सम्पादकीय

क्या हम पोषण के विषय को समझते हैं?

Gulabi
10 Sep 2021 12:30 PM GMT
क्या हम पोषण के विषय को समझते हैं?
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अभी वर्ष 2020 में ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (पांच) के तहत 22 राज्यों में पोषण और परिवार स्वास्थ्य की स्थिति सामने आई थी

हम एक बार फिर पोषण माह मना रहे हैं. भारतीय सन्दर्भ में कहा जाए तो संभवतः हम "संकट का उत्सव" मना रहे हैं. संकट का उत्सव इसलिए क्योंकि हम समस्या के मूल कारणों को छिपाकर समस्या का निराकरण करने की कोशिश कर रहे हैं. यह अनजाने में नहीं हो रहा है. पूरी समझबूझ के साथ हो रहा है, क्योंकि समाज और राज्य का एक तबका पूरी शिद्दत के साथ यह विश्वास करता है कि संकट में अवसर (सत्ता और संपत्ति निर्माण के) होते हैं.

अभी वर्ष 2020 में ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (पांच) के तहत 22 राज्यों में पोषण और परिवार स्वास्थ्य की स्थिति सामने आई थी. जिसमें बताया गया था कि वर्ष 2015-16 से 2019-20 की अवधि में 22 राज्यों में से 13 राज्यों में बच्चों में ठिगनापन बढ़ गया है. ठिगनापन यानी स्टंटिंग की स्तर बताता है कि अभी भी देश में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच "भुखमरी और कुपोषण" का हस्तांतरण बहुत ज्यादा है. जब हम अपक्षय यानी दुबलेपन के कुपोषण पर नज़र डालते हैं, तब यह सर्वेक्षण बताता है कि 11 राज्यों में दुबलापन बढ़ गया है.
इतना ही नहीं, अति गंभीर दुबलापन (जानलेवा कुपोषण) भारत के 16 राज्यों में बढ़ गया है. महाराष्ट्र और गुजरात में तो 10 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अति गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में हैं. हम यह समझने में कहीं न कहीं तो भूल कर रहे हैं कि कुपोषण अपने आप में समस्या नहीं है. वास्तव में कुपोषण सामाजिक – आर्थिक असमानता, आजीविका के संकट, बीमारियां बढ़ाने वाली विकास नीतियों और प्राथमिकताओं, समाज के वंचित तबकों की संसाधनों तक पहुंच न होने, लैंगिक भेदभाव और उचित नीतियों के अभाव के कारण पैदा होने वाली स्थिति है!
वर्ष 2017 में अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका द लैंसेट ने वर्ष 1990 से 2017 के बीच विश्व में बीमारियों के बोझ पर एक शोध पत्र प्रकाशित किया. इस शोध में बताया गया कि वर्ष 2017 में भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 10.4 लाख बच्चों की मृत्यु हुई, जिनमें से 7.06 लाख यानी 68.2 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण था. वर्ष 1990 में भारत में पांच वर्ष से कम उम्र तक के बच्चों की कुल मौतों में से 70.4 प्रतिशत मृत्यु में कुपोषण कारण था, अभी लगभग 68% है.
यानी, हम एक सभी समाज के रूप में कुपोषण के कारण होने वाली मौतों को रोक पाने में असफल रहे हैं. इसके दूसरी तरफ भारत की राज्य विधान सभाओं से लेकर भारत की संसद हमारी सरकारें लगतार यही कहती हैं कि भारत में किसी बच्चे की कुपोषण से मृत्यु नहीं होती है. जब सरकार कुपोषण के वास्तविक संकट को स्वीकार ही नहीं करना चाहती है, तो उसका समाधान कैसे खोजेगी, इसके बारे में आप स्वयं विचार कीजिये.
स्थाई विकास लक्ष्य (2030) की स्थिति पर नीति आयोग की रिपोर्ट (एसडीजी इंडिया इंडेक्स 3.0) के मुताबिक़, भारत में 27.90 प्रतिशत जनसंख्‍या बहुआयामी गरीबी की स्थिति में रहती है. उल्लेखनीय है कि बहुआयामी गरीबी की परिभाषा में कुपोषण, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और शासकीय सेवाओं तक लोगों की पहुंच के सूचक शामिल हैं. जिस वक्त 27.90 प्रतिशत जनसंख्‍या बहुआयामी गरीबी में है, उसी वक्त 34.7 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं.
एसडीजी 2030 के मुताबिक़, भारत को ऐसे प्रयास करने हैं, जिनसे बहुआयामी गरीबी आधी (यानी 13.95 प्रतिशत) हो जाए, लेकिन इसी अवधि में ठिगनेपन को 6 प्रतिशत के स्तर पर लाना है. अगर वास्तव में बहुआयामी गरीबी का बच्चों के कुपोषण से सीधा रिश्ता है, तो यह तय है कि वर्ष 2030 तक भारत में कुपोषण में एसडीजी के लक्ष्य तक पहुंचने लायक कमी नहीं आ पाएगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि अब भी भारत की ऐसी आर्थिक नीतियां नहीं बनाई जा रही हैं, जिनका मकसद खाद्य असुरक्षा और कुपोषण में कमी लाना हो.
आर्थिक संसाधनों का अभाव
इतना ही नहीं, आजीविका की सुरक्षा और आर्थिक विकास की दर में भी कोई सीधा रिश्ता नहीं देखा जा रहा है. जिस वक्त देश की सकल घरेलू उत्पाद दर 6 या 7 प्रतिशत होती है, उसी वक्त देश में बेरोज़गारी की दर भी 6 या 7 प्रतिशत ही होती है. तत्कालीन योजना आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए बने मंत्री समूह ने भारत में कुपोषण के अन्धकार को मिटाने के लिए कुछ ठोस प्रतिबद्धताएं अपनाने की सलाह दी थी.
मंत्री समूह की रिपोर्ट में उल्लेख है कि वर्ष 2012-17 की पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्र सरकार को कम से कम 35 हज़ार करोड़ रुपये सालाना का आवंटन करना होगा. लेकिन वास्तविकता में उतना आवंटन कभी नहीं हुआ. वर्ष 2019-20 की स्थिति में भी (जबकि मंहगाई दर के मान से आवंटन 43 हज़ार करोड़ रुपये हो जाना चाहिए था) केंद्र सरकार ने एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के लिए केवल 22031 करोड़ रुपये खर्च किये.
वर्ष 2020-21 में आवंटन किया था 28557 करोड़ रुपये का, लेकिन साल के बीच में ही इसे घटाकर 20038 करोड़ रुपये कर दिया. इस वक्त चल रहे वर्ष 2021-22 में केंद्र सरकार ने आइसीडीएस के लिए 20100 करोड़ रुपये का ही आवंटन किया है. इसका मतलब है कि कुपोषण को खत्‍म करने के लिए जितने संसाधनों के निवेश की जरूरत है, उसका 50 प्रतिशत ही निवेश किया जा रहा है.
पोषण केवल एक विभाग का विषय नहीं है!
केंद्र सरकार वार्षिक बजट के साथ संभावित परिणामों (आउटकम बजट) का आंकलन करती है. सच बात तो यह है कि विभिन्न विभागों के बजट आवंटन की राशि से हमें नीति का नज़रिए पता नहीं चलता है. यह पता चलता है आउटकम बजट है. दुखद है कि अब जबकि देश में पोषण के लिए अन्तर्विभागीय समन्वय की वकालत करने वाली राष्ट्रीय पोषण रणनीति (2017) लागू है, प्रधानमन्त्री स्वयं पोषण अभियान के ध्वज वाहक हैं, वहीं अब तक के आउटकम बजट में पोषण के लक्ष्य का उल्लेख केवल महिला और बाल विकास मंत्रालय की तालिका में ही मिलता है.
दुखद बात यह है कि कृषि विभाग में पोषण का जिक्र नहीं है लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के लक्ष्यों में यह जिक्र है कि पोषण युक्त और जलवायु रोधी फसलों के बीजों की जीन एडिटिंग की जायेगी. इसका मतलब है कि पोषण सुरक्षा की नीतियों में भारत की सम्रद्ध बीज और फसल परम्परा को अनुत्पादक और गैर-लाभकारी मान लिया गया है, इसलिए बीजों/फसलों की जीन एडिटिंग पर ध्यान केन्द्रित किया गया है.
पोषण संवेदी पहल के अंतर्गत कृषि, वन उपज या प्राकृतिक संसाधनों और उद्यानिकी के क्षेत्र में पहल करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह ध्यान रखना और दोहराना भी जरूरी है कि इन तीनों क्षेत्रों या विभागों की कुपोषण से निपटने की पहल में सीधी भूमिका है. जब हम कृषि विभाग की परिणाममूलक कार्ययोजना का अध्ययन करते हैं, तब उसमें यह तो पाते हैं कि कृषि विभाग दालों, तिलहन आदि के उत्पादन में वृद्धि को परिणाम के रूप में देखता है, लेकिन उसके परिणामों में कुपोषण में कमी को कहीं नहीं देखा जाता है.
बेहतर होगा कि कृषि विभाग भी यह आंकलन करे और तय करे कि उसकी पहल से पोषण सुरक्षा के लक्ष्य का क्या रिश्ता होगा? एक महत्वपूर्ण पहल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत शुरू हुई है. यह पहल है गांवों में सामुदायिक पोषण वाटिका की स्थापना की. जिस तरह से ग्रामीण रोज़गार को स्थाई परिसंपत्तियों के निर्माण की अवधारणा से जोड़ा गया और उसका विस्तार पोषण वाटिका के जरिये पोषण सुरक्षा के लिए किया गया; यह वास्तव में व्यापक होते नज़रिए का एक संकेत है.
राशन प्रणाली को व्यापक बनाएं!
वास्तव में यदि राजनैतिक प्रतिबद्धता है, तो सरकार को तिलहन और दलहन की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से इनके वितरण की व्यवस्था बनाना चाहिए, ताकि बच्चों और महिलाओं के भोजन में वसा और प्रोटीन की कमी को दूर किया जा सके. वर्ष 2021-22 में दलहन (18.25 लाख टन) और तिलहन (15.64 लाख टन) की सरकारी खरीदी के लिए 1500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इस खरीदी का मकसद पोषण सुरक्षा नहीं, बल्कि आपातकालीन विपरीत स्थितियों में कीमतों के नियंत्रण के लिए भंडार रखना है.
जलवायु परिवर्तन और पोषण
भारत में कोशिशें हो रही हैं कि हम ऐसे बीज तैयार कर लें, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को झेल जाएं; लेकिन क्या यह नैतिक नीति होना चाहिए? हमें उन नीतियों और व्यवहारों को बदलना चाहिए, जो जलवायु परिवर्तन का कारण हैं. जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण के कारण कार्बल डाईआक्साइड का ज्यादा उत्सर्जन हो रहा है. इस अधिक उत्सर्जन के कारण चावल में 7.6%, गेहूं में 7.8%, जौ में 14.1% और आलू में 6.4% प्रोटीन की उपलब्धता में कमी आई है.
इसके कारण से भारतीयों के भोजन में प्रोटीन की कुल मात्रा में 5.3% की कमी होगी. जिसका प्रभाव 5.3 करोड़ लोगों के पोषण स्तर पर पड़ेगा. इसी तरह, कार्बल डाईआक्साइड के कारण खाद्य पदार्थों में मौजूद लौह तत्वों की मात्रा में भी कमी आ रही है. इसका मतलब है कि अब खाद्य सुरक्षा को केवल खाद्य पदार्थों की मात्रा से मापना भी सही तरीका नहीं है.
भारत में मोटापा यानी अस्तित्व का नया संकट
हम एक तरफ तो अल्पोषण सी स्थिति से जूझ रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ अब मोटापा नई चुनौती बन कर खडा हो गया है. द न्यू इंग्लैण्ड जर्नल आफ मेडिसिन के मुताबिक़, अब भारत में लगभग डेढ़ करोड़ बच्चे मोटापे के शिकार हैं और यह दुनिया में चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी संख्या है.
मोटापे की समस्या के कारण बच्चों में अवसाद, कार्यकुशलता में कमी, आत्मविश्वास में कमी के साथ साथ डायबिटीज़, हृदय रोग, हड्डियों में विकृति और मनोरोग की समस्याएं बढेंगी. इसका मतलब है कि भारत को पोषण पर केवल इसलिए ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि भारत में कुपोषण ज्यादा है, बल्कि इसलिए ध्यान देना चाहिए ताकि अगले 30 सालों में देश स्थाई बीमार नागरिकों का देश न बन जाए.
हमें यह समझना होगा कि पोषण सुरक्षा एक सतही मामूली विषय नहीं है, न ही यह ढोल मंजीरे बजा कर समाप्त की जाने वाली समस्या है. यह सभ्यता का संकट है. इसमें एक तरफ तो सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी और शोषण से जुड़े कारक शामिल हैं, तो वहीं दूसरी तरफ संसाधनों के विकेंद्रीकरण से जुड़े कारक भी शामिल हैं. इसमें स्वास्थ्य, कृषि, पानी, जंगल और जलवायु परिवर्तन का पक्ष भी बहुत गहरे तक मौजूद है. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि पोषण पर बहु-विभागीय नजरिया विकसित हो और जवाबदेहिता के साथ कार्ययोजना का क्रियान्वयन भी हो.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
सचिन कुमार जैन,निदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता
सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.
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