सम्पादकीय

जात न पूछे प्रेम…

Gulabi
10 Dec 2021 5:10 AM GMT
जात न पूछे प्रेम…
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लड़के का उत्तर सुनकर लड़की का मुंह उतर गया और बोली-‘लेकिन मेरे मम्मी है ही नहीं
पतंगवाले दिन थे। वह लड़का और लड़की बराबर वाले मकानों की छतों पर सर्दी-सर्दी वहीं बने रहते थे। मैं दो साल से उन्हें देख रहा हंू। कई बार तो धूप में पसीने से नहा जाते हैं लेकिन वे नीचे नहीं जाते। लड़का पतंग उड़ाता है। लड़की हाथ में किताब लिए उसे देखती रहती है। लड़का भी बीच-बीच में उसे देख लेता है। दोनों की नजरें चार होती हैं। दोनों हंस लेते हैं। लेकिन पिछले दो साल से मैंने उन्हें कभी बात करते नहीं देखा। दोनों ने अभी किशोरवय को पार किया है। उनके चेहरे पर अभी उम्र का भोलापन बाकी है। एक बात और है, लड़की को मैंने कई बार देखा और लगा कि वह लड़के से बात करने को आतुर है, लेकिन लड़का अत्यंत शर्मीला है। उसे लड़की को देखना ही भला लगता है। जब वह नीचे चली जाती है तो उसका मुंह उतर जाता है। वह भी पतंग उतार कर अपनी चर्खी-पतंग लेकर कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद नीचे आ जाता है। यह तो तय है कि लड़का उसे असीम रूप से चाहने लगा है। लड़की भी अपनी आंखों से उसे ओझल नहीं होने देना चाहती। इन दो सालों ने एक-दूसरे के प्रति समर्पण व प्रेम का गहरा भाव दिया है उन दोनों को। एक दिन लड़का जब पतंग उड़ा रहा था, लड़की उसके पास वाली दीवार के पास आकर बोली-'तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते? लड़का अचकचा गया। बहुत ही डर सा गया। बोला कुछ नहीं, बस शर्मिली हंसी हंसकर आकाश में उड़ती पतंग को देखने लगा। 'सुना नहीं, मैं पूछ रही हूं-तुम मुझसे बातें क्यों नहीं करते? लड़की ने फिर कहा। 'मुझे डर लगता है।'किससे? उसने हंसकर पूछा। 'तुम्हारी मम्मी से।
लड़के का उत्तर सुनकर लड़की का मुंह उतर गया और बोली-'लेकिन मेरे मम्मी है ही नहीं। मैं और पापा दोनों ही हैं। इस बार लड़के को धक्का लगा-'सॉरी, मैं तुम्हारा नाम भी नहीं जानता। मुझे पता नहीं था कि तुम्हारे मम्मी नहीं है।'मेरा नाम नेहा है। सुनो, मैं तुम्हें चाहने लगी हूं। 'और मैं भी तुम्हें। लड़का बोला। 'मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगी। 'और मैं भी नेहा। तभी लड़की के पापा ने उसे आवाज लगाई और वह उतर कर नीचे चली गई। लड़का वहीं अपनी पतंग आकाश में ताने हुए विभोर था। लड़की आई और बोली-'सुनो। लड़का उसके पास जाकर बोला-'कहो। 'वह क्या था …..। 'बोलो न, रुक क्यों गई? 'हम दूसरी जाति के हैं। 'प्रेम की कोई जाति नहीं होती नेहा। 'सच, यह तुम कह रहे हो? लड़की प्रसन्नता से बोली। तभी लड़की के पापा भी छत पर आ गए और लड़के से बोले-'तुम तो पतंग बहुत बढिय़ा उड़ाते हो, हर पेंच काट देते हो। लड़का हंसकर रह गया। वह फिर बोले-'बेटा नेहा तुम्हारी सदैव प्रशंसा करती रहती है। वह तुम्हें बहुत चाहती भी है। तभी लड़के के पिता आ गए और बोले-'अरे भाई सीधे लड़के से ही बात कर रहे हो। हम किसलिए हैं। नेहा तो एक दिन मेरी बहू बनेगी ही। लड़की का बाप मुस्कुराया और बोला-'लेकिन हम दूसरी जाति के हैं। मैं तो माथुर हूं, लेकिन नेहा की मां मुसलमान थी। 'तो क्या हुआ, इनसान तो थी। 'आप तैयार हैं? 'हां सौ फीसदी, आप तो अपनी कहो। दोनों ने ठहाका लगाया और फिर लड़के-लड़की से बोले-'जाओ जाकर पढ़ो, जब पढ़ाई पूरी कर लोगे, पैरों पर खड़े हो जाओगे तो एक हो जाओगे। दोनों नीचे आकर पढऩे लगे।
पूरन सरमा
स्वतंत्र लेखक
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