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दिल्ली उच्च न्यायालय ने विरोध
दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला, जिसमें विरोध करने के अधिकार को मान्यता दी गई है, बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने कहा है कि किसी सभा में शामिल होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति कानून तोड़ने का इरादा रखता है। यह फैसला विशेष रूप से दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' और कांग्रेस के उन विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में अहम है, जिनमें CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की गई थी।
हाई कोर्ट ने एक छात्र के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। यह छात्र पिछले साल रामलीला मैदान में हुए उस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था, जो कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के खिलाफ था। दिल्ली पुलिस ने मैदान से 44 युवाओं को हिरासत में लिया और उन पर FIR दर्ज कर दी, क्योंकि उन्होंने वहां से हट जाने की घोषणा को अनसुना कर दिया था। हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जब याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है, तो उस पर आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।
पिछले कुछ वर्षों में, दिल्ली पुलिस एक दमनकारी बल में बदल गई है। यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को कुचलने, सत्याग्रह को रोकने और मार्च निकालने की अनुमति न देने का काम कर रही है। अज्ञात लोगों के खिलाफ बड़ी संख्या में FIR दर्ज करना एक आम चलन बन गया है। इस मामले की तरह ही, लोगों—खासकर अल्पसंख्यकों—को पकड़ लिया जाता है, जेल में डाल दिया जाता है और उन पर मुकदमे चलाए जाते हैं। अदालतों ने सबूतों की कमी और घटनाओं को मनगढ़ंत तरीके से पेश किए जाने के कारण कई मामलों को खारिज कर दिया है, जिनमें दिल्ली दंगों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।
CEC के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शनों में भी देखा गया कि कैसे 22,000 पुलिसकर्मियों के बल ने प्रदर्शनकारी युवाओं पर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। यह सब "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर किया जाता है, जो केंद्र सरकार का पसंदीदा बहाना बन गया है। जिस देश ने कई यादगार लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन देखे हैं, वहां अपने ही नागरिकों पर बेरहम पुलिस बल का इस्तेमाल होना शर्मनाक है। हालांकि हाल के फैसलों में पुलिस बल के इस तरह के क्रूर इस्तेमाल को गलत ठहराया गया है, फिर भी पुलिस को अस्पष्ट बहानों के आधार पर प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करने की काफी छूट दे दी गई है। अदालतों की कई चेतावनियों के बावजूद, दिल्ली पुलिस द्वारा कानून का दुरुपयोग करना और उसकी मनमानी व्याख्या करना एक आम बात हो गई है।
संवैधानिक स्वतंत्रताएं खतरे में
संविधान का अनुच्छेद 19 भारतीय नागरिकों को कई तरह की स्वतंत्रताएं देता है। यह विशेष रूप से शांतिपूर्ण ढंग से और बिना हथियारों के इकट्ठा होने की स्वतंत्रता, तथा बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। दिल्ली पुलिस का यह कहना कि रामलीला मैदान या जंतर-मंतर पर युवाओं का इकट्ठा होना देश की संप्रभुता को प्रभावित करेगा, बिल्कुल बेतुकी बात है।
वह भारत, जहाँ नाराज नागरिक विरोध प्रदर्शन के लिए मार्च कर सकते थे, अब खत्म हो चुका है। इसकी जगह एक दमनकारी 'पुलिस राज' ने ले ली है, खासकर राष्ट्रीय राजधानी और भाजपा शासित राज्यों में। इतिहास गवाह है कि अत्यधिक संदेह और दमन कई अन्य खतरों को जन्म दे सकते हैं।
इस तरह के फैसले एक जरूरी याद दिलाते हैं, हालांकि नागरिकों की बुनियादी आज़ादी को बचाए रखने के लिए अदालतों को अभी और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
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