सम्पादकीय

आंदोलन की समाप्ति…

Gulabi
11 Dec 2021 4:01 AM GMT
आंदोलन की समाप्ति…
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आखिर 378 दिनों तक चले किसान आंदोलन की समाप्ति हो गई। किसान जश्न मना रहे हैं तो सरकार सब कुछ हार चुकी है
आखिर 378 दिनों तक चले किसान आंदोलन की समाप्ति हो गई। किसान जश्न मना रहे हैं तो सरकार सब कुछ हार चुकी है, बेशक गोदी मीडिया इसे प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक साबित करने की नाकाम कोशिश में लगा है और गृहमंत्री की रणनीति के गुणगान भी करने में जुट गया है। इस सबके बावजूद किसान आंदोलन ने भाजपा की मोदी सरकार की न केवल लोकप्रियता कम कर दी, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका असर देखने को मिलेगा। क्या इस लंबे आंदोलन के दौरान जो सात सौ से ऊपर कुर्बानियां दी गईं, किसान उन्हें इतनी आसानी से भूल जाएंगे? बिल्कुल नहीं। जश्न के बीच भी किसानों की आंखें उन लोगों को याद कर नम हैं और एक आंख में खुशी तो दूसरी आंख में आंसू दिख रहे हैं। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री के अहंकार को तोड़ा है। जैसे कभी अंग्रेजी राज के लिए कहा जाता था कि इसका सूरज कभी और कहीं नहीं ढलता, वैसे ही मोदी भक्त सोचते थे कि मोदी है तो सब कुछ मुमकिन है। पर अब सबके सामने परिणाम आ गया है कि सब कुछ मुमकिन नहीं होता। कुछ संघर्ष, कुछ एकजुटता और कुछ नेतृत्व भी अपना करिश्मा दिखाता है और दिखाया। क्या-क्या इल्जाम नहीं लगाए किसानों पर, कभी आतंकवादी तो कभी नक्सलवाद तो कभी कुछ तो कभी कुछ और क्या क्या नहीं कहा? फिर केस चलाए, लाठीचार्ज किए, कीलें ठुकवाईं, आंसू गैस छोड़ी और अन्नदाता का जितना अपमान किया जा सकता था किया गया।
इन्हें शराबी, निकम्मे और बेरोजगार तक कहा गया। वहीं जिसे संसद की कैंटीन में अन्नदाता लिखकर सम्मान दिया था, उसी अन्नदाता को संघर्ष के लिए मजबूर किया गया। जब संघर्ष की काली छाया विधानसभा चुनावों पर पडऩे लगी तब किसानों को मनाने के लिए उसी तरह कृषि कानून वापस ले लिए, जिस तरह चुपचाप बिना किसी विचार या बहस के लागू किए गए थे और चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बाहर निकाल दिया गया था। अब उसी अन्नदाता ने बताया कि उसकी उपेक्षा करना कितना भारी और नुकसानदेह हो सकता है। कुल मिलाकर किसान जीते और सरकार हार गई।
-कमलेश भारतीय, साहित्यकार
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