सम्पादकीय

धोखे और चालबाज़ी के साथ EC का कबूलनामा

nidhi
17 Oct 2026 10:39 AM IST
धोखे और चालबाज़ी के साथ EC का कबूलनामा
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EC का कबूलनामा
बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों में चुनावी प्रक्रियाओं के दौरान मची अफरा-तफरी के बाद, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा 'विशेष सारांश पुनरीक्षण' (SSR) शुरू करने की जल्दबाजी, असल में एक ऐसी चाल है जिसका मकसद देश की राजनीति का स्वरूप बदलने के बाद खुद को बचाने की कोशिश करना है। यह कदम अपने पिछले फैसलों की गैर-कानूनी प्रकृति पर उठ रहे तीखे और जायज सवालों से ध्यान भटकाने की एक हताश कोशिश है, ताकि न्यायिक और सार्वजनिक जांच से बचा जा सके। यह कोई सामान्य प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि यह इस बात को स्वीकार करने जैसा है कि संस्थागत स्तर पर भारी चूक हुई है, काम बहुत खराब तरीके से किया गया है, और असली नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर रखने जैसी गंभीर धांधली की गई है। 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) से बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, जिससे करोड़ों मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं। अब SSR का सहारा लेना, उन गहरे जख्मों को छिपाने की एक चालाक चाल है। यह व्यवस्थागत विफलता और लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करना, गहरी धांधली को दर्शाता है, जिसके पीछे कई मुख्य कारण हैं।
पहला, लंबे समय से रह रहे नागरिकों पर ही यह साबित करने का बोझ डाल देना कि वे नागरिक हैं, उनके संवैधानिक अधिकारों को नौकरशाही की ऐसी बाधाओं में बदल दिया जिन्हें पार करना लगभग असंभव था। बिना किसी ठोस, पारदर्शी और स्थानीय स्तर पर चेतावनी दिए लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा देना, कमजोर वर्गों के खिलाफ जानबूझकर की गई एक दमनकारी कार्रवाई थी। दूसरा, बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) द्वारा—जो या तो काम के बोझ तले दबे थे या फिर किसी दबाव में थे—'मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित' जैसी श्रेणियों का मनमाना और हथियार की तरह इस्तेमाल करना, संस्थागत संवेदनहीनता को दिखाता है।
तीसरा, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और हरियाणा में महत्वपूर्ण राज्य चुनावों से ठीक पहले SIR लागू करने का समय यह बताता है कि इसका मकसद मतदाता सूची को 'शुद्ध' करना नहीं, बल्कि मतदाताओं की प्रोफाइल को ही पूरी तरह से बदल देना था। इसने भ्रम पैदा किया और मतदाताओं को दबाने का काम किया, जबकि उस समय तो लोगों की भागीदारी को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की जरूरत थी। जो नागरिक विस्थापित हो गए थे, उन्हें चुनाव के ठीक पहले या तुरंत बाद, फिर से पंजीकरण कराने की कठिन प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह लोकतांत्रिक अधिकारों में जानबूझकर डाली गई रुकावट के अलावा और कुछ नहीं था।
हमें इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि यह 'सफाई' (नाम हटाने की प्रक्रिया) कितने बड़े पैमाने पर हुई है, जिससे 13 करोड़ से ज्यादा मतदाता प्रभावित हुए हैं। यह निश्चित रूप से कोई मामूली प्रशासनिक गलती नहीं थी, बल्कि लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से जानबूझकर वंचित करने की एक सोची-समझी साजिश थी। लाखों नागरिकों को 'कोलैटरल डैमेज' (अवांछित नुकसान) की तरह समझना, चुनाव आयोग के मूल संवैधानिक जनादेश के साथ विश्वासघात है। हमें बताया गया है कि चुनाव खत्म होने के काफी समय बाद भी मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं। SSR (विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण) ठीक उसी समय सामने आता है, जब जनता का आक्रोश राजनीतिक रूप से असहनीय हो गया है। ECI का इस स्थिति को संभालने के लिए SSR ढांचे का सहारा लेना, उसके नेतृत्व की विफलता का सीधा प्रमाण है—एक तरह से यह उनका खुद के ही खिलाफ किया गया गोल (self-goal) है। यह पूरी गड़बड़ी सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके करीबी सहयोगियों की नाकामी को दर्शाती है।
अब इतनी बातें सामने आ चुकी हैं जिनसे साफ पता चलता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पूरी तरह से अक्षम रहे हैं। तो फिर उन्हें अपनी कुर्सी पर क्यों बनाए रखा गया है? और क्या यह शर्मनाक खुलासा, आने वाले चुनावों को SSR से होने वाले नुकसान से बचा पाएगा?
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