सम्पादकीय

क्या पंजाब के इलिट क्लास के प्रति मतदाताओं की नाराजगी से जीती आम आदमी पार्टी

Gulabi
13 March 2022 8:41 AM GMT
क्या पंजाब के इलिट क्लास के प्रति मतदाताओं की नाराजगी से जीती आम आदमी पार्टी
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पंजाब में 200 परिवारों की इलिट क्लास राजनीति
प्रीतम सिंह।
पंजाब में 20 फरवरी 2022 को विधानसभा चुनाव (Punjab Assembly Election) हुए. 10 मार्च 2022 को घोषित नतीजों में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) ने प्रचंड बहुमत हासिल किया, जिसे दुनियाभर में रहने वाले पंजाबी समुदाय के लोग पंजाबी शब्द 'हुन्जा फेर जीत' से बयां कर रहे हैं. हिंदी में इसका मतलब है कि सूपड़ा साफ कर दिया. दरअसल, आम आदमी पार्टी ने पंजाब विधानसभा की 117 सीटों में से 92 पर जीत हासिल की. यह लाइन जीत को बयां करने और पूरे मामले का सार समझाने के लिए काफी स्पष्ट है. वहीं, अन्य रिपोर्ट्स में इस जीत के लिए 'ऐतिहासिक', 'अभूतपूर्व' और 'राजनीतिक सुनामी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया. हालांकि, मैं इसे राजनीतिक भूचाल कहना पसंद करूंगा, जिसकी वजह से कई पुरानी जर्जर इमारतें ढह गईं.
अगर हम सिर्फ जीती गई सीटों की संख्या पर गौर करें तो यह ज्यादा नाटकीय नहीं लगता, क्योंकि 1997 में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन ने 93 सीटें जीती थीं. उस वक्त कांग्रेस घटकर सिर्फ 14 सीटों पर सिमट गई थी. हालांकि, अगर हम सीटों की संख्या से आगे बढ़कर देखते हैं तो इस जीत में पुराने राजनीतिक इलीट क्लास का विध्वंस नजर आता है, जो अद्वितीय है. ऐसा 1997 में नहीं हुआ था. पंजाब की वर्तमान राजनीति में मौजूद वे सभी बेहद चर्चित नाम प्रकाश सिंह बादल, अमरिंदर सिंह, राजिंदर कौर भट्टल, बिक्रम सिंह मजीठिया, नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा. यह वास्तव में राजनीतिक भूकंप है. पंजाब के लोगों ने यह दिखा दिया कि वे अपनी पसंद के हिसाब से चुनाव करके ताकतवर को धूल चटा सकते हैं.
पंजाब में 200 परिवारों की इलिट क्लास राजनीति
करीब 200 परिवारों के छोटे से इलिट क्लास के शासन का तख्तापलट करने के लिए यह राजनीतिक क्रांति करीब दो दशक से तीसरे विकल्प का इंतजार कर रही थी. राजनीतिक क्रांति की इस चाह के चलते पंजाब की दो रिवायती (पारंपरिक) पार्टियों कांग्रेस और अकाली-बीजेपी गठबंधन (जो किसान आंदोलन के दबाव में बिखर गया) से परे तीसरा विकल्प खोजा जाता रहा. अकाली प्रमुख प्रकाश सिंह बादल से अलग होकर उनके भतीजे मनप्रीत बादल ने पंजाब पीपुल्स पार्टी का गठन किया, जो राज्य की राजनीति में तीसरे विकल्प के लिए पहला बड़ा प्रयास था. उन्हें अच्छा रेस्पॉन्स भी मिला, लेकिन उन्होंने उस प्रोजेक्ट को मुकाम तक पहुंचाने में सहनशक्ति और धैर्य की कमी दिखाई. इस वजह से उनकी पार्टी का वजूद जल्द ही खत्म हो गया और वह कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर दोबारा पारंपरिक राजनीति से जुड़ गए.
2014 के संसदीय चुनावों में इस तीसरे विकल्प के रास्ते को काफी बढ़ावा मिला. उस वक्त आम आदमी पार्टी को पंजाब के बाहर सभी सीटों हार का सामना करना पड़ा था, जबकि पंजाब की कुल 13 लोकसभा सीटों में से वह चार सीटें जीतने में सफल रही. उस वक्त एक चिकित्सक धर्मवीर गांधी ने पटियाला की महारानी को मात दी थी, जो पुराने इलीट वर्ग के गढ़ में पहली सेंध थी. पंजाब के लोगों द्वारा आम आदमी पार्टी में दिखाए गए इस व्यापक विश्वास से तीसरे लोकतांत्रिक विकल्प के प्रतीक को उस वक्त बढ़ावा मिला, जब 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की सत्ता में आम आदमी पार्टी आती दिख रही थी. हालांकि, पंजाब यूनिट पर दिल्ली के जरूरत से ज्यादा नियंत्रण की वजह से कई संगठनात्मक और राजनीतिक गलतियां हुईं. साथ ही, पार्टी अपनी पूरी ताकत का अंदाजा नहीं लगा सकी. हालांकि, आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और कभी सबसे ताकतवर रहे शिरोमणि अकाली दल को पंजाब विधानसभा में तीसरे पायदान पर पहुंचा दिया.
इसके बाद कई और संगठनात्मक गलतियां हुईं, जिससे आम आदमी पार्टी बुरी तरह बिखर गई. एक वक्त ऐसा लगने लगा कि तीसरे विकल्प का सपना टूट चुका है. लेकिन 2020 में केंद्र की बीजेपी सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई, जिसके विरोध में किसान आंदोलन शुरू हो गया.
किसान आंदोलन ने पंजाबी समाज को सक्रिय किया
किसान आंदोलन में पंजाब के किसान अगुआ के रूप में उभरे और इस आंदोलन ने पूरे पंजाबी समाज को सक्रिय कर दिया. यह आंदोलन नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अखिल भारतीय आंदोलन में तब्दील हो गया और इसने पंजाब के किसान संगठन की प्रोफाइल को इतना ऊंचा कर दिया, जितना देश में किसी भी जन संगठन ने कभी हासिल नहीं किया था. इस आंदोलन से हासिल शक्ति की बदौलत ही किसान संगठनों ने अंततः मोदी सरकार को तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए मजबूर कर दिया. किसानों की जीत के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता.
किसान आंदोलन से पहले बीजेपी सरकार के खिलाफ जो भी खड़ा हुआ था, उसे कुचल दिया गया. इसने एक प्रधानमंत्री को उनकी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया. 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से आम जनता की शक्ति का पहला ताकतवर प्रदर्शन था.
किसानों संगठनों का विरोध
किसान आंदोलन की उस बड़ी जीत (राजनीतिक निहितार्थों के साथ) से मिले गौरव को पंजाब विधानसभा चुनावों में राजनीतिक जीत में बदलने की उम्मीद थी. हालांकि, कुछ किसान संगठन संसदीय राजनीति में भाग लेने के विरोध के लिए वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध थे. उन्होंने अन्य किसान संगठनों का विरोध किया, क्योंकि उन्हें अहसास हो चुका था कि कृषि कानूनों की जीत पारंपरिक राजनीतिक दलों की झोली में नहीं जानी चाहिए. इसका व्यापक असर यह पड़ा कि किसान आंदोलन बंट गया.
हालांकि, किसानों की आर्थिक जीत को राजनीतिक जीत में बदलने की पहल के इस झटके के बावजूद किसान आंदोलन में पंजाबी समाज के सभी वर्गों की व्यापक भागीदारी ने इलीट वर्ग के शासन के खिलाफ राजनीतिक चेतना के सामान्य स्तर को ऊपर उठाया. राजनीतिक चेतना का यह उन्नत स्तर आम आदमी पार्टी की तरफ झुक गया और पारंपरिक इलिट वर्ग को अपमानित करने का माध्यम बन गया.
दिल्ली दरबार
यह ध्यान रखना अहम है कि पंजाब के लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट उनके प्रति मुहब्बत की वजह से नहीं, बल्कि इलीट वर्ग को गिराने के इरादे से दिया. अरविंद केजरीवाल के दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के रूप में काम करने के तरीके के बारे में काफी भ्रांतियां हैं. वहीं, दिल्ली दरबार के खिलाफ पंजाबियों के विद्रोह करने की लंबी ऐतिहासिक परंपरा है. केजरीवाल और उनके दिल्ली सहयोगियों ने पंजाबी राजनीतिक संस्कृति के महत्व को भले ही देर से महसूस किया और भगवंत मान को मुख्यमंत्री पद के पार्टी के चेहरे के रूप में पेश करने का फैसला किया. भगवंत मान किसी भी प्रशासनिक क्षमता के लिए नहीं जाने जाते हैं, लेकिन उनकी भ्रष्टाचार मुक्त, सरल जीवन शैली और कामकाज के तरीके को काफी सम्मान दिया जाता है.
कई टिप्पणीकारों का दावा है कि पंजाब के लोगों ने केजरीवाल के दिल्ली मॉडल के मोहपाश में बंधकर आम आदमी पार्टी को वोट दिया, लेकिन इसके विपरीत यह भगवंत मान की ईमानदारी और लोकप्रियता है, जिसने पंजाब के लोगों को आम आदमी पार्टी की ओर खींचा.इसका अहम निहितार्थ यह है कि अगर केजरीवाल को भगवंत मान और पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार के साथ छल-कपट और नियंत्रण करते हुए देखा गया तो जिस गुस्से ने कांग्रेस-अकाली जैसे इलीट वर्ग को अपमानित किया, वह केजरीवाल को भी निशाने पर ले सकता है.
प्रणालीगत विशिष्टता
भले ही संक्षेप में, लेकिन यह बात भी जांच करने योग्य है कि भारत की फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (एफपीटीपी) की चुनावी प्रणाली और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत का आकलन करने में इसकी प्रासंगिकता है. इस मामले को आसानी से समझाने के लिए मैं इसकी तुलना आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) की चुनावी प्रणाली से करूंगा, जो कि सबसे एडवांस्ड लोकतंत्रों में किसी न किसी रूप में इस्तेमाल की जाती है. पंजाब पर चर्चा करने से पहले मैं एफपीटीपी और पीआर की तुलना करने के महत्व को उजागर करने के लिए 2014 और 2019 में बीजेपी की आम चुनाव जीत पर संक्षेप में चर्चा करता हूं. 2014 में बीजेपी के पास 31 फीसदी वोट शेयर था और एफपीटीपी के साथ पार्टी ने लोकसभा की 543 सीटों में से 282 सीटें जीती थीं. यदि पीआर का इस्तेमाल किया गया होता तो 31 फीसदी वोट के कारण बीजेपी 168 सीटें ही जीत पाती और इस तरह वह सरकार बनाने के लिए बहुमत से वंचित रह जाती.
2019 में बीजेपी का 37.36 प्रतिशत वोट शेयर था और FPTP के साथ वह 303 सीटें हासिल करने में सफल रही. अगर पीआर का इस्तेमाल किया गया होता तो बीजेपी को 202 सीटें मिल जातीं, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटों के आंकड़े से काफी कम होता.
अब हम पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 का रुख करते हैं. हम देखते हैं कि आम आदमी पार्टी को 42.01 फीसदी वोट मिले, लेकिन FPTP प्रणाली के माध्यम से पार्टी ने 92 सीटें हासिल कीं. अगर पीआर सिस्टम का इस्तेमाल किया गया होता तो आम आदमी पार्टी 49 सीटों की हकदार होती. यह संख्या सरकार बनाने के लिए जरूरी 59 सीटों से 10 कम है. 22.98 प्रतिशत वोटों के साथ कांग्रेस पार्टी को एफपीटीपी प्रणाली के माध्यम से 18 सीटें मिलीं, लेकिन पीआर प्रणाली का इस्तेमाल किया गया होता तो वह 27 सीटों की हकदार होती. अकाली दल को 18.38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ एफपीटीपी प्रणाली के माध्यम से महज तीन सीटें मिलीं, लेकिन पीआर सिस्टम में पार्टी 22 सीटों की हकदार होगी. 6.60 प्रतिशत के साथ बीजेपी को एफपीटीपी प्रणाली के माध्यम से केवल 2 सीटें मिलीं, लेकिन पीआर प्रणाली में वह 8 सीटों की हकदार होती.
भारत के क्षेत्रीय दलों के नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि त्रुटिपूर्ण एफपीटीपी प्रणाली बड़ी पार्टियों को अनुपातहीन रूप से ज्यादा सीटें देती है. एफपीटीपी प्रणाली द्वारा बनाए गए लोकतांत्रिक घाटे के बारे में अहसास अभी तक भारत में राजनीतिक और शैक्षणिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया है, जो आवश्यक चुनावी सुधारों के लिए एक आंदोलन में योगदान दे सकता है.
सबसे बड़ी चुनौतियां
शासन के दृष्टिकोण से पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए दो सबसे बड़ी चुनौतियां होंगी. इनमें पंजाब की जड़ों में मौजूद माफियाओं को खत्म करना और इसके माध्यम से विकास परियोजनाएं शुरू करके राज्य की राजस्व स्थिति में सुधार करना, और बाहरी रूप से खतरनाक केंद्रीयकरण के खिलाफ आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से पंजाब के संघीय अधिकारों की रक्षा करना शामिल है. दोनों के पास कुछ हद तक स्वायत्तता है, लेकिन वे आपस में जुड़े हुए भी हैं. बढ़ता केंद्रीकरण राज्यों की राजस्व स्थिति को कमजोर करता है और उनके विकास पथ के विस्तार करने की उनकी क्षमता में रोड़े अटकाता है.
(लेखक ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स बिजनेस स्कूल (यूके) के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)
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