सम्पादकीय

सम्पादकीय: आयुर्वेद बनाम एलोपैथ

Gulabi
30 May 2021 11:39 AM GMT
सम्पादकीय: आयुर्वेद बनाम एलोपैथ
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आयुर्वेद बनाम एलोपैथ

बाबा रामदेव एक बार फिर जबरदस्त विवादों के घेरे में आ गये हैं जो कि कम से कम बाबा के लिए नई बात नहीं है। ऐसे ही अगणित विवादों की पृष्ठभूमि में रामदेव न सिर्फ भारत के सबसे बड़े योग गुरु बने बल्कि देश के सफलतम व्यवसायी भी बने। आज उनकी कंपनी पतंजलि योगपीठ २०००० करोड़ से ऊपर पूंजी वाली कंपनी बनी है तो उसमें बाबा के योग, व्यावसायिक दिमाग के साथ विवादों का बड़ा हाथ है। फिलहाल रामदेव ने देश के ऐलोपैथिक चिकित्सकों से पंगा लिया है और ऐसा लगता है कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया है। विवाद में फंसने के अलावा रामदेव ने इस बार एक गलती भी की है कि उन्होंने चिकित्सकों की संस्था आईएमए द्वारा उनके खिलाफ दर्ज कराई एफआईआर को ये कहकर हवा में उड़ा दिया कि उन्हें किसी का बाप भी गिरफ्तार नहीं कर सकता। हो सकता है रामदेव ने ये बयान इसलिए दिया हो कि उन्हें केंद्र में सत्ता में बिराजमान दोस्तों पर भरोसा हो कि कोई विकट स्थिति होने पर वह रामदेव का साथ देगी। रामदेव को ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उनका मानना है कि २०१४ से अब तक भाजपा की केंद्र में जबरदस्त जीतों में उनका और उनके नेटवर्क का भी योगदान है। हालांकि रामदेव इसका सिला अपनी कंपनी को देश की बड़ी कंपनियों में शुमार कर लें चुके हैं। बहरहाल आईएमए के साथ एलोपैथी बनाम आयुर्वेद के विवाद में देश की कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाले रामदेव पर आईएमए ने एक और आरोप लगाया है कि वे गलत बयानी कर सरकार के एक बड़े एजेंडे टोटल वैक्सीनेशन को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं जो दुनिया के साथ भारत के हाथों में कोविड से लड़ने का एकमात्र बड़ा हथियार है।

ये आरोप इसलिए है कि बाबा ने एक बयान में कहा है कि वैक्सीनेशन के बावजूद देश में लाखों लोग मरे हैं और इनमें १०००० से अधिक चिकित्सक भी हैं जबकि आईएमए का कहना है कि जब से वैक्सीनेशन शुरु हुआ है, देश में कुल २० करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है और सिर्फ ०.०६ प्रतिशत लोग ही इनमें कोविड के कारण मारे हैं और इसके पीछे भी एकमात्र कारण कोविड ही था, दावे से नहीं कहा जा सकता। १०००० चिकित्सकों के जान गंवाने के आरोपों को चिकित्सक झुठला रहे हैं। चिकित्सकों की संस्था आईएमए का दावा है कि कोविड की दोनों लहरें मिलाकर कुल १२५० चिकित्सकों की जान गई है। रामदेव और आईएमए के साथ अब चिकित्सकों की एक और राष्ट्रीय संस्था नीमा भी उसके समर्थन में उतर आई है। ऐसा लग रहा है कि रामदेव का एलोपैथी चिकित्सा पर किया गया ये हमला उन्हें और उनकी व्यावसायिक छवि पर भारी पड़ सकता है जो उनके साथ अभी तक के विवादों में नहीं हो सका। ऐसा नहीं है कि बाबा के साथ या आयुर्वेद के साथ समर्थक नहीं है।

आयुर्वेद तो वैसे भी भारत की जड़ों में है और भारत की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है जिसे आफ द रिकार्ड एलोपैथी भी स्वीकार करती है। ऐसे में मामला आयुर्वेद बनाम एलोपैथ न होकर रामदेव बनाम अंग्रेजी चिकित्सा हो गया है। अनेक लोग ये भी मान रहे हैं कि रामदेव का आक्रामक रवैया उन्हें व्यावसायिक जगत में इतना आगे ले तो आया है लेकिन यहां से उन्हें अपने रुख में बदलाव कर लेना जरूरी है क्योंकि अब वे सिर्फ योग नहीं बेचते हैं बल्कि ब्रुश, मंजन से लेकर दालें-आटा तक बेच रहे हैं

इसलिए कई बार उनके समर्थक भी पशोपेश में पड़ जाते हैं कि उन्हें योग गुरु के रुप में माना जाए अथवा लाला के रुप में जो सिर्फ मुनाफा कमाने वाला रवैया रखता है और अन्य बातें उसके लिए गौण होती हैं। रामदेव को यह भी याद रखना चाहिए कि कानून व्यवस्था को उनसे पहले भी कई बाबाओं ने चुनौती दी है और वह भी बाबा रामदेव की तरह ही हर मामले में रसूखदार थे लेकिन आज वे जेल में हैं। उनका भी सबसे बड़ा कुसूर यही था कि उन्होंने मद में आकर स्वयं को देश से बड़ा मान लिया।

निस्संदेह रामदेव ने योग को भारत में एक नयी पहचान दी है। आश्रमों, किताबों से निकाल कर हकीकत का जामा पहनाया है। रामदेव के कारण अनेक भारतीय ही नहीं दुनिया के लोग योग और प्रकृति को जीवन शैली बना चुके हैं। ये रामदेव की उपलब्धि है लेकिन निरंतर विवादों में रहने की आदत उन्हें गर्त की ओर भी धकेल सकती है।

क्रेडिट बाय राष्ट्रीय हिंदी दैनिक तरुणमित्र

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