सम्पादकीय

बेकाबू न हो बुलडोजर

Subhi
22 April 2022 4:06 AM GMT
बेकाबू न हो बुलडोजर
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दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में अतिक्रमण हटाने के लिए उतारे गए बुलडोजरों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 15 दिनों की रोक लगा दी है।

नवभारत टाइम्स: दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में अतिक्रमण हटाने के लिए उतारे गए बुलडोजरों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 15 दिनों की रोक लगा दी है। जिस तरह से एमसीडी अधिकारियों ने आनन-फानन यह कार्रवाई शुरू करवाई और यथास्थिति बनाए रखने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद भी यह कहते हुए उसे जारी रखा कि आदेश उन तक नहीं पहुंचा है, वह हैरत में डालने वाला है। ऐसा लगता है कि कुछ अधिकारियों के मन में नियम कानून और तय संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर तनिक भी सम्मान नहीं रह गया है। किसी कानून या एजेंसी का खास मकसद से इस्तेमाल करते हुए वे किसी भी सीमा तक चले जाने में नहीं हिचकते। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का दायित्व न्यायपालिका पर है। यह समझना जरूरी है कि बुलडोजरों के विवेकहीन इस्तेमाल की इस प्रक्रिया में न केवल लोगों के घर और उनकी आजीविका के साधन उजड़ते हैं बल्कि संविधान की भी धज्जियां उड़ती हैं। घर या दुकान टूटने का नुकसान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, पूरे परिवार को भुगतना होता है। अगर उस परिवार के कुछ सदस्यों पर दंगा फैलाने का आरोप हो या वह घर या दुकान अवैध हो तो भी उसकी एक निश्चित कानूनी प्रक्रिया होती है। अपराध साबित होने से पहले किसी के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता।

ध्यान रहे, देश के अन्य शहरों की ही तरह दिल्ली में भी पॉश कॉलोनियों से लेकर स्लम तक हर तरफ अतिक्रमणों की भरमार है। ऐसे में जब कुछ म्युनिसिपल अधिकारी अवैध निर्माण या अतिक्रमण का वास्ता देते हुए जहांगीरपुरी को निशाने पर लेते हैं तो बात कुछ हजम नहीं होती। लेकिन थोड़ी देर के लिए उनकी बातों को ज्यों का त्यों स्वीकार करते हुए इस प्रकरण को बिल्कुल कानूनी नजरिए से देखें तो भी एमसीडी एक्ट के प्रावधान बड़े स्पष्ट हैं। धारा 317 के तहत गलियों से किसी तरह के निर्माण को हटाने से पहले नोटिस देना होता है। धारा 347 के तहत किसी इमारत को गिराने से पहले कम से कम 5-15 दिनों का नोटिस देना होता है। सिर्फ धारा 322 के तहत नोटिस दिए बगैर कार्रवाई की जा सकती है क्योंकि इसके तहत अस्थायी निर्माण को हटाया जाता है। दिल्ली और मध्य प्रदेश में जिनके मकान या दुकान ढहाए गए, उन्हें नोटिसों के खिलाफ अपील करने का वक्त नहीं मिला। यह प्राकृतिक न्याय की भावना के खिलाफ है। यह अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने जहांगीरपुरी मामले में एमसीडी अधिकारियों के रवैये को गंभीरता से लिया है। उनके दावों की सचाई अदालत में परखी जाएगी। लेकिन बुलडोजर को राजनीतिक संदेश देने का जरिया बनाने और उसे त्वरित न्याय के एक साधन की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए।


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