सम्पादकीय

आपदा की गहरी मार

Subhi
13 April 2021 2:32 AM GMT
आपदा की गहरी मार
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पिछले दिनों अमेरिकी संस्था पिउ रिसर्च ने बताया था कि कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में करोड़ों लोग मध्य वर्ग से खिसक कर गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैँ।

NI एडिटोरियल: पिछले दिनों अमेरिकी संस्था पिउ रिसर्च ने बताया था कि कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में करोड़ों लोग मध्य वर्ग से खिसक कर गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैँ। इनमें लगभग साढ़े सात करोड़ लोग भारत के हैं। भारत में वैसे भी मध्य वर्ग छोटा है। विश्व बैंक के रोजाना दो डॉलर खर्च कर सकने की क्षमता के पैमाने पर कभी इस तबके की आबादी भारत में 10 करोड़ से अधिक नहीं रही। मध्य वर्ग से लोग क्यों नीचे गए, इसका एक कारण बड़ी संख्या में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों से लोगों का हाथ धोना है। दूसरा कारण मध्यम और छोटे दर्जे के कारबारों का बंद होना है। इस बारे में एक नए अध्ययन से नई रोशनी पड़ी है।

इस अध्ययन के मुताबिक ऐसे कारोबार से जुड़े लोगों को नहीं लगता कि अगले महीनों के भीतर वे अपना व्यवसाय पहले जैसा चला पाएंगे। बल्कि उन्हें यह भी नहीं लगता कि वह अगले छह महीने तक अपना कारोबार जारी रख पाएंगे। एक नई फेसबुक वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान में ऐसे कारोबार के बंद होने की दर सबसे ऊंची है। भारत में ऐसे 32 प्रतिशत उद्योग बंद हो गए हैं। इससे इस क्षेत्र में रोजगार में कमी आई है। भारत में पिछले तीन महीनों के दौरान पूर्व कर्मचारियों के बीच से सिर्फ 42 को ही दोबारा काम मिला। अब चूंकि महामारी की दूसरी लहर का कहर टूट पड़ा है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात क्या होंगे। इस अध्ययन के लिए फेसबुक ने फरवरी में 27 देशों में 35,000 से अधिक छोटे और मध्यम व्यापारियों के बीच सर्वेक्षण किया। इस दौरान दुनिया भर में लगभग 24 प्रतिशत कारोबारियों ने बताया कि उनके व्यवसाय बंद हो गए हैं। हालांकि वैक्सीन आने से कुछ आशा पैदा हुई है, फिर भी अध्ययनकर्ताओं की राय है कि अभी भी कई उद्योग कमजोर हैं और उन्हें सहायता की जरूरत है। जो लोग महामारी के प्रभाव को महसूस कर रहे हैं, उनमें सबसे अधिक महिलाओं और अल्पसंख्यक-स्वामित्व वाले व्यवसाय हैं। वैसे भी ये जग जाहिर है कि जब भी संकट आता है, तो हमेशा सबसे कमजोर पर ही सबसे कठिन मार पड़ती है। एक बार फिर यही हुआ है। भारत में इस क्षेत्र को संभालने के लिए सरकारी स्तर पर शायद ही कोई प्रभावी कदम उठाया गया है। नतीजा है कि देश की आर्थिक संभावनाएं धूमिल पड़ रही हैं।


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