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अशांति का पतझड़
पूरे यूरोप में, खासकर फ्रांस में, आर्थिक चिंताएं एक बड़े जन-आंदोलन में बदल रही हैं, जो तेजी से नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। फ्रांस दशकों में देखे गए सबसे व्यापक सामाजिक असंतोष का केंद्र बन गया है। सितंबर के आखिर में पेरिस क्षेत्र में हाई स्कूल के छात्रों द्वारा खराब बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की कमी को लेकर किए गए स्थानीय विरोध-प्रदर्शन जल्द ही एक राष्ट्रीय संकट में तब्दील हो गए। बढ़ती महंगाई, गिरती सार्वजनिक सेवाओं और भारी बेरोजगारी को लेकर जनता का गुस्सा एक ऐसे देश में बड़े संकट का कारण बन गया है, जो पहले से ही कर्ज में डूबा है और जहां आर्थिक विकास रुका हुआ है।
यूरोप के अन्य देशों में भी बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, इटली, अल्बानिया, ग्रीस और आयरलैंड में भी अलग-अलग स्तरों पर अशांति देखी जा रही है। यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक, फ्रांस इस समय मानो जल रहा है; हिंसक प्रदर्शनकारी देश के इतिहास की सबसे भीषण तोड़फोड़ और हिंसा कर रहे हैं। आर्थिक ठहराव और जन-विरोध की पुरानी परंपरा के बीच, यहां हिंसा और लूटपाट की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हिंसक समूहों ने सरकारी इमारतों को निशाना बनाया, लग्जरी दुकानों और सुपरमार्केट में लूटपाट की, और पुलिस की गाड़ियों तथा अधिकारियों पर हमले किए।
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और सरकारी खर्च को लेकर हो रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान, एप्पल, लुई वुइटन, हर्मेस और रोलेक्स जैसे लग्जरी ब्रांडों के स्टोर भी लूटपाट का शिकार हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियां जला दीं, इमारतों में तोड़फोड़ की और दंगा-रोधी पुलिस से भिड़ गए, जिससे कई शहरों में भारी अव्यवस्था फैल गई है। पेरिस में, नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों और रेस्तरां में तोड़फोड़ की, जबकि बैरिकेड्स जलाने और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों ने अशांति को और बढ़ा दिया है।
बंटी हुई संसद और आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले बढ़ते दबाव के बीच, ये विरोध-प्रदर्शन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के प्रशासन को चुनौती देने का एक जरिया भी बन गए हैं। हिंसा के इस स्तर ने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं और पर्यवेक्षकों को हैरान कर दिया है। अगले राष्ट्रपति चुनाव में अभी छह महीने का समय बाकी है और देश 'कट्टर दक्षिणपंथी' (far-right) और 'कट्टर वामपंथी' (far-left) गुटों में बुरी तरह बंटा हुआ है, जिससे यह डर बना हुआ है कि ये विरोध-प्रदर्शन और हिंसा फिर से भड़क सकती है। अप्रैल में होने वाले चुनावों को लेकर देश में अभी से चुनावी माहौल बन गया है, जिसमें कट्टर दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन पोल (सर्वेक्षण) में आगे चल रही हैं। उन्होंने खुद को कानून-व्यवस्था की सख्त समर्थक उम्मीदवार के रूप में पेश किया है, जबकि वे इस अफरा-तफरी के लिए वामपंथियों को जिम्मेदार ठहरा रही हैं।
प्रस्तावित बजट कटौती और टैक्स उपायों के विरोध में लेबर यूनियनों ने 5 नवंबर को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। यह सत्ताधारी सरकार के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा है। हालांकि इटली, स्पेन, पुर्तगाल और अल्बानिया में इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं, लेकिन हर जगह इस अशांति की मुख्य वजह ईंधन और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें हैं। आने वाले महीनों में होने वाले जोरदार चुनावी दौर ने आग में घी डालने का काम किया है। स्पेन, फ्रांस, इटली, पोलैंड और ग्रीस में ऐसे चुनाव होने वाले हैं, जिनमें बहुत कुछ दांव पर लगा है। ये चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब 'कट्टर दक्षिणपंथी' और 'प्रवासियों के विरोधी' आंदोलनों का प्रभाव बढ़ रहा है। अगर फ्रांस जल्द ही इस अशांति को नहीं रोक पाता है, तो इस अस्थिरता के सीमाओं के पार फैलने का खतरा है।
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