी भी रियायत समाज को शर्मसार करने की दिशा में ले जाएगी। जरूरी है कि हमारे लोकतंत्र के स्तंभ यौन शोषण के बारे में किसी भी तरह की उदारता या विचार को शरण न दें।

हमारी सभ्य परंपरा में भाव हिंसा को भी अपराध माना गया है, मतलब किसी को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोचने की भी मनाही है। आज आधुनिक समय में हम भाव हिंसा रोकने की वकालत भले नहीं कर सकते, लेकिन शारीरिक हिंसा के तमाम स्वरूपों पर ताले तो अवश्य ही लगा सकते हैं।

इस मामले में अदालतों की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। देश देख रहा है। सुप्रीम कोर्ट को अब एक ऐसा आदर्श फैसला सुनाना चाहिए, ताकि सबको महसूस हो कि न्याय हुआ। सही और सच्चा न्याय होगा, तभी हमारा और हमारे समाज का भविष्य सुरक्षित होगा।


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