सम्पादकीय

चुनाव काल और बजट

Subhi
3 Feb 2022 3:05 AM GMT
चुनाव काल और बजट
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संसद में पेश किये गये वर्ष 2022-23 के वार्षिक बजट की जनमूलक समीक्षा करने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि बहुत जल्दी ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है

आदित्य चोपड़ा: संसद में पेश किये गये वर्ष 2022-23 के वार्षिक बजट की जनमूलक समीक्षा करने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि बहुत जल्दी ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए सत्ताधारी भाजपा अपने पक्ष में प्रयोग कर सके। यह सभी को मालूम है कि यह बजट कोरोना काल में अर्थव्यवस्था पर पड़े दुष्प्रभावों को मद्देनजर रखते हुए बनाया गया है अतः सरकार का पहला कर्त्तव्य बनता था कि वह लोक लुभावन प्रयासों के बजाय लोक मूलक तत्वों को वरीयता दे और इस प्रकार दे जिससे चहुंओर आर्थिक मजबूती का माहौल बने। एक मायने में यह बहुत अच्छा है कि सरकार ने राजनीतिक हानि-लाभ को दरकिनार करते हुए मूल आर्थिक अवयवों के बारे में अपनी सोच प्रकट की है। इस सन्दर्भ में यह ध्यान रखना पडे़गा कि भारत वैश्विक स्तर पर आर्थिक मानकों के किस स्तर पर खड़ा हुआ है। संरक्षणात्मक आर्थिक उपायों का दौर समाप्त हो चुका है और भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व की चुनी हुई छह अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना चुका है। इनमें भी भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तीव्र गति से विकास करती अर्थव्यवस्था है। कोरोना काल में भारत की विकास वृद्धि दर नकारात्मक तक मुड़ गई थी मगर इसमें बहुत जल्दी ही उठान भी आना शुरू हुआ जो इसकी अन्तर्निहित आर्थिक शक्ति का परिचायक कहा जा सकता है। यह कार्य भारत के जुझारू लोगों के बूते पर ही संभव हो सका क्योंकि कोरोना के कारण आर्थिक स्रोतों का सतत् प्रवाह अवरुद्ध हो गया था जिसकी वजह से आम आदमी की व्यक्तिगत आमदनी से लेकर उसके रोजगार पर उल्टा प्रभाव पड़ा था परन्तु इसके बावजूद कोरोना लाॅकडाऊन और व्यापारिक व्यवधानों के बावजूद जिस प्रकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटाने में इसी आम आदमी ने अपने दृढ़ संकल्प का परिचय दिया उससे समूचे भारत में नव ऊर्जा का संचार हुआ और सरकार को भी हिम्मत मिली जिसकी वजह से सरकार ने अर्थव्यवस्था को सजीव करने के लिए कई प्रकार के आर्थिक पैकेजों की घोषणाएं भी कीं। बेशक इन पैकेजों की कटु आलोचनाएं भी हुईं और इन्हें कोरोना संकट काल का मुकाबला करने के लिए अपर्याप्त भी बताया गया मगर इसके बावजूद भारत के लोगों ने अपने श्रम व लगन से संकट पर पार पाने में एक हद तक सफलता प्राप्त की परन्तु भारत के लोगों की इस संघर्षशीलता और सहनशीलता का संज्ञान हमें वर्तमान बजट के विविध प्रावधानों के तहत देखना चाहिए। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आम भारतीयों की इस संघर्षशील प्रवृत्ति से प्रेरित होकर ही सरकार ने 22 लाख करोड़ रुपए की सकल राजस्व प्राप्तियों के विरुद्ध 39 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक खर्च करने का बजट पेश किया है। जाहिर है कि 17 लाख करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि की भरपाई करने के लिए सरकार को अन्य स्रोतों से इन्तजाम करने पड़ेंगे। ये स्रोत क्या हो सकते हैं ? एक तो सरकार के पास सबसे सरल उपाय है कि वह सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेश करे और दूसरा यह है कि वह बाजार से ऋण उठाये। वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण विनिवेश के मुद्दे पर पूरी तरह चुप रहीं जबकि पिछले वर्ष के बजट में वह इस मुद्दे पर काफी मुखर थीं। इसकी असल वजह यह मानी जा सकती है कि भारत का जनमानस सार्वजनिक सम्पत्तियों की बिक्री के विरुद्ध रहा है और सार्वजनिक कम्पनियों से उसका भावात्मक लगाव रहा है। दूसरे यह भी हकीकत है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने देश के सर्वांगीण विकास में स्वतन्त्रता के बाद महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। 1991 से आर्थिक उदारीकरण व बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का दौर शुरू होने के बावजूद भारत का जनमानस वाणिज्य क्षेत्र से सरकार की निरपेक्ष भूमिका को पूरी तरह पचाने में स्वयं को अक्षम पाता है। परोक्ष रूप से इसका कारण सरकार में भारत के लोगों का असीम विश्वास होना ही है। गौर से देखा जाये तो यह भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली में ही लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है। अतः सरकार के लिए दूसरा आय का स्रोत बाजार से ऋण उठाने का बचता है। जाहिर है कि सरकार जब स्वयं याचक बन कर बाजार में खड़ी होगी तो कर्ज पर ब्याज की दरों पर प्रभाव पड़ सकता है अर्थात ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। जाहिर है सरकार कर्ज लेने के लिए जो भी बांड आदि जारी करेगी उन पर आकर्षक ब्याज दर नियत करके ही निवेशकों को लुभाया जा सकता है जिसका प्रभाव मुद्रा स्फीति पर भी पड़ना लाजिमी होगा। मगर विकास करती अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति की दर एक सीमित दायरे में बढ़ना गलत नहीं होता बल्कि स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। यह बढ़ती दायर अर्थव्यवस्था में विकास आने की वजह से आम आदमी की औसत आय वृद्धि दर के समानुपाती होती जाती है।

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