सम्पादकीय

वंशवाद की निंदा तो सभी करते हैं पर कोई दल छोड़ता क्यों नहीं है

Shiddhant Shriwas
10 Oct 2021 8:35 AM GMT
वंशवाद की निंदा तो सभी करते हैं पर कोई दल छोड़ता क्यों नहीं है
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दरअसल राजनीति है तो उस पर क़ब्ज़ा कर लेने वाले राजनेताओं के दांव-पेच भी रहेंगे ही. वे कभी नहीं चाहेंगे कि जिस राजनीतिक दल और जिस कुर्सी के लिए वे इतनी जद्दोज़हद कर रहे हैं,

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। आज से लगभग पांच दशक पहले एक फिल्म आई थी- सगीना महतो! उसमें एक गाना था- "भोले-भाले ललुआ खाए जा रोटी बासी. बड़ा होकर बनेगा साहेब का चपरासी!" इस गीत में गरीब बच्चे की नियति यही बताई गई है, कि बड़ा होकर वह भी बाप की तरह कोई मजदूर या चपरासी बनेगा. यह एक विद्रूप था, व्यंग्य था व्यवस्था पर. एक तरह से बताया जा रहा था कि भले ही हम लोकतंत्र में जी रहे हों, लेकिन संसाधनों पर कब्ज़ा एक विशेष वर्ग ने ही कर रखा है. यह विशेष वर्ग है उन राजनीतिकों का, जिन्होंने सत्ता के ऊपर वंशवाद ऐसा थोप दिया है, जिसके चलते आम आदमी के विकास के सारे रास्ते बंद हैं. अब देखिए, इस वंशवाद की निंदा तो सब करते हैं, लेकिन कोई भी पार्टी, राजनीतिक दल, संगठन और अफसरों की जमात इससे अछूती नहीं है. सब अपने बेटों को अपनी जगह देखना चाहते हैं, फिर उसके लिए चाहे कितनी तिकड़में करनी पड़ें. आज़ादी की लड़ाई के दौरान के वे त्यागी, विरागी और तपे हुए नेता अब नहीं रहे. अब हर छुटभैया नेता अपने ही परिवार से चिराग उठाता है.

कांग्रेस में जी-23 का हश्र!
जब भी हम राजनीति में वंशवाद की चर्चा करते हैं, सबसे पहले अंगुली एक परिवार पर उठाई जाती है. ज़ाहिर है, वह इशारा नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गांधी की तरफ होता है. प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के कुछ ही वर्षों बाद कांग्रेस के अन्दर गुटबाजी इस क़दर पनपी कि उनकी एकमात्र पुत्री इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बन गईं. उनके बाद उनके पुत्र राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभाली और उनकी मृत्यु को 28 साल गुजर चुके हैं, लेकिन उनका परिवार बड़ी कोशिशों के बाद भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुँच पा रहा है, हालांकि कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता राजीव गांधी के निधन के छह साल के भीतर ही उनकी पत्नी सोनिया गांधी को मिल गई थी, और फिर उनके बेटे राहुल गांधी के पास गई. जब 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई तो राहुल गांधी इस्तीफ़ा दे कर अलग हो गए तथा अध्यक्षी पुनः सोनिया गांधी के पास चली गई. अब कांग्रेस के अंदर नेहरू-गांधी परिवार की घटती लोकप्रियता देख कर कुछ पुराने नेताओं- ग़ुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा आदि ने नेतृत्त्व परिवर्तन की बात कही, इसे जी-23 समूह कहा गया. लेकिन फ़िलहाल यह समूह खुद अलग-थलग पड़ा है. आजकल परिवार के चेहरे को झाड़-पोंछ कर स्थापित करने के काम में वामपंथी बुद्धिजीवी लग गए हैं. इस तरह कहा जा सकता है, कि कांग्रेस पार्टी नेहरू-गांधी परिवार की जायदाद है, तो गलत नहीं होगा. लेकिन ऐसा अकेले कांग्रेस पार्टी में ही नहीं है, बल्कि वे सभी राजनीतिक पार्टियां, जो शुचिता, बराबरी और समरसता की बात करती थीं, उनके अन्दर का हाल भी यही है.
समाजवादी बच्चे
समाजवाद, बराबरी और पिछड़ों के उत्थान को आधार बनाकर बने राजनीतिक दलों का हाल तो यह है, कि उनके यहां परिवार के ही लोगों को चुनाव में टिकट मिलता है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल इसके नमूने हैं, तो हरियाणा में चौधरी देवीलाल की चौथी पीढ़ी राजनीति में है. पंजाब में अकाली दल में प्रमुख पद बादल परिवार को ही मिलते हैं. इसी तरह बिहार में लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल है. महाराष्ट्र में शिव सेना है, कर्नाटक में जनता दल (एस) है और तमिलनाडु में डीएमके है. आंध्र, तेलंगाना, ओडिशा और बंगाल में भी क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं. देर-सबेर उनके यहाँ भी वंशवाद को ही प्रमुखता मिलेगी. लेकिन राष्ट्रीय दल भारतीय जनता पार्टी भी अब उससे अछूती नहीं रही. उनके यहां भी बेटा-बेटी-बहू ही राजनीति में हावी हैं. हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा के बड़े नेता प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर उन्हीं के समय उभरे. उत्तराखंड में भी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अब भाजपा में हैं. इनके बेटे साकेत बहुगुणा भी राजनीति में सक्रिय हैं. इनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी अब बीजेपी में हैं, जबकि कुछ वक़्त पहले वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस की मुखिया थीं. इनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहे हैं.
ऊपर से लड़ाई अंदर से मदद
ये राजनीतिक लोग वंश-बेलि को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी छोड़ने में तनिक भी कोताही नहीं करते. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे भुवनचन्द्र खंडूरी के बेटे को को जब भाजपा ने टिकट नहीं दिया, तो वे पार्टी छोड़ कर कांग्रेस में चले गए. परिवारवाद का आलम सभी जगह बराबर है. प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीचंद मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले तो महाराष्ट्र में झंडा गाड़े हैं. मध्य प्रदेश की छिन्दवाड़ा सीट से मुख्यमंत्री कमलनाथ पिछले चार दशक से काबिज़ हैं. 2018 दिसम्बर में जब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 2019 की लोकसभा का चुनाव लड़ नहीं सकते थे, तो अपने बेटे नकुल नाथ को वहां से लड़वा दिया. इसी तरह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने बेटे वैभव गहलोत को जोधपुर से लोकसभा का टिकट दिलवाया हुआ था. एक तरह से हर दल में परिवारवाद हावी है. दिलचस्प तथ्य तो यह है, कि जो राजनेता परिवारवाद या वंशवाद पर हमला करते हैं, वे भी परोक्षतः एक-दूसरे के परिवार की रक्षा भी करते हैं. इसका सबसे बेहतरीन नमूना 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में देखने को मिला था, जहां कांग्रेस ने उन सभी सीटों पर लड़ने से मना कर दिया था, जहां से मुलायम सिंह यादव अथवा उनके परिवारीजन थे. बदले में समाजवादी पार्टी ने भी अमेठी और रायबरेली से प्रत्याशी नहीं उतारे. और तो और भाजपा ने भी मैनपुरी, आज़मगढ़ और कन्नौज से कमजोर प्रत्याशी उतारे थे. क्योंकि यहां से क्रमशः मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे और बहू चुनाव लड़ रहे हैं. यह तो संयोग था कि कन्नौज से मुलायम सिंह की बहू डिम्पल यादव चुनाव हार गईं और बीजेपी के सुब्रत पाठक चुनाव जीत गए तो फिर किस मुंह से वंशवाद पर हमला किया जा रहा है?
भरोसे की कमी
दरअसल राजनीति है, तो उस पर क़ब्ज़ा कर लेने वाले राजनेताओं के दांव-पेंच भी रहेंगे ही. वे कभी नहीं चाहेंगे, कि जिस राजनीतिक दल और जिस कुर्सी के लिए वे इतनी जद्दोज़हद कर रहे हैं, उस पर कोई और आकर बैठ जाए. इसीलिए वे अपने परिवार को बढ़ावा देते हैं. चौधरी चरण सिंह अपने बेटे अजित सिंह को अमेरिका से वापस भारत लाए, और उसका राज-तिलक किया. जबकि अजित सिंह वहां कम्प्यूटर इंजीनियर थे, और वे कतई भारत लौटने के इच्छुक नहीं थे. लेकिन जब आ ही गए, तो उन्हें भी राजनीति ऐसी पसंद आई कि उन्होंने भी अपने पुत्र जयंत चौधरी को राजनीति की ही वसीयत सौंपी. जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला का परिवार और मुफ़्ती परिवार का वंशवाद तो इस क़दर बढ़ा कि पिता-पुत्र और बाप-बेटी ही कई बार एक-दूसरे के आड़े आए. सच तो यह है कि हम भले ही खुद को लोकतान्त्रिक और समता एवं सबको हक देने का पैरोकार बताएं, लेकिन हमारे भीतर एक स्वार्थी मनुष्य बैठा होता है, जो हर सार्वजनिक संसाधन को अपनी बपौती मानता है. शायद इसीलिए हम एक राजा की तरह व्यवहार करते हैं, और अपनी राजनीति भी अपने बेटों को सौंपना चाहते हैं, क्योंकि हम किसी अन्य पर भरोसा नहीं करते. इस सन्दर्भ में हरियाणा में मास्टर हुकुम सिंह, बिहार में जीतन राम मांझी के उदाहरण देखे जा सकते हैं. साथ ही लालू यादव द्वारा अपनी पत्नी का राजतिलक भी. तब शायद इस मानसिकता को ज्यादा बेहतर तरीके से परखा जा सकता है.
हरियाणा के हुकुम सिंह
यह किस्सा 1990 का है. केंद्र में जनता दल की सरकार बनी, तब हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल उप प्रधानमंत्री बनाए गए. हरियाणा छोड़ने पर उन्होंने प्रदेश की कुर्सी अपने बेटे ओमप्रकाश चौटाला को सौंपी. लेकिन चौटाला तब विधायक नहीं थे, इसलिए छह महीने के भीतर ही उनका विधायक बनना अनिवार्य था. उस समय रोहतक जिले की महम अकेली ऐसी सीट थी, जिससे तीन बार लगातार चौधरी देवीलाल विधायक चुने गए थे, इसलिए ओमप्रकाश चौटाला ने यहीं से लड़ने का इरादा किया. परंतु यहां से उनके खिलाफ आनंदसिंह दांगी ने भी परचा दाखिल कर दिया, जो उस वक़्त तक हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष थे, और चौधरी देवी लाल के करीबी भी. बाद में ओमप्रकाश चौटाला से उनकी नहीं पटी. उन्होंने कर्मचारी चयन आयोग से इस्तीफ़ा दे दिया और महम से स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर खड़े हो गए. उधर कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दे दिया. जिस वज़ह से देवीलाल परिवार की यह सीट जाती नज़र आने लगी. 27 फ़रवरी 1990 को मतदान था. कहते हैं, ओमप्रकाश चौटाला ने खूब रिगिंग कराई, तत्कालीन चुनाव आयोग ने आठ मतदान केन्द्रों पर अगले रोज़ फिर से वोटिंग कराई. खूब हिंसा हुई, और एक पुलिस कर्मी की मृत्यु हुई, चुनाव चौटाला हार गए. तब देवी लाल ने वहां मास्टर हुकुम सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया. जो चौटाला के कठपुतली मुख्यमंत्री कहे जाते थे. करीब डेढ़ साल हुकुम सिंह मुख्यमंत्री रहे. लेकिन जब वे मुख्यमंत्री पद से हटे, तब उन्होंने देवीलाल परिवार से बगावत कर दी. इससे राजनेताओं को लगा कि चाहे कुछ हो, मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने ही परिवार को सौंपनी चाहिए.
बिहार के मांझी
जीतनराम मांझी बिहार में नीतीश कुमार के करीबी और भरोसेमंद थे. वे काफी गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे. इसलिए बेहद विनम्र और सौम्य थे. 2014 में चूंकि नीतीश कुमार की जदयू को जब मात्र दो सीटें मिलीं, तो आहत होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफ़ा दे दिया, हालांकि विधायक दल उनके साथ था. लेकिन उन्होंने अपने भरोसेमंद मंत्री जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी. उनको भरोसा था, कि वे जिस दिन कहेंगे, जीतन राम मांझी तत्काल उनको कुर्सी सौंप देंगे. लेकिन राजनीति बड़ी विचित्र चीज़ है. कुर्सी की लत लग जाने पर कोई भी उसे यूं ही नहीं गंवाता. दस महीने बाद 2015 में जब नीतीश पर उनकी पार्टी के विधायकों का दबाव पड़ा कि वे मांझी को हटा कर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं, तो जीतन राम मांझी ने मना कर दिया. यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष शरद यादव को वे आंखें दिखाने लगे. तब जदयू को उन्हें हटाने के लिए खूब उलटे आसन करने पड़े. ऐसी कई वज़हें हैं, जिस वज़ह से कुर्सी पर बैठा नेता सदैव अपने ही परिवार को यह कुर्सी देना चाहता है. इस भय से रीजनल पार्टियां ही नहीं राष्ट्रीय दल भी भयभीत रहते हैं. उनको लगता है किसी को भी सत्ता सौंपी तो मौका आने पर वह अपने आका के लिए कुर्सी फ़ौरन छोड़ ही देगा, इसकी गारंटी नहीं.
लालू की राबड़ी!
1997 में जब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव चारा-घोटाले में दोषी पाए गए, और उन्हें जेल जाना पड़ा, तब उन्होंने अपनी कुर्सी किसी और को सौंपने की बजाय अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंपी. तब तक राबड़ी देवी को राजनीति का 'क' 'ख' 'ग' भी नहीं पता था. वे मात्र आठवीं पास थीं, और लालू यादव के नौ बच्चों की मां थीं. बस यही उनकी पहचान थी. चूंकि उस समय लालू के बेटे बहुत कम उम्र के थे, इसलिए पत्नी का राजतिलक करना ही उन्हें बेहतर प्रतीत हुआ. और उसके बाद राबड़ी देवी तीन बार लगातार मुख्यमंत्री ही नहीं रहीं बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ भी साबित हुईं. भले इसे लालू यादव का परिवारवाद कहा जाए, लेकिन उन्होंने इस तरह अपनी कुर्सी अपने परिवार के लिए सुरक्षित कर ली. जब उन्होंने पहली बार राबड़ी को मुख्यमंत्री का पद सौंपा, तभी ऐलान कर दिया था, कि आखिर हर व्यक्ति अपना व्यवसाय अपने परिवार को ही सौंपता है, इसलिए मैं भी वही कर रहा हूं. लालू प्रसाद के इस कृत्य से यह तय हो गया था, कि बिहार में अब लालू परिवार का ही शासन चलेगा, और वही हुआ. क्योंकि उन्होंने बिहार में जातीय समीकरण साध लेने की वह प्रमेय रखी थी, जिसे लालू के अलावा और कोई हल नहीं कर सकता था. एक तरह से राजनीति में परिवारवाद का यह सबसे घिनौना खेल था, किंतु लालू यादव अपना एम-वाई समीकरण साधने में कामयाब रहे. यह अलग बात है, कि उनके अपने ही घर में इस समय कलह मची है.


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