सम्पादकीय

लोकतंत्र पर भारी पड़ता भीड़तंत्र, कृषि कानूनों की वापसी पर जश्न मनाना खेती और किसानों की बर्बादी

Gulabi
24 Nov 2021 6:19 AM GMT
लोकतंत्र पर भारी पड़ता भीड़तंत्र, कृषि कानूनों की वापसी पर जश्न मनाना खेती और किसानों की बर्बादी
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लोकतंत्र पर भारी पड़ता भीड़तंत्र
राजीव सचान। पंजाब में अमरिंदर सिंह सरकार के समर्थन से रेल पटरियों पर धरना देने और फिर मोबाइल टावरों पर हमले के साथ शुरू हुआ कृषि कानून विरोधी आंदोलन दिल्ली के सीमांत इलाकों के राजमार्गो पर कब्जा करने तक आगे बढ़ा और अभी तक ठहरा हुआ है। इस दौरान इस आंदोलन में शामिल लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया, एक ग्रामीण मुकेश कुमार को जिंदा जलाया, एक मजदूर लखबीर सिंह को हाथ काटकर बेरहमी से मारा। इसके अलावा कई और अराजक घटनाओं को अंजाम देने के साथ 26 जनवरी को लालकिले पर चढ़ाई कर हिंसा का नंगा नाच भी किया।
अमेरिका में ट्रंप के समर्थकों ने भी की थी संसद भवन में चढ़ाई
देश को शर्मिंदा करने वाली इस घटना के 20 दिन पहले 6 जनवरी को ऐसी ही घटना अमेरिका में हुई थी। वहां ट्रंप समर्थकों ने संसद भवन पर चढ़ाई कर दी थी। पिछले दिनों इनमें से दो दंगाइयों को 41-41 महीने की सजा सुनाई गई। जब अमेरिका में दंगाइयों को सजा सुनाई जा रही थी, तब अमरिंदर के उत्तराधिकारी चरणजीत सिंह चन्नी लालकिले की हिंसा में आरोपित 83 दंगाइयों को दो-दो लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा कर रहे थे। कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के बाद इन दंगाइयों को माफ करने की मुहिम छिड़ जाए तो हैरानी नहीं।
कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा मजबूरी में की गई, यह प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि 'शायद हमारी तपस्या में कोई कमी रही होगी, जिस कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य हम कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए।' यह एक भावुक बयान था, लेकिन आखिर किसके सामने? भीड़तंत्र के सामने। भीड़तंत्र के आगे ऐसी भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के बाद यह अंदेशा उभर आया है कि भीड़तंत्र पर यकीन करने और जोर-जबर से अपनी ही चलाने वालों का दुस्साहस बढ़ सकता है। ऐसे तत्वों के आगे झुककर शांति नहीं हासिल की जा सकती। यदि यह मान लिया जाए कि किसान आंदोलन की आड़ में सक्रिय देश विरोधी तत्वों को झटका देने के लिए कृषि कानून वापस लिए गए तो सवाल उठेगा कि क्या अब वे निष्क्रिय हो जाएंगे?
लोकतंत्र में सही फैसले लेना और उन्हें लागू करना कठिन होता
सरकारों ने पहले भी अपने फैसले वापस लिए हैं, लेकिन यह शायद पहली बार है जब कोई सरकार किसी फैसले को सही बताने के बाद भी उसे वापस लेने को विवश हुई हो। कृषि कानूनों की वापसी ने फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में सही फैसले लेना और उन्हें लागू करना कठिन होता है। इस मामले में नरसिंह राव से सबक लेने की जरूरत है। वह अपनी राजनीतिक चतुराई से कहीं अधिक कठिन फैसले लेने में समर्थ रहे और वह भी तब, जब अल्पमत सरकार चला रहे थे। आज यह कहना आसान है कि यदि मोदी सरकार ने संसद के भीतर-बाहर व्यापक विचार-विमर्श के बाद कृषि कानून बनाए होते तो शायद नतीजे दूसरे होते, लेकिन इसकी चर्चा करते हुए इस पर भी बहस होनी चाहिए कि विपक्ष और खासकर कांग्रेस ने जो किया, वह कितना सही है? कांग्रेस वैसे ही कानूनों के खिलाफ खुलकर खड़ी हो गई, जैसे कानून बनाने का वादा उसने अपने घोषणापत्र में किया था।
इन कानूनों में आवश्यक संशोधन-परिवर्तन कर उन्हें बचाया जाना चाहिए था। यदि कृषि कानून नहीं बचाए जा सके तो यह अफसोस की बात है। इन कानूनों की वापसी की घोषणा पर खुशी जताना एक तरह से खेती और किसानों की बर्बादी का जश्न मनाना है। अब किसानों की मुश्किलें और अधिक बढ़ना तय है। किसी को भी अपना उत्पाद अपनी मर्जी से बेचने न देना एक प्रकार से उसे गुलाम बनाए रखना है।
महज ढाई राज्यों के समर्थ किसानों की अगुआई करते हुए देश के 86 प्रतिशत किसानों के हितों की बलि लेने पर आमादा संयुक्त किसान मोर्चे की नई मांगों से यदि कुछ स्पष्ट हो रहा है तो यही कि वे सड़कों पर बैठे रहने वाले हैं और उनकी मांगें सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जानी हैं।
इस मोर्चे को समर्थन देने वाले विपक्षी दल भी यह चाह रहे हैं कि किसान संगठन आगामी विधानसभा चुनावों तक सड़कों पर बैठे रहें और मोदी सरकार के साथ आम लोगों की नाक में दम करते रहें। इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं कि सुप्रीम कोर्ट किसान संगठनों के कब्जे वाली सड़कों को खाली कराने का आदेश देने का साहस जुटाएगा।
वास्तव में कृषि कानूनों की वापसी में एक बड़ा योगदान सुप्रीम कोर्ट का भी है। पहले उसने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाकर यह संदेश दिया कि शायद किसान नेता सही हैं, फिर वह खुद की ओर से गठित उस समिति की रपट को दबाकर बैठ गया, जिसे कृषि कानूनों की समीक्षा करनी थी। इस समिति ने मार्च में अपनी रपट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी थी, लेकिन वह उस पर गौर करने का समय नहीं निकाल सका। ऐसा तब हुआ जब इस समिति के एक सदस्य ने इसके लिए अनुरोध भी किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों के कब्जे वाली सड़कों को खाली कराने के लिए भी कुछ नहीं किया। इस मामले में उसकी नाकामी ने यही संदेश दिया कि लोकतंत्र में भीड़तंत्र के लिए भी जगह है। उसने भीड़तंत्र के लिए ऐसी ही गुंजाइश शाहीन बाग धरने के समय भी बनाई थी। इसी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने गत दिवस जब यह कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी शासकों को अपना नियमित कार्य शुरू करने से पहले आत्ममंथन करना चाहिए कि उनके भीतर क्या बुराई है, तब जो सवाल कौंधा वह यही था कि क्या यह बात न्यायाधीशों पर लागू नहीं होती?
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

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