सम्पादकीय

चुनाव आयोग: भरोसे का सवाल

nidhi
6 Oct 2026 7:12 AM IST
चुनाव आयोग: भरोसे का सवाल
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चुनाव आयोग
कभी विपक्ष ने ये सवाल उठाए थे। आज, ये सवाल खुद चुनाव आयोग के अंदर से उठ रहे हैं। भारत के वोटर जवाब के हकदार हैं।
एक साल से ज़्यादा समय से, विपक्ष भारत की वोटर लिस्ट (इलेक्टोरल रोल) के बारे में मुश्किल सवाल पूछ रहा है। हमें हार न पचा पाने वाले, साज़िश की बातें करने वाले और जनता का फ़ैसला न मानने वाले राजनेता कहकर खारिज कर दिया गया। अब यह तर्क देना अचानक बहुत मुश्किल हो गया है।
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फ़ैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई। खबरों के मुताबिक, उनकी चिंताएं कई मुद्दों पर थीं - जैसे उनकी जानकारी के बिना लिए गए फ़ैसले, वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रियाओं में बदलाव, वोटरों के नाम हटाना और फिर से जोड़ना, और वोटर लिस्ट सिस्टम पर कंट्रोल का तेज़ी से सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) होना।
ये किसी राजनीतिक रैली में लगाए गए आरोप नहीं हैं। ये तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग के दो सदस्यों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां हैं। अब मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि विपक्ष EC के बारे में क्या आरोप लगा रहा है। मुद्दा यह है कि चुनाव आयुक्त खुद चुनाव आयोग के अंदर क्या कह रहे थे।
अंदर से चेतावनी की घंटी
अब जो बातें सामने आई हैं, उनमें से कुछ हर भारतीय के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए, चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो। नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म 6' में किए गए बदलावों को दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर "गैर-कानूनी और अनधिकृत" बताया था। उन्होंने वोटर लिस्ट मैनेजमेंट के सेंट्रलाइज़ेशन और ज़मीनी स्तर पर अधिकारियों के अधिकार कम होने पर भी चिंता जताई।
गोवा का मामला खास तौर पर ध्यान देने लायक है। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों ने 97 वोटरों की जांच की और उन्हें तय प्रक्रिया के तहत योग्य पाया। फिर भी, सेंट्रलाइज़्ड सिस्टम ने उन्हें शामिल करने से रोक दिया। अधिकारियों ने दखल की मांग करते हुए सात दिनों में आठ ईमेल भेजे। फ़ाइनल वोटर लिस्ट 21 फरवरी को जारी की गई।
20 सितंबर तक, वे 97 नाम लिस्ट से गायब थे। करोड़ों वोटरों की संख्या के मुकाबले 97 का आंकड़ा छोटा लग सकता है। लेकिन संवैधानिक अधिकारों की रक्षा आंकड़ों की सुविधा के हिसाब से नहीं की जाती। जिस नागरिक को गलत तरीके से वोट देने से रोका गया, उसके लिए यह नुकसान बहुत बड़ा है। गलत तरीके से एक भी नाम छूटने पर उसे ठीक किया जाना चाहिए। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं, प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियां और खुद आयोग के अंदर से मिली चेतावनियां कुछ और मांग करती हैं: एक स्पष्टीकरण। हमने जो सवाल पूछे
यही वजह है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगस्त 2025 में बेंगलुरु के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में कथित गड़बड़ियों पर अपनी प्रस्तुति के बाद से ही, उन्होंने बार-बार वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और ज़्यादा पारदर्शिता की मांग की है। चुनाव आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया और उनके सबूतों पर सवाल उठाए।
आयोग को उन आरोपों को खारिज करने का हक था। लेकिन कोई आरोप सिर्फ़ इसलिए बेकार नहीं हो जाता क्योंकि जिस संस्था पर आरोप लगा है, वह उसे नकार दे। यह तब और भी अहम हो जाता है जब बाद में मिले सबूतों से पता चले कि उसी संस्था के भीतर गंभीर चिंताएं जताई जा रही थीं।
पहले आरोप लगे। फिर उन्हें नकारा गया। अब दस्तावेज़ सामने आए हैं। किसी भी ज़िम्मेदार राजनीतिक दल को यह दावा नहीं करना चाहिए कि हर नाम का हटना धोखाधड़ी है या हर चुनावी हार में हेरफेर हुई है। लेकिन किसी संवैधानिक संस्था को यह उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि सिर्फ़ राजनीतिक मकसद बताकर सवाल खत्म हो जाएंगे।
गायब वोटर
इस मुद्दे का दायरा ऐसा है कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' प्रक्रिया के दौरान जारी वोटर लिस्ट के ड्राफ़्ट में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटा दिए गए। इनमें से कई नाम निश्चित रूप से सही वजहों से हटाए गए होंगे - जैसे मौत, दूसरी जगह बसना, एक ही नाम का कई बार होना और अन्य वाजिब कारण। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर, गलत तरीके से नाम हटाने से रोकने के उपाय और भी ज़रूरी हो जाते हैं। हालांकि, पूरे भारत में हालिया सार्वजनिक और राजनीतिक विरोध के बाद, आयोग को अपने पिछले फैसलों पर फिर से विचार करना पड़ा।
हालांकि, भारत के लोकतंत्र को नुकसान तो हो ही चुका है। हर संख्या एक नागरिक को दिखाती है। कोई नहीं कह सकता कि जिस नागरिक का नाम हटाया गया, उसने किसे वोट दिया होता। और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ना चाहिए। लोकतंत्र इस सिद्धांत पर नहीं चल सकता कि वोट देने का अधिकार छिनना तभी गंभीर मामला माना जाए जब हमें पता हो कि वह वोटर किस राजनीतिक दल का समर्थक था।
सवाल सीधा है: क्या हर योग्य नागरिक को वोटर लिस्ट में बने रहने और वोट देने का उचित मौका मिला? अगर इस जवाब को लेकर कोई अनिश्चितता है, तो चुनाव आयोग को उसे दूर करना चाहिए।
रेफरी पर भरोसा
आयोग ने हालिया खुलासों पर कहा है कि अलग-अलग राय संस्थागत फैसले लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले साल उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। उस स्पष्टीकरण पर ध्यान दिया जाना चाहिए। लेकिन इससे कुछ असहज करने वाले सवाल भी उठते हैं।
यदि इतनी गंभीर चिंताएँ दर्ज की गईं जिनमें "अवैध और अनधिकृत" जैसे शब्द शामिल थे, तो उनका समाधान कैसे किया गया? यदि आयुक्तों ने कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना लिए गए निर्णयों पर सवाल उठाए, तो बाद में किन प्रक्रियाओं का पालन किया गया? यदि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे, तो आपत्ति और सहमति के बीच क्या परिवर्तन हुआ?
भारत के संविधान ने चुनाव आयोग को प्रशासनिक अधिकार से भी अधिक मूल्यवान कुछ सौंपा है - इसने इसे भारतीय मतदाताओं के विश्वास के साथ सौंपा है।
सरकारें आएंगी और सरकारें जाएंगी. राजनीतिक दल जीतेंगे और हारेंगे। लेकिन अगर नागरिकों को संदेह होने लगे कि क्या उनका नाम मतदाता सूची में रहेगा, क्या हर वैध वोट गिना जाएगा, और क्या चुनाव कराने वाली संस्था इस बात के प्रति उदासीन है कि कौन जीतेगा, तो नुकसान किसी एक चुनाव से कहीं आगे तक बढ़ जाता है।
कोई चुनाव आयोग स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर देने से स्वतंत्र नहीं हो जाता। इसके आचरण से नागरिकों के पास अन्यथा विश्वास करने का कोई उचित कारण नहीं होना चाहिए। एक बार भरोसा खो जाने पर उसे दावे के जरिए बहाल नहीं किया जा सकता। इसे अर्जित किया जाना चाहिए: पारदर्शिता, जवाबदेही और उत्तरों के माध्यम से।
सरकारें आएंगी और सरकारें जाएंगी. राजनीतिक दल जीतेंगे और हारेंगे। लेकिन अगर नागरिकों को संदेह होने लगे कि क्या उनका नाम मतदाता सूची में रहेगा, क्या हर वैध वोट गिना जाएगा, और क्या चुनाव कराने वाली संस्था इस बात के प्रति उदासीन है कि कौन जीतेगा, तो नुकसान किसी एक चुनाव से कहीं आगे तक बढ़ जाता है।
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