सम्पादकीय

COVID को हल्के में न लें, बच्चे भी इससे सुरक्षित नहीं: बाल रोग विशेषज्ञों का कहना

Gulabi Jagat
17 April 2022 9:35 AM GMT
COVID को हल्के में न लें, बच्चे भी इससे सुरक्षित नहीं: बाल रोग विशेषज्ञों का कहना
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बाल रोग विशेषज्ञों का कहना
उन्नति गोसाईं |
बच्चों के कोरोना (Coronavirus) से संक्रमित होने की खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं. दिल्ली कोरोना ऐप के मुताबिक, राज्य ने 51 रोगियों को कोविड की वजह से संस्थागत देखभाल की आवश्यकता की सूचना दी है. इनमें 14 बच्चे शामिल हैं जो कुल पॉजिटिव मरीजों (Corona Positive Cases) का 27 प्रतिशत हैं. 12 बच्चों को कलावती सरन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में और एक-एक बच्चा इंद्रप्रस्थ अपोलो और मधुकर रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है. जिला स्वास्थ्य विभाग ने गुरुवार को कहा कि उत्तर प्रदेश के गौतम बौद्ध नगर में कोविड-19 (Covid-19) के 43 नए मामले सामने आए हैं, जिसमें 16 बच्चे शामिल हैं. पिछले एक हफ्ते में 25 प्रतिशत से अधिक नए मामले बच्चों में सामने आए हैं.
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सुनील कुमार शर्मा ने कहा, "नए मामलों में 18 साल से कम उम्र के 16 बच्चे पॉजिटिव पाए गए. पिछले एक हफ्ते में 167 नए मामले सामने आए हैं. जिनमें से 44 या 26.3 प्रतिशत बच्चों के मामले हैं." यह पहली बार नहीं है जब बच्चों में COVID के मामलों में तेजी आई है. पिछले साल जब ओमिक्रोन वेरिएंट भारत में चरम पर था तब कुछ राज्यों ने बड़ी संख्या में बच्चों के वायरस से संक्रमित होने की रिपोर्ट दी थी. जिनमें से कुछ मामले इतनें गंभीर थे की उन्हें आईसीयू में एडमिट करना पड़ा. डॉ दीपा पासी ने कहा, "हालांकि वह प्रतिशत ( आईसीयू देखभाल की आवश्यकता वाले बच्चों का) हमारी विशाल आबादी की तुलना में बहुत छोटा सा लग सकता है लेकिन यह स्थिति बहुत गंभीर है. हमें बच्चों में COVID के बढ़ते मामलों को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए." News9 के साथ बातचीत में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ दीपा पासी ने यह बात कही. पिछले स्टडी ने निष्कर्ष निकाला गया कि बच्चों में SARS CoV-2 वायरस का खतरा बहुत कम होता है और उन्हें गंभीर बीमारी नहीं होगी. हालांकि कई दूसरी बीमारियों से पीड़ित बच्चे अभी भी खतरे में हैं.
अपोलो होस्पिटल में बाल रोग विशेषज्ञ दीपा भटनागर ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि ये नहीं कहा जा सकता कि बच्चों को कोविड से खतरा नहीं है. डॉ भटनागर ने कहा,"जैसा हमने पहले देखा SARS CoV 2 वैसा नहीं है. इसलिए वायरस के बारे में और इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या हो सकते हैं इसके बारे में कुछ भी कहना गलत होगा. ग्लोबल डेटा से पता चला है कि दूसरी बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को डेल्टा और ओमिक्रॉन की लहर के दौरान तकलीफ हुई. हम भारत में चीजों को हल्के में नहीं ले सकते." साथ में उन्होंने जोड़ा कि कोमोरबिडिटी ब्रैकेट में आने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा हो सकती है.
भारत में कोमोरबिडिटी वाले बच्चों की संख्या चिंताजनक हैं
बच्चों में मधुमेह: 2015 में इंडियन जे एंडॉक्रिनोल मेटाब (Indian J Endocrinol Metab) में पब्लिश एक रिसर्च के अनुसार भारत में टाइप 1 डायबिटीज मेलिटस (T1DM) वाले लगभग 97,700 बच्चे हैं. और टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों में तेजी से वृद्धि हुई है. 2015 में पूरे भारत में हुए सर्वे के मुताबिक 66.11 प्रतिशत भारतीय बच्चों के शरीर में शुगर का असामान्य स्तर देखा गया. 2015 में पूरे भारत में हुए सर्वे के मुताबिक 66.11% भारतीय बच्चों के शरीर में शुगर का असामान्य स्तर था.
सिकल सेल डिजीज (Sickle cell disease): 2021 के डेटा के मुताबिक भारत में तीन प्रतिशत जनजातीय आबादी सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित है और अन्य 23 प्रतिशत अपने बच्चों में सिकल सेल जीन प्रसारित करते हैं .देश भर में वन क्षेत्रों में रहने वाले लगभग सभी आदिवासी समुदायों में सिकल सेल एनीमिया के मामले मौजूद हैं. सिकल सेल एनीमिया एक आनुवंशिक विकार है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता है केवल इसका इलाज किया जा सकता है.
किशोरों में उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन): 2019 में हुए एक सर्वे के मुताबिक हरियाणा, गोवा, गुजरात और मणिपुर में हर 10 में से दो स्कूली बच्चे उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) से पीड़ित थे. 2013 में एम्स द्वारा प्रकाशित एक अन्य स्टडी में पाया गया कि दिल्ली के स्कूलों में 3-4 प्रतिशत बच्चे उच्च रक्तचाप से पीड़ित थे. जो दिल से संबंधित मौतों का सबसे आम कारण है.
हरियाणा, गोवा, गुजरात और मणिपुर में हर 10 में से दो स्कूली बच्चे उच्च रक्तचाप से पीड़ित
मैलिग्नेंसीज (Malignancies): इंडियन कैंसर सोसायटी ने एक खुलासा किया है जिसके अनुसार भारत में 0 से 19 साल की उम्र के 50,000 से ज्यादा बच्चे कैंसर से पीड़ित हैं. हालांकि ज्यादातर बचपन के कैंसर का इलाज जेनेरिक दवाओं, कीमोथेरेपी और रेडिएशन से किया जा सकता है लेकिन निम्न और मध्यम आय वाले देशों में केवल 15 से 45 प्रतिशत बच्चे ही इस बीमारी से ठीक हो पाते हैं. दूसरी ओर विकसित देशों में कैंसर से पीड़ित 80 प्रतिशत से अधिक बच्चे ठीक हो जाते हैं. कैंसर से लड़ने के लिए बच्चे को प्रॉपर न्यूट्रिशन और हेल्दी डाइट की जरूरत होती है. उन्हें रेडिएशन और कीमोथेरेपी के दर्द को सहने के लिए शारीरिक रूप से मजबूत होना पड़ता है. दुर्भाग्य से कैंसर से पीड़ित लगभग 40 प्रतिशत भारतीय बच्चे कुपोषित हैं. इसके अलावा कुपोषित बच्चों को इंफेक्शन, साइड इफेक्ट, कॉम्पलीकेशन और ट्रीटमेंट में देरी का ज्यादा खतरा होता है.
इंडियन कैंसर सोसायटी ने खुलासा किया है कि भारत में 0 से 19 साल की उम्र के 50,000 से अधिक बच्चे कैंसर से पीड़ित हैं. इन नंबरों के आधार पर भारत में बाल रोग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि युवा आबादी में COVID को हल्के में नहीं लिया जा सकता है और धीमी रफ्तार के साथ शुरू हुए टीकाकरण अभियान (वैक्सीनेशन ड्राइव) को तेज करने की जरूरत है.
बच्चों के लिए COVID-19 वैक्सीनेशन की स्थिति
देश ने 3 जनवरी से 15-18 साल और 16 मार्च से 12-14 साल की उम्र के बच्चों का वैक्सीनेशन शुरू कर दिया है. CoWIN डैशबोर्ड के अनुसार 12-14 साल के 2.41 करोड़ से अधिक बच्चों को Corbevax वैक्सीन की खुराक दी गई है और 15-18 साल के बच्चों को 9.81 करोड़ से अधिक Covaxin डोज दी गई है. 15-18 साल की उम्र के 40 प्रतिशत से कम बच्चों या किशोरों को नोवेल कोरोनावायरस के खिलाफ पूरी तरह से टीका लगाया जा चुका है.
दस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नए सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 15-18 साल की उम्र के 40 प्रतिशत से कम बच्चों या किशोरों का खतरनाक नोवल कोरोना वायरस के खिलाफ पूरी तरह से टीकाकरण किया जा चुका है. इस आयु वर्ग में देश में अनुमानित तौर पर 7,40,57,000 किशोर हैं. आंकड़ों से पता चलता है कि 15-18 साल के आयु वर्ग में दूसरी डोज देने का औसत 54.3 प्रतिशत है. इस पर डॉ भटनागर ने कहा, "हमारे ज्यादातर बच्चों का अभी तक टीकाकरण नहीं हुआ है जिस पर अब हमारा खास ध्यान होना चाहिए."
उन्होंने कहा, "स्कूलों को वैक्सीनेशन कवरेज ड्राइव में शामिल किया जाना चाहिए. हर बच्चे के लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि उन्हें वैक्सीनेशन कराना जरूर है वरना उनकी अटेंडेंस प्रभावित होगी. अगर हम अपने बच्चों को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमें इसे युद्ध स्तर पर करने की जरूरत है. उनमें से कुछ ऐसे हैं जो दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम से भी जूझ रहे हैं और ऐसे में एक अनजान वायरस उनकी स्थिति और मुश्किल बना सकता है. जैसे हम अपने वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य के बारे में सावधान हैं वैसे ही युवा आबादी के बारे में होना होगा."
भारत निकट भविष्य में बच्चों के लिए एक और वैक्सीन रिसीव करने की तैयारी में है क्योंकि COVID-19 महामारी बनी हुई है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के CEO अदार पूनावाला के मुताबिक कंपनी वर्तमान में CoWIN ऐप में Covovax को जोड़ने के लिए सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रही है. पिछले महीने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने बड़े बच्चों के लिए वैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के CEO पूनावाला ने कहा, "कोवोवैक्स का इस्तेमाल बच्चों के लिए किया जाएगा. इसे DCGI द्वारा अप्रूव किया गया है और हम इंतजार कर रहे हैं कि भारत सरकार CoWIN ऐप पर इसे डालने की मंजूरी दे ताकि यह सभी के उपलब्ध हो सके. अगर इसे सरकारी कार्यक्रम में शामिल किया जाता है तो भी हम उसकी कीमत 225 रुपये रु. ही रखेंगे जो कीमत प्राइवेट मार्केट में है.
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